बुधवार, 26 मार्च 2008

दिग्भ्रमित और दिशाहीन होते बच्चे.

बच्चो द्वारा हिंसक घटनाओ को अंजाम देना आम बात होते जा रही है , कुछ घटनाओं ने सारे देश को सोचने के लिए के लिए मजबूर कर दिया । चाहे वह गुडगाँव के यूरो स्कूल मैं साथी छात्र को गोली मारने की घटना हो या किशोरों द्वारा अंजाम दी जाने वाली कोई लोमहर्षक घटना हो । ये घटनाएँ आने वाली पीढ़ी के भविष्य की भयावह तस्वीर को पेश करती है । बच्चे देश का भविष्य हैं । तो क्या हम यह कहें की देश का कल का भविष्य आज के बच्चे उच्च्श्रन्खाल , संस्कार विहीन और दिशा भ्रमित होते जा रहे हैं ।
इस उपभोक्तावादी संस्कृति जिसमे शिक्षा के मंदिरों को भी व्यापार व्यवसाय के केन्द्रों के रूप मैं परिवर्तित कर दिया हैं क्या वहां से संस्कारित , सुशिक्षित एवं रचनात्मक द्रष्टि कोण वाले नागरिक बनकर निकलेंगे । इस प्रतिस्पर्धा भरे युग मैं सिर्फ़ यह शिक्षा दी जाती है की अधिक लाभप्रद और ऊँचे से ऊँचे ओहदे कैसे प्राप्त किया जाए। और उसके लिए माता पिता द्वारा महंगे दामों को चुकाया जाता है । ऐसे मैं बच्चों को सांस्कृतिक , नैतिक सुचिता , सामाजिक व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों पर आधारित शिक्षा का मिल पाना दूर की कौडी साबित हो रही है ।
साधन संपन्न माता पिता जिनके पास अपने बच्चों के लिए समय नही है । वे अपने बच्चों को महंगे बोर्डिंग स्कूल मैं भेजकर एवं कमसिन उम्र मैं ही भौतिक सुख सुबिधाओं के सभी साधन उपलब्ध कराकर , पारिवारिक पाठशाला से दूर कर , अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली जाती है।
पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव ने भी बच्चों के कोमल मन पर भी बुरा प्रभाव डाला है । खासकर फिल्मों एवं टीवी और कंप्यूटर गेम्स ने अहम् भूमिका निभाई हैं । ये साधन हैं जो अभिजात शहरी एवं सर्वहारा ग्रामीण दोनों वर्ग को प्रभाबित कर रहे है । एक और जहाँ फिल्मी नायक के हेरातान्गेज़ कारनामे , हिंसक व उत्तेज़क द्रश्य बच्चों को उच्च श्रंखाल , निरंकुश और समय से पहले व्यस्क बना रहे हैं वही टीवी बच्चों को देने एवं समाज से दूर कर रही है। हिंसक कंप्यूटर गेम भी बच्चों मैं मानसिक विकृतियाँ पैदा कर रही है ।

आवश्यकता है संस्कृतक और नैतिक शिक्षा को अनिवार्य किया जावे , धर्म और योग जैसे विषयों को भी पाठ्यक्रम मैं शामिल किया जावे , माता पिता के द्वारा भी अपने बच्चों को समुचित समय और ध्यान देकर समय समय पर आवश्यक समझाइश दिया जावे ।

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

परम आवश्यक: माता पिता के द्वारा भी अपने बच्चों को समुचित समय और ध्यान दिया जाना चाहिये.

--सही कह रहे हैं.