गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

मंहगाई सिर्फ़ आम जनता के लिए !

देश मैं मंहगाई को लेकर हाय तौबा मची हुई है । जनता से लेकर राजनैतिक दल , और यहाँ तक की सरकार तक इस मुद्दे को लेकर उहा पोह के स्थिति मैं है । क्या कर क्या न करें , सरकार और सत्ताधारी दलों को कुछ समझ मैं नहीं आ रहा है । केरल राज्य के चुनाव और लोकसभा के भी चुनाव नजदीक आ गए हैं , ऐसे मैं मंहगाई एक बड़ा मुद्दा बनकर उनके सामने आया है । बैठे बिठाये विरोधी दलों को भी एक नया मुद्दा मिल गया है , जिससे वह सत्ताधारी दलों को जनता के सामने कटघरे मैं खड़ा कर सकें । किंतु एक बात है की राजनैतिक दलों को जनता के नफे नुकसान से उतना सरोकार नही रहता है , जितना की उनकों इस बहाने अपनी और अपनी पार्टी की स्थिति को चमकाने की रहती है । बड़े उद्योगपति , व्यापारी वर्ग और नेतागण इससे ज्यादा प्रभावित तो नही हुए है किंतु आम जनता इस बढ़ती मंहगाई से आक्रोशित नजर आ रही है । इस मंहगाई ने सबके बज़त को बिगाड़ के रख दिया है । व्यापारी वर्ग तो मंहगाई बढ़ने पर अपनी वस्तुओं का दाम बढाकर अपनी आय मैं बढोतरी कर लेता है , ज्यादातर व्यापारी तो इस मंहगाई को लाभ के अवसर के रूप मैं बदल लेते है । मंहगाई बढ़ने पर तो वे अपने समानो कर दाम झट बढ़ा देते है किंतु कम होने पर दाम मैं कमी करने मैं देरी करते है । किंतु वास्तविकता यह है की जिस दर से मंहगाई बढ़ रही है उस अनुपात मैं न तो कर्मचारियों का वेतन बढ़ता है और न ही आम जनता की आय । फलस्वरूप आय और व्यय मैं भारी अन्तर उभर कर सामने आता है । लोगों को अपने खानेपीने , कपड़े , घूमने फिरने और अपने अन्य शौकों मैं कटौती कर घर के बज़त को संभालना पड़ता है । जो की उनके हाथ मैं रहता है । किंतु डॉक्टर की फीस और दवाएं , बच्चों की स्कूल की फीस , हर महीने का नल , मकान , बिजली , टेलीफोन , इंधन खर्च और अन्य मासिक किराये मैं कटौती करना न मुमकिन होता है । ऐसे मैं आम इंसान की जिन्दगी मैं भारी असंतुलन पैदा होने लगता है , वह इस प्रकार उत्पन्न भारी खाई को कैसे पाटे , इस उधेड़ बुन मैं घरेलु और सामाजिक वातावरण मैं भी तनाव और अशांति का माहोल बनने लगता है ।

आवश्यकता है आम नागरिकों के हितों को ध्यान मैं रखकर ठोस और प्रभावी आर्थिक नीति बनाने की । जमाखोरी पर सख्ती से रोक लगाने की और वितरण प्रणाली को ज्यादा कारगर ढंग से लागू करने की । तभी सुरसा से जैसे मुंह फाड़ते मंहगाई को काबू मैं लाया जा सकता है ।

4 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बड़े उद्योगपति , व्यापारी वर्ग और नेतागण इससे ज्यादा प्रभावित तो नही हुए है, अरे भाई होगे भी केसे यह देन इसी वर्ग की हे,जमा खोरी, मुनाफ़ा खोरी,ओर यह नेता इन्हे मालुम हे जीतना तो इस बार नही, लेकिन आने वाली पार्टी के रास्ते मे काटें बिछादो. ओर अगर जीत गये तो जिस भुखी जनता ने वेब्कुफ़ी की हे अब भुगते

Kirtish Bhatt, Cartoonist ने कहा…

महंगाई तो महंगाई होती है दीपक बाबू. सब को भारी पड़ती है. जनता को आज पड़ रही है सरकार को कल भारी पड़ेगी.

Deepak Bhanre ने कहा…

Raj Bhatia aur kirtish bhatt sir ji aapki aise pratikriyaye badhati manhgai ke jimmedar logon par jarror bhari padegi.Padhne aur tippni dene ke liye bahut bahut dhanyavaad.

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

यह बात सही है. महंगाई तो जनता के लिए ही होती है. सरकार, उद्योगपति, सरकारी अफसर, वी आई पी पर उसका कोई असर नहीं होता. हाँ चुनाव के समय यह हो सकता है सरकार का नुकसान कर दे.