गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

क्रिकेट पर क्षेत्र वाद और व्यसायिकता की बुरी नजर !

जब से क्रिकेट खेल मैं व्यवसायिकता , क्षेत्र वाद और धन की अपार वर्षा होनी शुरू हुई है , तब से क्रिकेट खेल की लोकप्रियता और उज्जवल भविष्य पर संकट के बादल मंडराना शुरू हो गया है । वैसे भी इस खेल ने लोगों के बीच मैं अन्य खेलों के अपेक्षा तेजी से लोकप्रियता और धन अर्जित किया है , लगता अब उसी तेजी से इसमे गिरावट आएगी । खेल को इस प्रकार क्षेत्र वाद मैं बाटने और व्यावसायिकता के तराजू तौलने के कारण दर्शक भी इसी आधार मैं बटते नजर आ रहे है । अब खेल मैं पहले जैसी राष्ट्रीय भावना न तो खिलाडी मैं और न ही दर्शकों मैं नजर आ रही है । पहले ही तो फिक्सिंग के मामले मैं इस खेल की बहुत ही किरकिरी हो चुकी है , जिससे काफी दर्शक का इस खेल से मोह भंग हो चुका था । बी सी सी आई द्वारा भी खेल को कम और अपना खजाना भरने मैं ज्यादा ध्यान दिया गया , खिलाड़ियों को खेल मैं तब्ब्जों देने के स्थान पर उनके द्वारा एड करवाना , किसी प्रायोजित स्थान पर भेजा जाना पहली प्राथमिकता रही है । इन्ही सब बातों के मद्देनजर कई बार बी सी सी आई के सेलेक्टर टीम के बीच मतभेद भी उभरकर सामने आए है । आई पी अल और आई सी अल द्वारा जिस प्रकार खिलाड़ियों की बोली लगाई गई , जिससे खेल और खिलाड़ी की गरिमा धूमिल हुई है और इससे दर्शक अपनी खेल भावना को लेकर काफी आहात हुए है । अपनी कीमत बढ़ाने के चक्कर मैं एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ मैं खिलाड़ियों के बीच सामंजस्य का अभाव पैदा किया है और खिलाड़ियों मैं खेल और टीम भावना मैं कमी आई है । ऐसी ख़बर है की शाहरुख़ खान उनके द्वारा प्रायोजित टीम के मैच हेतु टिकेट खरीदने मैं दर्शकों द्वारा कोई उत्साह नही दिखाने से खुश नही है जिससे लगता है उन्होंने जिस उत्साह के साथ ३०० करोड़ रूपये अपनी क्रिकेट टीम के लिए लगाया था , किंतु दर्शकों की घटती संख्या से अब उनका खेल से मोह भंग होने लगा है ।

अतः अब समय आ गया है की खेलों को इस प्रकार के व्यावसायिकता से दूर रखकर इसमे सिर्फ़ खेल भावना और टीम भावना को महत्व दिया जाना चाहिए । सभी खेलों को एक समान दृष्टि से देखा जाना चाहिए और उन्हें हर स्तर पर बराबरी से सहायता और मदद दी जाना चाहिए । खेल और खिलाड़ियों को पैसों के तराजू से नही तुलना चाहिए । अतः खेल को व्यसायिकता और क्षेत्र वाद से दूर रखकर , खेलों की सेहत का ख्याल रखते हुए खेल को राष्ट्रीय भावना के प्रसार और देश को एक सूत्र मैं बाँधने का एक अच्छा माध्यम बनाया जा सकता है।

1 टिप्पणी:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

यही हकीकत है , सुंदर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ !