शुक्रवार, 30 मई 2008

आज क्या लिखूं ?

वर्तमान मैं घटित हो रही तात्कालिक घटनाओं पर हमेशा प्रतिक्रिया देने की कोशिश की है । कभी मंहगाई , कभी राजनीति , कभी भूकंप तो कभी तूफ़ान और बाढ़ की त्रासदी तो कभी आतंकवाद की घटना तो कभी आरक्षण के मुद्दे पर ब्लॉग लिखने की कोशिश किया । अब मैं इन मुद्दे पर अपनी सटीक प्रतिक्रिया सटीक देने मैं कितना सफल रहा यह तो बुद्धिजीवी पाठक वर्ग ही जाने । कुछ घटनाये तो प्रकृति प्रदत्त हैं जिस पर की इंसान का बस नही है , किंतु कुछ तो इंसान स्वयं समस्याएं पैदा कर परेशानी मोल ले रहा है , कही जुलूस , कही तोड़फोड़ , कही आगजनी तो कही दंगे फसाद , आख़िर इंसान कंहा जा रहा है अपने हाथ से स्वयं जन धन और देश की राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति और नुकसान जान बूझकर पंहुचा रहा है , वह क्यों स्वयं अपने पैरों मैं कुल्हाडी मार रहा है ? इन आपा धापा और आक्रोश भरे घटनाओं से मन अशांत सा हो जाता है । मन कुछ थका थका सा लगा , रोज रोज वही मन को व्यग्र और अशांत कर देने वाली घटना । यही सब देखकर और लिखकर आज मन कह रहा था की आज क्या लिखूं ? फिर सोचा की मन मैं मचे इस द्वंद के बारे मैं लिख दूँ जिसको कह देने से मन हल्का हो जायेगा ।
कुछ बात और कहना चाहूँगा की कुछ दिनों से लिखे जाने ब्लॉग पर बुद्धिजीवी पाठकों द्वारा असंतोष और नाराजगी जतायी जा रही है । जो बाकी सोचनीय और गंभीर बात है । निसंदेह यदि हिन्दी ब्लॉग लेखन को सम्रध और सर्वव्यापी बने इस हेतु यह आवश्यक है की ब्लॉग लेखन पर गंभीरता पूर्वक कार्य करना होगा । ब्लॉग पर मात्र क्लिक संख्या बढ़ाने के लिए नही ( जैसा की कुछ बुद्धिजीवी पाठकों ने इस पर चिंता जताई है ) वरन ऐसे लेखन को बढ़ावा देना होगा जिससे विभिन्न समस्याओं एवं मतभेदों पर एक मत और राय बन सके , एक सर्वसम्मत हल निकल सके । साथ ही हिन्दी ब्लॉग लेखन को नई बुलंदियों मिल सके ।

मैं ब्लॉग लेखन मैं अभी नया हूँ अतः ज्यादा कुछ और तो नही कह सकता हूँ । अपने बुद्धिजीवी और सम्मानीय पाठकों से मन की बात कहने पर कुछ मन की व्यग्रता और बेचैनी तो कम हुई , जो मन मैं था कह डाला । इसी आशा और विश्वाश के साथ की अभी तक जो साथ और भरोसा बुद्धिजीवी पाठक वर्ग ने जताया है वह आगे भी बरक़रार रहेगा ।

मंगलवार, 27 मई 2008

भुगतना तो आम जनता को ही पड़ता है !

आए दिन देश मैं कहीं धरना तो कहीं जुलूस तो कहीं हिंसक प्रदर्शन प्रायोजित कराये जाते हैं । जिसमें आम जनता बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है वह भी बिना परिणाम और नुकसान के सोचे हुए । चाहे वह इनमे भाग लेने वाली जनता हो या फिर इससे प्रभावित होने वाली आम जनता जो बिना भाग लिए परेशानी और नुकसान को झेलती हो , भुगतती तो आम जनता ही है । इनमे प्रायोजक के रूप मैं भाग लेने वाले न तो कोई नेता और न ही अगुवाई करने वाले लीडर को कोई जान माल का नुकसान होता है । हर बार वे सुरक्षित बच जाते हैं , आख़िर ऐसा क्यों ? संकट और विषम परिस्थितियों मैं ये जुलूस और धरना के प्रणेता और नेता जनता को हिंसा की आग मैं झुलसने के लिए छोड़कर कंहा भाग जाते है ? राजस्थान मैं गुर्जर का आन्दोलन जिसने की हिंसक रूप ले लिया है और कई लोगों की जान भी चली गई है इसी प्रकार की घटना का ही एक क्रम है ।
जब भी इन नेता और राजनेताओं को अपने स्वहित और राजनैतिक हित साधना होता है तो जनता की भावना को भड़काकर उन्हें जुलूस , धरना और हिंसक प्रदर्शन मैं मरने और मारने के लिए छोड़ जाते हैं । इस प्रकार के प्रदर्शन मैं होने वाली जन और धन की क्षति को निरीह जनता भुगतने के लिए मजबूर हो जाती है । कई बार तो यह देखने मैं आता है की जिन मांगो को लेकर इस प्रकार के आयोजन किए जाते है प्रायोजक नेता स्वहित या राजनैतिक हित साधने के बाद जनता की समस्यायों और मांगो का निराकरण हुए बिना समाप्त करने की घोषणा कर देते हैं ।
अतः जनता को चाहिए अब उन्हें लोगों के बहकावे मैं नही आना चाहिए । अब इस बात को जनता को समझ जाना चाहिए की ऐसे आयोजन मैं सिर्फ़ उनका इस्तेमाल होता हैं और इसके नुकसान और क्षतियों को ताउम्र भुगतने के लिया जनता और उनके परिवार को विवश होना पड़ता है । सामाजिक वैमनस्यता भी बढ़ती है ।

सोमवार, 26 मई 2008

आरक्षण बना गले की फाँस !

राजस्थान मैं जिस प्रकार गुर्जर और मीना जाति के बीच आरक्षण को लेकर खीच तान मची है उससे तो लगता है आरक्षण का मुद्दा अब राजनैतिक दलों के लिए गले की हड्डी बनने वाला है । अब यह न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते बन रहा है । एक और जन्हा गुर्जर समाज अपने को अनु सूचित जन जाति मैं शामिल करने की बात कर रहा है तो वही मीना समाज अनु सूचित जन जाति मैं अन्य समाज को शामिल न कर उन्हें आरक्षण देने का विरोध कर रहा है । आज हर जाति आरक्षण की मांग कर रही है , और राजनैतिक दल वोट बैंक की खातिर किसी भी जाति और वर्ग को नाराज नही करना चाहता है । अतः वे किसी को भी मना नही कर पा रहे हैं । यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही और सभी को आरक्षण दे दिया जायेगा तो आरक्षण के कोई मायने नही रह जायेंगे ।
जिस आरक्षण को सिर्फ़ आजादी के दस वर्षों तक ही रखा जाना था , उसे वोट की राजनीती के चलते अभी तक बरक़रार रखा गया है । और अब राजनैतिक पार्टी इस मुद्दे को अपने अपने हिसाब से भुनाने चाहती है और इसका दायरा और समय बढ़ते ही जा रहा है ।
किंतु जिस उद्देश्य से इस आरक्षण को लागू किया गया था क्या उस उद्देश्य को पाने मैं सफल रहे हैं । शायद इस बात की समीक्षा करने की जद्दोजहद नही की गई है । पहले जो आरक्षण की नीति और नियम बनाए गए थे क्या वे आज की परिस्थितियों मैं भी प्रासंगिक है की नही ।
अतः अब ऐसी आरक्षण की नीति बनाने की आवश्यकता है की जिसमे किसी वर्ग विशेष की बात न करते हुए , आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने की बात की जाना चाहिए । आरक्षण केवल जरूरत मंदों को ही मिले । इस बात की भी ध्यान दिया जाना चाहिए की योग्य प्रतिभायों के साथ अन्याय न हो । जो लोग चाहे वे किसी भी वर्ग विशेष के हो यदि वे आर्थिक और सामाजिक स्तर पर कमजोर और पिछडे हो उनके लिए इस प्रकार की योजनाये शुरू की जाना चाहिए की वे सक्षम और निपुण होकर जमाने के साथ कंधे से कंधे मिलाकर बराबरी से चल सके ।
अतः यदि समय रहते आरक्षण की नीति मैं बदलाव नही किया जायेगा तो हर वर्ग आरक्षण की मांग करेगा , वही एक वर्ग आरक्षण देने की मांग करेगा तो वही दूसरा वर्ग नई जातियों को आरक्षण मैं नही शामिल करने की बात करेगा । ऐसे मैं अब राजनैतिक पार्टियों और सरकार के पास दुबिधा की स्थिति निर्मित होगी की किसकी बात मानकर किसको नाराज कर दिया जाए और किसको खुश कर दिया जाए , और ऐसे मैं आरक्षण का मुद्दा गले की फाँस बन जायेगा ।

गुरुवार, 22 मई 2008

वर्तमान नीतियां आतंकियों की हिमायती है !

हम हमेशा पड़ोसी देश को आतंकियों का पनाह्गार कहकर उन्हें देश मैं आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहते हैं और पड़ोसी देश को भला बुरा कहते हैं , और इसमे अब कोई शक की गुंजाईश भी नही रही है । किंतु इन सब से अलग हमारे देश मैं दिया तले अँधेरा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है । देश की नीतियां देश को आतंकियों का हिमायती साबित करती नजर आ रही है ।
सजायाफ्ता आतंकी , संसद मैं हमले का मुख्य सूत्रधार को पनाह और सरंक्षण देकर देश मैं वही सब किया जा रहा है और वह भी इस आतंकी घटना को विफल करने मैं शहीद हुए जवानों की कुर्वानी की कीमत पर । देश के क़ानून बनाने वाले और कानून के सरंक्षक ख़ुद ही देश के कानून का मखोल उड़ा रहे है । गृह मंत्री ख़ुद अफजल के बचाव मै , सरबजीत की अफजल से तुलना कर नए नए बेतुके तर्क देते नजर आ रहे हैं । आतंकवादी वारदातों को रोकने हेतु बनाया गए पोटा जैसे कानून को खत्म कर और कानून मैं उनके प्रति लचीला रुख अपनाकर भी आतंकी को अप्रत्यक्ष रूप से मदद की जा रही है । देश की जेल भी आतंकियों का पनाह्गार बनी हुई है , उनके मामले को लंबे समय तक विचाराधीन रखकर उनके प्रति नरमी बरती जा रही है । पड़ोसी देश से बार बार सीमा पर आतंकी घुसपैठ और गोलीबारी की घटना होती रहती है जिसमे की कई वीर जवान हताहत और शहीद होते है इस पर मात्र प्रतिक्रिया व्यक्त कर इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को प्रोत्शाहित किया जाता है । अभी हाल ही की घटना इसका उदाहरण है की पड़ोसी देश के साथ हो रही वार्ता के दौरान ही सीमा पार से हो रही गोलीबारी पर एक जवान शहीद हो गया ।
अतः जब तक देश मैं हो रही इस प्रकार की आतंक वादियों की हिमायती नीतियां और गतिविधियाँ ख़त्म नही होगी , देश से आतंक वाद का पूरी तरह खात्मा कर पाना असंभव जान पड़ता है ।

बुधवार, 21 मई 2008

भारत पाकिस्तान वार्ता कितनी सार्थक ?

जब जब भारत और पाकिस्तान की वार्ता की जानी होती है तब तब उसके पहले पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा पर भारी गोली बारी की जाती रही है , जैसा की अभी हुआ है , उसमे भारतीय सेना के एक जवान शहीद भी हो गए हैं । और भारत की और से विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है। आख़िर क्या वजह है की एक तरफ़ तो पाकिस्तान शांति वार्ता और द्वि पक्षीय वार्ता करने का नाटक करता है और दूसरी और वह सीमा पर अशांति और तनाव पूर्ण वातावरण भी पैदा करता है । ऐसी स्थिति मैं की जा रही वार्ता कितनी सार्थक होगी यह कहना मुश्किल नही होगा ।
फिर क्यों हम हर बार पाकिस्तान के इस तरह के दिखाबे और छलावे मैं आते रहते है । चाहे वंहा किसी की सरकार बने या फिर राष्ट्रपति शासन रहे लेकिन उनकी सोच और नियत मैं बदलाव आएगा यह लगता नही है । भले ही हम रेल और सड़क मार्गों के द्वार खोल दे या फिर दिलों के द्वार खोल दें । बाजपेयी जी ने दोस्ती का हाथ बढाया तो उसका अंजाम तो हम देख चुके है । अब इस वार्ता का अंजाम क्या होगा यह अभी तक हुए घटनाक्रमों को देखते हुए कोई भी बता सकता है । पड़ोसी देश पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय स्तर पर एवं इस प्रकार की वार्ता पर वह दिखावे के लिए तो आतंकवाद के भर्त्सना करते नही थकता है किंतु अंदरूनी तौर वह आतंकवादियों का पनाह्गार बना हुआ है , सीमा पर गोलीबारी और घुसपैठ की वारदातें को अंजाम देता रहता है । यह बात अब विश्व बिरादरी भी जानने लगी है , सिर्फ़ कुछ देश अपने राजनैतिक और सामरिक हितों के मद्देनजर इस बात से आँख मूंदे बैठे रहने का दिखावा कर रहे है । किंतु वे यह भूल रहे है इस तरह देश और लोग एक दिन उनके लिए भस्म सुर साबित हो सकते हैं। बेनजीर हत्या काण्ड से इस बात का सबक लिया जा सकता है ।
सारी बात का लब्बो लुआब यह है की अब पड़ोसी देश के बह्काबे न आकर , इन सब बातों मैं देश को अपना समय और उर्जा नष्ट नही की जानी चाहिए । अतः वार्तालाप की सार्थकता पर प्रश् चिन्ह लगना स्वाभाविक है ।

सोमवार, 19 मई 2008

कल्पनाओं के संसार मैं खोता बचपन .

काल्पनिक तिलस्मी कहानी हेर्री पोटर बहुत ही प्रसिद्ध और चर्चित रही । इसी प्रकार शक्तिमान , स्पाय डर मेन और अन्य कई काल्पनिक कार्टून टीवी चैनल चल रहे हैं जो की बच्चों के बीच खूब प्रसिद्ध पाये हैं इन सभी मैं काल्पनिक पात्र होते हैं जिसका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नही होता है . इस प्रकार अन्य कई काल्पनिक चरित्र आधारित टीवी धाराविक और कामिक्स बुक बच्चे के बीच अपनी पैठ बनाया हुए है . आजकल की फ़िल्म भी अतिशयोक्ति पूर्ण घटनाक्रमों से भरी रहती है ।
परिणाम यह हो रहा है की बच्चे काल्पनिक चरित्र को पढ़कर और देखकर उन्हें सच मानकर उनसे प्रेरित हो कर उन्हें अपनाने और उनके अविश्वसनीय कारनामों की नक़ल करने की कोशिश करते हैं । बच्चे भी पलक झपकते वह सब करना और पाना चाहते हैं जो उनका पसंदीदा काल्पनिक पात्र और नायक करता है , जैसे तेज़ी से गाड़ी चलाना , अपने को सुपर हीरो मानते हुए अपने से बड़े और अधिक क्षमता और शक्ति वाले व्यक्ति , जानवर और बुरे लोगों से लड़ना , कई लोगों से एक साथ लड़ना , जादू की छड़ी से पलक झपकते ही मन चाहि कुछ भी प्राप्त करना , ऊँची इमारतों एवं भवनों से छलांग लगाना एवं कई असंभव कार्य को चुटकियों मैं कर डालना इत्यादी इत्यादी ।
किंतु इस चक्कर मैं वह यह सब भूल जाता है की वास्तविक दुनिया इस काल्पनिक दुनिया से बिल्कुल अलग है । जन्हा कुछ अच्छा हासिल करने के लिए अथक परिश्रम और मेहनत की आवश्यकता होती है । ऐसी कोई जादू छड़ी या वस्तु नही होती है जिससे बिना कोई जोखिम और मेहनत की मनचाही वस्तु या लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार बच्चे अपने चारों और वास्तविकता से अलग एक काल्पनिक दुनिया का अनुभव करने और मानने लगते है । यदि उन्हें वह सब जो चाहते हैं आसानी से और शीग्रहता से नही मिलता है निराशा मैं घिरकर ग़लत और आत्मघाती कदम उठाने से भी परहेज़ नही करते हैं ।
अतः आवश्यकता है बच्चे को वास्तविकता और सच्चाई से लबरेज़ पात्रों और सच्ची घटनाओं पर आधारित टीवी कार्यक्रमों को दिखाने की । विश्व और देश के महापुरुषों और शिखर पुरुषों के जीवन की सच्ची घटनाओं से परिचित कराने की , की किस तरह उन्होंने कठिनाइयों से जूझते हुए महनत और लगन के दम पर बुलंदियों को छुआ है । उनके कार्यों और जीवन चरित्रों को सचित्र और रुचिकर ढंग से टीवी और कामिक्स के माध्यम से प्रस्तुत करने की । माता पिता को चाहिए की बच्चे इस प्रकार के कार्यक्रमों को और कामिक्स पुस्तकों को कम से कम से देखे और पढे । बच्चे को यह अहसास दिलाया जाए की ये सिर्फ़ काल्पनिक पात्र का वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नही होता है , इनके द्वारा संपादित की जाने वाली गतिविधियों को सिर्फ़ मनोरंजन तक सीमित रखे , इनका अनुसरण करने की कोशिश न करें । तभी हम बच्चे को कल्पनाओं के संसार मैं खोने से बचा सकते है और जमीनी हकीकत से दूर जाने से रोककर उन्हें जीवन की वास्तविकता से परिचित कराया जा सकता है ।

शुक्रवार, 16 मई 2008

क्या जनप्रतिनिधि नियम और कानून से परे है ?

दिनों दिन जनप्रतिनिधियों का आचार और और व्यवहार मैं गिरावट आ रही है . कभी पैसे लेकर संसद मैं प्रश्न पूछना , कभी आय से अधिक धन संपत्ति का पाया जाना , तो कभी भ्रष्टाचार के मामले उजागर होना और मारपीट व हत्या जैसे संगीन आरोप लगना . संसद सत्र के दौरान हंगामा करना और झूमा झाट्की से लेकर मारा पीटी और तोड़फोड़ कर संसद की कार्यवाही को बाधित करना . आये दिन जुलूस और धरना कर आम जीवन को अस्तव्यस्त करना और अशांति का माहोल पैदा करना । किंतु यह जगजाहिर है की अभी तक इनमे से कितने लोगों को सजा या दंड मिला है । संसद की गलियों से लेकर संसद के बाहर तक देश हित और जन हित को भुलाकर , स्व हित और राजनैतिक हितों के मद्देनजर और सिर्फ़ विरोध के लिए एक दूसरे का विरोध करना इनकी नियति बनती जा रही है , बजाय इसके की मिल बैठकर समस्या का हल निकालने का प्रयास करना । यंहा तो समरथ को नही दोष गोसाई की कहावत चरितार्थ होती है ।
इनके अचार और व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयास कई बार माननीय न्यायलय द्वारा किया गया तो जनप्रतिनिधियों द्वारा यह कहकर की यह तो न्याय पालिका का हमारे विधायिका के कार्य क्षेत्र का अतिक्रमण कहकर विरोध किया गया । हाल ही मैं लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही को बाधित करने वाले सांसदों को दण्डित करने का प्रयास किया गया किंतु राजनैतिक मजबूरी या कुछ और के चलते यह भी नही किया जा सका । अतः ऐसी स्थिति मैं इनके अचार और व्यवहार मैं दिनों दिन जो गिरावट आ रही है उसे नियंत्रित और रोकने वाला कौन है ? यह कहा जाता है की जनता ही उनको रोक व नियंत्रित कर सकती है , किंतु बेचारी जनता के मात्र वोट के अधिकार जिसमे चुनने का अधिकार तो है किंतु जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का नही । वह एक बार इन जनप्रतिनिधियों को चुनने के बाद आगामी पांच साल तक इनके नखरे और अनियंत्रित और अमर्यादित व्यवहार को सहने और झेलने को मजबूर होती है । यह बात किसी छुपी नही है की अधिकतर जनता किस प्रकार और कितना स्व विवेक का प्रयोग कर अपने वोट का प्रयोग करती है ।
जिन्हें जनता की भावना का प्रतिनिधित्व , समस्या के निराकरण और दुःख दर्द मैं सहारे हेतु चुना जाता है , वे अब जनता के समस्या और दुःख का कारण बन रहे है ।
अतः यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है की आख़िर इन जनप्रतिनिधियों के अचार और व्यवहार को नियंत्रित करे तो करे कौन ? क्या जनप्रतिनिधि नियम और कानून से परे है ?

गुरुवार, 15 मई 2008

प्रकृति के प्रकोप से बचना मुश्किल होगा !

चक्रवाती तूफ़ान नरगिस ने जन्हा मयन्मार मैं कहर ढाया , तो चीन मैं तेज़ भूकंप के झटके ने तबाही मचाई । अब दिल्ली मैं चक्रवाती तूफ़ान ने हंगामा मचाया किंतु यह बात अलग थी की इसमे जान माल का कोई ख़ास नुकसान नही हुआ । अतः यह सब प्रकृति के द्वारा अंजाम दी जा रही घटना है । जिस पर मानव का कोई बस चलता नजर नही आता है । मानव द्वारा अभी तक गई तरक्की भी प्रकृति के क्रोध के सामने बोनी और असहाय नजर आती है । इन सब पीछे तो एक ही कारण नजर आता है और वह है प्रकृति के साथ मानव द्वारा किया गया खिलवाड़ , उसका अविवेकपूर्ण अन्धाधुन्द दोहन और बेवजह की दखल अंदाजी । परिणाम स्वरूप अब मानव को प्रकृति के कोप भाजन का शिकार तो होना पड़ेगा , और ऐसा क्रोध जिससे पार पाना मानव के सामर्थ्य से तो बाहर है ।
प्रकृति के प्रकोप से बचने का एक ही रास्ता नजर आता है की मानव को प्रकृति के पांच तत्त्व जल , अग्नि , प्रथ्वी , हवा और आकाश के बीच सामंजस्य बनाना बहुत ही जरूरी है , यदि मानव इनमे से किसी के साथ भी खिलवाड़ और दखलंदाजी करता है तो कही सूखा और अकाल तो कही भारी वर्षा और बाढ़ , कही तूफान तो कही भूकंप , कही बेमौसम बारिश तो कही भारी गर्मी जैसे भयंकर परिणाम मानव को भुगतने होंगे ।
अतः आवश्यक है की जल की बरवादी और उसका बेतहाशा दोहन न किया जाए , उसके सरंक्षण का प्रयास किया जाए , अग्नि के साथ खिलवाड़ न किया जाए , आग की दुर्घटना रोकने के उपाय किया जाए और न ही बेवजह इंधन का प्रयोग कर तापमान को बढाया जाए , प्रथ्वी का गहना कहे जाने वाले पेड़ पौधे की बेवजह कटाई बंद कर उनके संबर्धन और सरंक्षण का प्रयास किया जाए , उद्योगों और वाहनों के माध्यम से और उपयोग किए जाने वाले हानिकारक पदार्थों के माध्यम से हवा और आकाश मैं जहर घोलना बंद किया जाए । तभी हम एक सुंदर और सुखद विश्व की कामना कर सकते है ।

बुधवार, 14 मई 2008

बम धमाके के मायने !

राजस्थान के जयपुर शहर मैं हुए बम धमाके की घटना बड़ी ही दुखद और दुर्भाग्य पूर्ण है । इसकी जितनी भर्त्सना किया जाए उतनी ही कम है । जब भी हमारे पड़ोसी देश मैं सरकार जनता के भरोसे को कायम रखने और जन आकाँक्षाओं के अनुरूप कार्य करने मैं असफल रहती है तब तब वहां की हुक्मरानों और सरकारों द्वारा कश्मीर के मुद्दे को छेड़कर या फिर इस तरह की घटना को वंहा आश्रय पा रहे और पल रहे दहशत गर्दों द्वारा अंजाम दिलाकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश की जाती है । बम धमाके की घटना के कुछ दिन पहले ही पड़ोसी देश के रेंजरों द्वारा भारी गोली बारी की घटना अंजाम दी गई थी , वही जम्मू कश्मीर मैं भी सुरक्षा बलों के साथ आंतकवादियों के साथ मुठभेड़ भी हुई थी ।
देश की बात करे तो जन्हा यह देश और प्रदेश की सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल मैं कमी झलकती है क्योंकि जिस प्रकार से इनके द्वारा एक दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डाली जा रही है वह तो यही इंगित करती है। तो वही यह केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आपसी खींचतान भी प्रदर्शित करती है। वही इसे सीमा पार की चौकसी मैं हो रही ढील का नतीजा भी कहा जा सकता है । राजनीति पार्टिया भी अपने राजनीति हितार्थ इस पर राजनैतिक रोटियां भी सेकने की कोशिश करेंगी ।
फिर भी जो कुछ भी हो अलग अलग लोग अलग अलग मायने निकाल रहे है , किंतु इससे देश मैं डर , अशांति और तनाव का माहोल बनाने की साजिश तो की जा रही है । देश की जनता की सहन शीलता , धैर्य और आपसी सदभाव और भाई चारे का परिणाम ही है की सारा देश इन सब थपेडे से विचलित हुए बिना प्रगति पथ की और अग्रसर है । शायद यह बात भी लोगों की आंखों की किरकिरी बनी हुई है ।

मंगलवार, 13 मई 2008

प्रतिभाये और भी है .

जब भी टीवी कार्यक्रम चालू करें तो फिल्मी गाने और फिल्म नृत्य से संबंधित प्रतियोगी कार्यक्रमों की भरमार देखने को मिलती है । बमुश्किल ही फ़िल्म के इतर कॉमेडी और पांचवी पास से तेज़ कार्यक्रमों के अलावा अन्य क्षेत्र से संबंधित प्रतियोगी कार्यक्रम देखने को मिलेंगे . क्या प्रतिभाये सिर्फ़ फिल्मी क्षेत्र मैं ही है अन्य क्षेत्र मैं नही . बेशक टीवी जैसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने प्रतिभाएं को आगे आने हेतु और उनके फन को प्रस्तुत करने हेतु उचित अवसर और मंच उपलब्ध कराया है . किंतु यह सिर्फ़ एक ही क्षेत्रों से ही क्यों । इसके समर्थन मैं एक बात यह कही जा सकती है की टीवी लोगों का मनोरंजन का साधन है , अतः मनोरंजन पूर्ण कार्यक्रमों की प्रधानता रहती है । किंतु यह ज्ञान के भी साधन के रूप मैं उभर कर सामने आया है , और वर्तमान मैं उनके द्वारा निभाई जा रही भूमिका को देखते हुए उनसे ऐसी आशा किया जाना अपेक्षित लगता है ।
अतः प्रतिभाये और भी है , उन्हें भी मौका और अवसर प्रदाय किया जाना चाहिए . इलेक्ट्रोनिक मीडिया टीवी द्वारा अभी अब तक किए गए कार्यों से लोगों की अपेक्षा बढ़ गई है । अतः फिल्मी क्षेत्रों के अलावा खेल , विज्ञान , साहित्य , कला , चिकित्सा , और अन्य क्षेत्र को लेकर प्रतियोगी कार्यक्रम क्यों नही कराया जाता है . जैसे बिभिन्ना खेलों के ख्यातिनाम और अनुभवी खिलाडी की टीम को लेकर खेल प्रतिभाओं को खोजना , विज्ञान के क्षेत्र जैसे चिकित्सा , ऑटो मोबाइल , उद्योग , कृषि , इलेक्ट्रानिक्स, कंप्यूटर इत्यादी इत्यादी के अनुभवी वैज्ञानिको और बुद्धिजीवी की टीम बनाकर नए नए यंत्रों , उपकरणों के अनुसंधान और अविष्कार को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिता का आयोजन करवाना . इसी प्रकार खेलों , साहित्य , विभिन्न कला के क्षेत्र और ज्ञान के क्षेत्र हेतु भी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा सकता है । इस नेक कार्यक्रम मैं सरकार और अन्य गैर सरकारी सामाजिक संस्थाओं का भी सहयोग लिया जा सकता है।
क्योंकि उचित अवसरों और मंच के आभाव मैं विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाये गुमनामी की जिन्दगी जीते हुए दम तोड़ देती है । अतः आवश्यकता है हर क्षेत्र की प्रतिभाओं को बराबरी से उचित अवसर और मंच मुहैया कराये जाने की । नई प्रतिभाओं के हुनर और उनके फेन को उभारने और परिमार्जित करने की । इससे निसंदेह समाज के हर क्षेत्र मैं फायदा तो होगा ही साथ ही देश के चहु मुखी विकास मैं भी चार चाँद लगेंगे । अतः जमीन के सभी तारों को टिम टिमाने हेतु उचित अवसर और मंच प्रदान करने की , जो की आशा भरी निगाहों से इंतज़ार कर रहे हैं उचित अवसर और मंच की ।

सोमवार, 12 मई 2008

जल सरंक्षण - हम और हमारी सरकार !

हर गर्मी की तरह इस बार भी पानी की समस्या कुछ ज्यादा गंभीर बनकर सामने आई है । देश का हर आदमी इस जल समस्या को लेकर आक्रोशित और चिंतित नजर आ रहा है । इस पर जगह जगह प्रदर्शन हो रहे है । लोग सरकार और स्थानीय स्तर की संस्थाओं को बिना पानी पिए कोष रहे हैं . पानी के लिए लड़ाई झगडे और लूट की बार्दात को भी अंजाम दिया जा रहा है . किंतु यह सब आक्रोश और चिंता सिर्फ़ गर्मी के मौसम तक ही रहती है और मौसम बदलते ही सब भूलकर अपने जीवन की जद्दोजहद मैं मशगूल हो जाते हैं ।
अमूल्य और प्रकृति प्रदत्त इस जल को न तो कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है और न ही सरकार के पास जादू की छड़ी है की जिसको घुमाकर पानी पैदा किया जा सकता है . फिर भी जितनी बारिस होती है उतने ही पानी के किफायती उपयोग और सरंक्षण के प्रति हमेशा सजग रहे तो , संभवतः आने वाली गर्मी मैं पानी की समस्या उत्पन्न ही न हो । अतः कुछ छोटी छोटी बातों को ध्यान मैं रखकर हम जल सरंक्षण और किफायती उपयोग के प्रति अपनी सजगता दिखा सकते हैं . जैसे पीने हेतु और रसोई के कार्यों हेतु जितनी जरूरत हो उतना ही पानी लेवे . कपड़े धोने मैं कम पानी का इस्तेमाल और सही ड्टर जेंट का चुनाव करे . वाहनों और अन्य सामानों के धोने हेतु सीधे जल स्त्रोत का प्रयोग न कर पानी को अलग पत्र मैं लेकर उपयोग किया जाए . बागिचों और खेतों मैं भी अव्शयाकता अनुरूप पानी दिया जावे . आवश्यकता न होने पर जल स्त्रोतों को बंद कर देवें . घर की खाली जगहों मैं जल सोखता गद्दों को बनाया जावे जिससे वर्षा का जल जमीन के अन्दर जा सके . जंहा तक हो सके घरों मैं वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाया जावे . ये तो हुई हमारी बात ।
सरकार को भी चाहिए की खाली पड़ी बंजर और किसानों की अनुपयोगी भूमि को अपने हाथ मैं लेकर उनमे तालाब खुदवाये ताकि वर्षा के जल को रोका जा सके . इन तालाबों को मत्स्य पालन और अन्य जलीय खाद्य पदार्थ को उगाकर और संचित जल को सशुल्क सिंचाई हेतु प्रदाय कर आर्थिक लाभ प्राप्त करने हेतु प्रेरित किया जावे . सभी शासकीय और निजी संस्थाओं के भवनों मैं वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया जाना अनिवार्य किया जावे . जल सरंक्षण उपायों को अपनाने हेतु आर्थिक सहायता दी जावे . बड़े उद्योगों द्वारा पानी के उपयोग की एक सीमा तय की जावे . प्राकृतिक जल स्त्रोतों जैसे नदी , झीलों , झरनों को प्रदूषित और असुरक्षित होने से बचाया जाए . कृत्रिम जल स्त्रोतों तालाबों , बाब डियों , कुएं इत्यादी की साफ सफाई और गहरीकरण कर जीर्नोधार किया जावे . इन सभी कार्यों मैं निजी संस्थाओं का भी सहयोग लिया जा सकता है । स्कूलों और कॉलेज पाठ्यक्रमों मैं जल सरक्षण जैसे विषय को शामिल किया जावे ।
अतः हम इन बातों को अपनाकर और सरकार अपनी नीतियों मैं इन बातों को प्राथमिकता से शामिल कर जल सरक्षण के प्रयासों के प्रति हमेशा सजग रहेंगे । आशा है की आने वाली गर्मी मैं लोगों को और सरकार को इस समस्या से जूझना नही पड़ेगा .

शुक्रवार, 9 मई 2008

क्या लोगों के खानपान पर भी नजर रखेगा अमेरिका !

अमेरिका की दादागिरी तो जगजाहिर है , वह सभी देशों के क्रिया कलापों पर नजर रखता आ रहा है और यह सब वह अपने व्यावसायिक हितों और सामरिक हितों के मद्दे नजर करता आ रहा है , यह अधिकार तो उसे किसी ने नही दिया है । विश्व का परमाणु संपन्न और विकसित शक्तिशाली देश होने के कारण मजबूरी बस विश्व के अन्य देश उसके दादा गिरी को सहते आ रहे हैं । चाहे वह इराक का मामला हो , अफगानिस्तान का मामला हो , इरान का मामला हो या फिर अन्य तेल देशों को अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप कार्य करवाने की बात हो या फिर सामरिक हितों को ध्यान मैं रखकर दूसरे देशों मैं दखल अंदाजी की बात हो । वह जो करे वह सही और दूसरे करे तो ग़लत , सही है की जिसकी लाठी उसकी भैंस तो होगी ही । इन सब बातों के इतर अब वह लोगों के खान पान और थाली मैं भी झाकने लगा है । उनके यंहा बढ़ती मंहगाई जिसके के कारण उनके नागरिकों को कुछ अधिक खर्च करना पड़ रहा है और आगामी चुनाव के परिणाम स्वरूप आया यह दुर्भाग्य पूर्ण बयान जिसमे कहा गया की भारतीय अब ज्यादा खाने लगे है जिससे मंहगाई बढ़ रही है ।
किंतु वे इस बात से अनजान हैं की यह दो वक़्त की रोटी कितने मुश्किल से जुटाते हैं अधिकांश भारतीय । जितना वे खाते है वह सिर्फ़ पेट भरने के लिए अर्थात जिससे सिर्फ़ जीवन चलाया जा सके । उनके भोजन मैं तो संतुलित भोजन भी नही रहता है। त्योहारों और उत्सव जैसे अवसरों पर ही भोजन के मेनू मैं वृद्धि होती है । अन्यथा सिर्फ़ रोटी , चावल और दाल या सब्जी के अलावा अन्य भोज्य पदार्थ तो रहते ही नही है । और कुछ भारतीयों की थाली मैं तो यह भी नही रहता है । कई लोग तो भोजन के अभाव मैं दम तोड़ देते है।
वही इसके विपरीत अमेरिकियों का भोजन संतुलित भोजन से कही अधिक मात्रा मैं होता है वे एक भारतीय से कही अधिक बार भोजन करते हैं । यह बात भी छुपी नही है की वहां तो अधिक खाने के कारण मोटापे की बिमारी बढ़ रही है , और यहाँ तक की अधिक खाने के कारण मौते भी हो रही है । वंही अमेरिका द्वारा मक्का जैसे खाद्य पदार्थ से बायो इंधन बनाने की कवायद , जिसका की बढ़ती मंहगाई और खाद्य संकट के कारण विरोध हो रहा है भी उनकी चिंता का कारण बन रहा है ।। संभवतः ये सब बातें अमेरिका को इस तरह की बातें कहने के लिए बाध्य कर रही है । किंतु एक विकसित और आधुनिक और अपने को सभ्य समाज कहने वाले राष्ट्र का दूसरों की थाली मैं झाँककर इस तरह की बात करना , ओछी मानसिकता का परिचायक हैं । क्या अब अमेरिका द्वारा लोगों के खाने पर भी निगरानी की जायेगी ।

सोमवार, 5 मई 2008

महिला आरक्षण- कितने गंभीर सरकार और राजनैतिक दल !

संसद मैं महिला आरक्षण बिल पेश किया जाने वाला है . फिर वह सुगबुगाहट और वही हलचल . सभी राजनैतिक दल महिला आरक्षण की पैरबी करते तो नज़र आते है , किंतु उन्हें लागू करने के प्रति कितने गंभीर होते है यह किसी से छुपा नही है . राजनैतिक दलों ने अपने संगठन स्तर पर कितने पदों हेतु महिला आरक्षण दे रखा है , इस बात से पार्टी की महिला आरक्षण के प्रति सोच और गंभीरता झलकती है . सभी राज नेता महिला आरक्षण तो लागू करना चाहता है किंतु अपना पद और सीट गवाने की कीमत पर नही . लोकसभा मैं तो महिला आरक्षण को लागू करने के लिए सीटो को बढ़ाने की बात कर जनता पर और आर्थिक बोझ बढ़ाने की बात की जाती है . सरकार की बात करें तो इस बात से उनकी गंभीरता का पता चल जायेगा की उन्होंने अपने मंत्री मंडल मैं कितने पदों को महिला हेतु अरक्षित रखा है .
आरक्षण या महिला आरक्षण की बात करें तो इसको लागू करने मैं भी भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता रहा है . नौकरियों मैं तो उचित अनुपात मैं महिला आरक्षण की बात की जाती है . पंचायत स्तर की छोटी संस्थाओं मैं भी महिला आरक्षण को लागू करने मैं भी सरकार ने बेशक कड़ाई दिखाई है किंतु विधान सभा स्तर , लोकसभा और राज्यसभा मैं तो यह कही गुम होता नज़र आता है . यंहा तक इन स्तर की सरकारों के मंत्री मंडलों मैं तो और भी स्थिति ख़राब है . अर्थात नियम बनाने वाली और नियम का पालन कराने वाली उच्च स्तरीय संस्थाओं मैं महिला आरक्षण को गंभीरता से नही लिया जा रहा है
हर बार की तरह इस बार भी महिला आरक्षण का बिल संसद पटल पर पेश होने जा रहा है आशा है इस बार इस पर पहले जैसे लीपा पोती न होकर , उसे अपने अंजाम तक पहुचाया जायेगा ।