सोमवार, 30 जून 2008

सीमेंट कंक्रीट का जंगल और व्यर्थ बहता बारिस पानी !

एक बार फिर बारिस का मौसम आ गया है । भीषण गर्मी और पानी की समस्या से छुटकारा अब मिल सकेगा । जब पानी की समस्या थी तो देश मैं हर जगह पानी के लिए हाय तौबा मची हुई थी और इस पर पानी सरक्षण और संवर्धन पर काफ़ी जोर शोर से बातें कही जा रही थी । अब क्या उसी जोर शोर से वारिस पानी को सहेजने के प्रयास किया जा रहे है । वैसे देखा जाए तो अभी भी बारिस पर्याप्त मात्रा मैं होती है , बस आवश्यकता होती है उसकी एक एक बूँद सहेजने की ।

अब देखिये न हरे भरे पेड़ पौधे और वनस्पतियों के जंगल को उजाड़कर हमने अपने शहर , कसबे और ग्राम को सीमेंट कंक्रीट के जंगल से पाट दिया है । अब बारिस का पानी जाए तो कंहा जाए ? जब बारिस का जल किसी स्थान की भूमि मैं रूककर बूँद बूँद समायेगा नही तो भूगर्भ जल स्तर उस स्थान का बढेगा कैसे ? न तो जल सोखने के लिए जमीन है और न ही बारिस का जल रोकने के लिए पेड़ पौधे और वनस्पतियों हैं । परिणामस्वरूप दूसरे दुष्परिणाम अलग सामने आते है , शहर , कसबे और ग्राम के निचले स्तर मैं पानी का बढ़ जाना और बाढ़ जैसे स्थिती पैदा होना । मेघ द्वारा बरसाया गया समस्त जल सीधे सीमेंट कंक्रीट की नालियों के माध्यम से नालों और नदियों मैं इकट्ठा हो बह आता है नतीजा खतरनाक बाढ़ की स्थिती बनती है जो जान माल के नुक्सान का कारण बनती है । और यह जल व्यर्थ बहते हुए समुद्र मैं चला जाता है , जो की आम जीवन मैं उपयोग हेतु नही रह जाता है ।

तो क्यों न इस व्यर्थ बहते बारिस के कीमती जल को बारिस के मौसम मैं भी सहेजने का प्रयास किया जाए । जन्हा तक हो सके जन्हा जरूरत न हो वंहा भूमि को सीमेंट कंक्रीट से न पाटे , घर के आसपास और खाली पड़ी जमीन पर पेड़ पौधे लगाने का प्रयास किया जाए , नदी नालों मैं बाँध बनाकर और तालाबों का जीर्णोधार कर एवं वाटर हार्वेस्टिंग जैसे अन्य जल सरक्षण उपायों को अपनाया जाए । इस प्रकार दिनों दिन विकराल होती पानी की समस्या से निजात पाया जा सकता है , साथ ही प्राकृतिक रूप से पैदा होते बाढ़ जैसे समस्या पर भी काफ़ी हद तक नियंत्रण पाया जा सके ।

शुक्रवार, 27 जून 2008

वित्त मंत्री का प्रयास कितना रंग लाएगा ?

वित्तमंत्री श्री पी चिदम्बरम द्वारा बैंकों के रेपो रेट और सी आर आर की दरें को बढाये जाने की बात कही गई थी , जिसके अनुसार इन दरों मैं वृद्दि कर दी गई है । ये उठाये गए कदम बढती हुई मंहगाई पर लगाम कसने मैं कितने कारगर सिद्ध होंगे यह तो आने वाले वक़्त पर ही पता चलेगा । इस पर वित्तमंत्री द्वारा मंहगाई मैं कमी आने मैं वक़्त लगने की बात कही गई है ।
यह कहा जा रहा है की इस प्रकार रेपो रेट और सी आर आर की दरों मैं बढोतरी से बैंक द्वारा दिए जाने वाले ऋणों के ब्याज दरों मैं बढोतरी होगी और ब्याज दरों मैं बढोतरी से बाज़ार मैं उत्पादों और सेवाओ की बढ़ी हुई मांग मैं कमी आएगी । कार लोन , होम लोन और अन्य विलासिता पूर्ण उत्पादों को खरीदने हेतु बैंक से लिए जाने वाले लोन की ब्याज दरों मैं वृद्धि होगी जिससे इन लोन को लेने वालों मैं कमी आएगी और बाजारों मैं उत्पादों की मांग मैं भी कमी आएगी ।
इस बात का बाज़ार पर दूसरा प्रभाव यह पड़ सकता है की बड़े उद्योगों के उत्पादों की मांग मैं कमी और भवनों और घरों के निर्माण और मांग मैं भी कमी आएगी जिससे व्यापार व्यवसाय के क्षेत्र मैं मंदी का दौर आने की संभावना है। हो सकता है इससे देश के आर्थिक विकास मैं भी इसका प्रभाव पड़े ।
दूसरी ओर कम आय वाले मध्यम ओर निम्न आय वाले उपभोक्ता वर्ग पर इसका प्रभाव नगण्य माना जा सकता है , क्योंकि यह वर्ग ऐसा है जो इस तरह के लोन लेने हेतु बैंक कम ही जाता है , उसे तो सिर्फ़ अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन जुटाने की आवश्यकता होती है ।
अतः सरकार के इस कदम से यह माना जा सकता है की इससे केवल उच्च वर्ग के उपभोक्ता ही प्रभावित होंगे साथ ही बड़े उद्योगपति और व्यवसाई के कारोबार पर प्रभाव पड़ेगा । मध्यम और निम्न वर्ग का आम जन इससे अप्रभावित रहेगा । आशा की जानी चाहिए वित्तमंत्री के प्रयास से बढती हुई मंहगाई को काबू करने मैं देर सबेर सफलता मिलेगी ।

बुधवार, 25 जून 2008

पहले से क्या जोखिम कम थे !

इंसान की जिंदगी हमेशा से जोखिमों से भरी रही है । इंसान ही है जो अपने आस पास होने वाली जोखिम भरी हर प्राकृतिक और कृत्रिम गतिविधियों से संघर्ष करते हुए मिलजुलकर उनसे सामंजस्य बैठाने का प्रयास करते हुए आया है । चाहे वह कोई प्राकृतिक आपदा जैसे आंधी , तूफ़ान , बाढ़ , भूकंप और भीषण अकाल और सुखा हो या घातक और नुकसानदायक जीव जंतु हो या फिर मानव निर्मित आतंकी गतिविधिया हो या सड़क दुर्घटना , मारपीट और खून ख़राब जैसी घटना हो । इस प्रकार पहले से ही इंसान के लिए जीवन काफ़ी कांटो भरा और संघर्ष पूर्ण रहा है । किंतु आए दिन होने वाले प्रदर्शन जो की हिंसक होते जा रहे है न जाने उनसे किसी भी इंसान का कब और कैसे वास्ता पड़ जाए कहा नही जा सकता है । कब और कंहा इंसान को अपनी जान जोखिम पर डालना पड़े, बिन बुलाए मुसीबत कब आन पड़े , इन होने वाले प्रदर्शनों के दिनों दिन होते उग्र और हिंसक रूप को देखते हुए कुछ कहा जाना मुश्किल है ।
बाज़ार या फिर किसी काम से बाहर निकले हो या फिर किसी यात्रा पर निकले हो और अचानक कोई आन्दोलन और प्रदर्शन होने लगे तो वही फंसे रहने और प्रदर्शन के हिंसक होने पर जान माल के नुक्सान का जोखिम बना रहता है । उस इंसान को जिसका कोई सम्बन्ध इस प्रकार के आन्दोलन और प्रदर्शन से दूर दूर तक कोई वास्ता नही रहता है उसे वेवजह ही परेशानी उठानी पड़ती है और अपनी तथा परिवार वालों की जान जोखिम डालनी पड़ती है । यंहा गौर करने वाली बात यह है की देश के नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन संस्थाओं और लोगों पर होती है वे ऐसे परिस्थितियों मैं किं कर्तव्य बिमूढ़ बने रहते हैं । उन्ही के सामने आन्दोलनकारी बेगुनाह लोगों पर अपना आक्रोश और गुस्सा उतारते रहते हैं और लोगों की निजी संपत्ति और सार्वजानिक संपत्ति के साथ तोड़फोड़ कर आग के हवाले करते हैं ।
ऐसी परिस्थतियों मैं अब क्या इंसान अपने को सुरक्षित कह सकता है ? अब तो यह सोचकर घर से बाहर निकलना पड़ेगा कब अचानक घर की और सुरक्षित वापसी असंभव हो जाए , या कब बिन बुलाए ही मुसीबत छप्पर फाड़ कर आ जाए । क्या इस प्रकार से आक्रोश और गुस्सा के रूप मैं सामूहिक रूप से बढती हिंसक प्रवृत्ति पर रोक लग सकेगी ? यह एक यक्ष प्रश्न अब हर इंसान के मन मैं कोंधने लगा है ।

सेना मैं सेलरी का बढ़ाना एक अच्छा कदम है !

सेना मैं अपने वेतन को लेकर काफी दिनों से असंतोष और आक्रोश चला आ रहा था , साथ ही सेना के जवानो का मनोबल भी गिरते चला आ रहा था । उसी के चलते सेना से काबिल अधिकारीयों के व्ही आर अस लेने के मामले बढ़ रहे थे । कठिन परिस्थितियों मैं उनकी सेवाओ और जोखिम को देखते हुए सेना के जवानों और अधिकारीयों का वेतन देश की सिविल सर्विस की अपेक्षा काफ़ी कम था । बढती मंहगाई और जरूरतों को देखते हुए सैन्य सर्विस के इतर देश की अन्य सर्विस मैं वेतन और सुबिधाओं को अ च्छा खासा बढाया जाता रहा है । सेना के प्रति इसी प्रकार के उपेक्षित व्यवहार को देखते हुए देश के युवाओं का रुझान सैन्य सेवा के प्रति कम होता जा रहा है ।
सरकार द्वारा सैन्य अधिकारीयों और कर्मचारियों के आक्रोश और सिविल सर्विस और सैन्य सर्विस के बीच के असंतुलन को कम करने का एक सराहनीय प्रयास किया गया है । इससे निःसंदेह सेना मैं वेतन को लेकर पनप रहे असंतोष मैं कमी आएगी और सैन्य कर्मचारियों के मनोबल मैं भी बढोतरी होगी ।
जिन लोगों के हाथ मैं देश की सीमाओं और देश के अन्दर जान माल की सुरक्षा का जिम्मा है , जिनके सतर्क चौकसी और सेवा से देश के लोग अपने को सुरक्षित महसूस करते हुए चैन की नींद सोते है , जो अपने घर परिवार से दूर रहकर एकांत और दुरूह जीवन जीते है , जान हथेली पर लेकर अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का कर्मठता से निर्वहन कर रहे हैं । उन सैन्य कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ उपेक्षित सा व्यवहार किया जाना उचित नही है ।
आवश्यक है की इनकी समस्यायों और आवश्यकताओं पर प्रमुखता से ध्यान देते हुए उनका उचित निराकरण जाना किया चाहिए । उन पर आश्रित परिवारों हेतु भी सभी आवश्यक सुबिधायों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए । अतः देश की सेवा मैं लगे नौजवानों की अन्य समस्यायों के निराकरण के प्रति देश की सरकार को इसी प्रकार गंभीरता दिखाना चाहिए और सभी आवश्यक सुबिधायों मुहैया कराना चाहिए ताकि देश के सैनिक सम्मान और गर्व के साथ अपनी सेवा दे सके और इन्हे देखते हुए देश के अन्य युवा भी सैन्य सेवा मैं शामिल होने हेतु प्रेरित हो सके ।

मंगलवार, 24 जून 2008

छोटे परदे पर बड़े परदे के कलाकारों का पदार्पण !

एक ज़माना था जब बड़े परदे के कलाकार छोटे परदे पर अपने को प्रस्तुत करना अच्छा नही समझते । किंतु आज तो छोटा परदा बड़े परदा पर हावी होता नजर आ रहा है । छोटे परदे टीवी पर चल रहा कोई भी मनोरंजन का कार्यक्रम हो उसमे बड़े परदे के कलाकार और हस्तियां नजर आ ही जाती है । चाहे वह डांस प्रतियोगिता हो , गायन प्रतियोगिता हो या फिर कोई सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिता है या फिर अन्य कोई मनोरंजक टीवी कार्यक्रम हो । यंहा तक की टीवी पर उत्पादों के विज्ञापन करते भी नजर आ जाते है ये बड़े परदे के सितारे । आख़िर इस बुद्धू बक्से मैं ये बड़े परदे के कलाकार क्यों समाने लगे ?
देखा जाए तो छोटे परदे ने जिस प्रकार से घर घर मैं घुसपैठ बनाया है उसको देखते हुए अपने शोहरत और शख्सियत को जन जन तक पहुचाने मैं इस पर पदार्पण करना एक फायदे भरा सौदा साबित हो रहा है , वही कई महीनो मेहनत करने के बाद साल मैं एक बार लोगों के सामने आने का मौका मिलता था वही इस छोटे परदे टीवी के माध्यम से रोजाना ही अपने दर्शक और फेन से रूबरू होने का मौका मिल जाता है । फिर महीनो की मेहनत के बाद ही आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है किंतु छोटे परदे मैं तो ऐसा नही है , यंहा तो कम मेहनत और लाभ ज्यादा है । किसी कंपनी के उत्पादों के मिनटों के विज्ञापन मैं ही काफ़ी पैसा मिल जाया करता है ।
एक और जन्हा बड़े परदे के कलाकारों के पदार्पण से छोटे परदे के कलाकारों के अवसर मैं कमी आई है वही आम दर्शक को रोजाना अपने पसंदीदा बड़े परदे के कलाकारों से मुखातिब होने का मौका मिलता है । इनके आने से छोटे परदे मैं दर्शकों को गुणवत्ता युक्त और भव्य प्रदर्शन वाले कार्यक्रम देखने को मिल रहे है ।
पसंदीदा कलाकारों वाले और भव्य प्रदर्शन वाले कार्यक्रमों को देखने मैं एक और जन्हा दर्शक ज्यादा समय बुद्धू बक्से टीवी के सामने बिताने लगा है वही बच्चे अपना स्कूली होम वर्क और आवश्यक कार्यों को छोड़कर इन कार्यक्रमों को देखने मैं अपना समय खपा रहे है । कई युवा और दर्शक तो छोटे परदे मैं आने वाले कार्यक्रमों और फिल्मी कार्यक्रमों को देखने मैं अपना कीमती समय नष्ट कर रहे वह भी अपना काम धाम छोड़कर ।
फिर भी एक सिक्के के दो पहलु को देखते हुए यह कहा जा सकते है की जन्हा बड़े परदे के कलाकारों के छोटे परदे मैं पदार्पण से कुछ फायदे हैं तो वही कुछ नुक्सान भी है , अब तो यह देखने वाले दर्शक पर निर्भर करता है वह इसको किस तरह अपनाता है ?

सोमवार, 23 जून 2008

भारतीय ज्ञान की उपेक्षा क्यों !

देश की विडंबना है की देश पुरातन ज्ञान एवं विज्ञानं की उपेक्षा कर विदेशी ज्ञान और विज्ञानं की और भाग रहा है । उस पुरातन ज्ञान को जिसके आधार पर पहले देश विश्व गुरू का दर्जा हासिल किए हुए थे । विशिष्ट और आमजन इस ज्ञान पर विश्वाश तो करते है और उसे जीवन मैं अपनाते भी है जैसे शुभ मुहूर्त निकलवाना , रत्नों को धारण करना , वास्तुदोष के हिसाब से भवनों का निर्माण कराना , जन्मकुंडली बनवाना , हवन पूजन करवाना इत्यादि इत्यादि कार्य देश के अधिकाँश विशिष्ट और सफल व्यक्ति अपनी सफलता और सुखी जीवन जीने हेतु करवाते है । किंतु अपने को अति आधुनिक साबित करने और रूढिवाद का ठप्पा लगने से बचने की जुगत मैं सार्वजनिक रूप मैं उसकी आवश्यकता और महत्ता को स्वीकारने से बचते है ।
देश का वह पुरातन ज्ञान जिसमे सम्रद्ध प्रकृति प्रदत्त चिकित्सा ज्ञान था , जिसके द्वारा घर और आसपास के ही प्राकृतिक वातावरण मैं विद्यमान चीजो से ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिमारियों का इलाज़ कर लेता था । भविष्य जानने की वह हस्तरेखा विज्ञानं की कला और जीवन पर पड़ने वाले ग्रहों के खेल का ज्ञान जिसमे समय से पहले आने वाली विपत्ति का भाँपकर उससे बचाव के उपाय किए जा सकते थे । रत्नों और पन्नो को धारण करने का ज्ञान जिसमे स्वभाव और परेशानियों के आधार पर धारण कर हर परेशानी का हल ढूँढा जा सकता है । वास्तुशास्त्र का वह विज्ञानं जिसमे दिशाओं और हवाओं की दशा के आधार पर दोष रहित ग्रहों और भवनों का निर्माण किया जाता था । पुरातन कला जिसमे वातानुकूलित भवनों का समुचित निर्माण , जल का उचित सरक्षण हेतु बाबडियों और तालाबों का निर्माण किया जाना । धर्मं ग्रंथों और पुरातन साहित्य और योग शिक्षा के रूप मैं ज्ञान का अपार भण्डार जिसमे स्वस्थ्य और सुखी मानव जीवन जीने की कला और समाज कल्याण का अथाह ज्ञान है ।
किंतु देश मैं इस ज्ञान को नजरंदाज किया जा रहा और विदेशी ज्ञान का अन्धानुकरण किया जा रहा है । इस विदेशी ज्ञान को प्रकृति मैं दखल के रूप मैं अपनाने के दुष्परिणाम को तो हम देख रहे हैं । देशी ज्ञान को न तो शिक्षा मैं सम्मिलित किया गया है , और न ही इसके उत्थान का प्रयास किया जा रहा है । यह सम्रध ज्ञान इसके जानकार लोगों के साथ ही दफ़न होते जा रहा है । इनका दस्तावेजीकरण भी नही किया जा रहा है ।
अतः आवश्यकता है इस ज्ञान को सरंक्षण और संवर्धन करने की । इस अमूल्य एवं प्रकृति से जुड़े हुए ज्ञान को धरोहर के रूप मैं आगामी पीढी हेतु दस्तावेजीकरण कर रखने की । साथ जन कल्याण हेतु इस ज्ञान को अपनाने की ।

शुक्रवार, 20 जून 2008

नाटक से परदा कब गिरेगा !

पहले की ही तरह एक बार फ़िर शुरू हुआ वाम दल और यूं पी ऐ सरकार का नाटक । वाम दल जन्हा खूब धमकी भरे लहजे मैं बात करती है वही सरकार ढुलमुल रवैया अपनाकर मामले को ठंडे बस्ते मैं डालने की कोशिश करती है । परमाणु करार पर फ़िर शुरू हुआ नाटक का हश्र क्या होगा , इसे पहले हुए घटनाक्रम को देखते हुए कोई भी बता सकता है । दोनों पक्ष एक दूसरे को आँख दिखाने का नाटक करते रहेंगे , और मामला वही के वही लटका रहेगा । आख़िर वाम पंथी कब तक देश के लोगों को इस तरह से भ्रमित करते रहेंगे । एक तो सत्ता का मोह ऊपर से विरोध की मजबूरी , एक साथ दो नाव सवार होकर वाम पंथी चलना चाहते है । इस प्रकार की सवारी का भविष्य क्या होगा यह तो देश की जनता ही बतायेगी । दोनों पक्षों के लोग एक तो मिल रहे सत्ता सुख को त्यागना नही चाहते हैं दूसरा जनता के सामने परमाणु करार के न होने या न होने देने का नाटक कर अपने को दोषी नही बनाना चाहते हैं । वाम दल को लगता है की यदि करार हो जायेगा तो आगामी चुनाव मैं कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है इसीलिए भी वह इसे नही होने देना चाहता है , वही कांग्रेस इस करार को करके आगामी चुनाव मैं फायदा लेने की फिराक मैं है ।
किंतु यह कैसा विरोध है स्वयम सरकार का हिस्सा होने के बावजूद बाहर से तो विरोध दिखाते है और अन्दर से उसका समर्थन भी जताते है । यह दुबिधा भरा खेल कब तक खेला जायेगा । लगता है वाम पंथी ने एक नई राजनीति की शुरुआत की है जिसमे साथ साथ रहकर दोस्ती और दुश्मनी साथ साथ निभाई जा सकती है ।
लगता है यह नाटक आने वाले लोकसभा चुनाव तक चलेगा , तब ही इस नाटक से परदा गिरेगा , तब तक देश की जनता को मजबूरन ऐसे नाटक देखना ही पड़ेगा ।

गुरुवार, 19 जून 2008

माफ़ी मांगकर नुक्सान की भरपाई की जा सकती है ?

पिछले कई दिनों से गुर्जरों का आन्दोलन आरक्षण को लेकर चल रहा था । जिसे की आरक्षण की मांग पुरी होने के बाद समाप्त कर दिया गया । इस आन्दोलन के दौरान होने वाली असुबिधा के लिए गुर्जर आन्दोलन के नेता श्री बैसला की ओर से और राजस्थान प्रदेश सरकार की ओर माफ़ी मांगी गई है । किंतु क्या माफ़ी मांगकर इस प्रकार के आन्दोलन मैं होने वाली जन हानि ओर धनहानि की भरपाई की जा सकती है । उन बेचारों का क्या होगा जो स्वयम ओर उसके परिवार का कोई सदस्य इस आन्दोलन के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं से हताहत हुआ है । प्रशासनिक व्यवस्था को बनाने मैं लगे लोग भी इसमे हताहत हुए है । हाँ थोडी राहत सरकार की तरफ़ से आन्दोलन मैं प्रभावित लोगों को नौकरी ओर आर्थिक सहायता देने की घोषणा से जरूर मिली है । यह तो बात उन लोगों की हुई जो प्रत्यक्ष रूप से इस आन्दोलन से जुड़े थे ।
अब बात करते है उन लोगों की जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से मजबूरी मैं इस आन्दोलन से जुड़कर विभिन्न तरह के आर्थिक , मानसिक ओर शारीरिक नुक्सान उठाना पड़ा । उनकी कौन सुध लेगा । इस आन्दोलन की वजह से व्यापारी वर्ग के लोगों को नुक्सान हुआ है उसकी भरपाई कौन करेगा ? वही रेल रोककर ओर सड़क यातायात जाम कर लोगों को उनके गंतव्य स्थान तक जाने से रोका गया । इनमे कई लोग ऐसे रहे होंगे जिन्हें समय पर पहुचना जरूरी रहा होगा किंतु वे समय पर नही पहुच सके , न जाने इस देरी से उनका कितना किस तरह नुक्सान हुआ होगा ये तो वे ही जानते होंगे , किंतु इस प्रकार हुए नुक्सान की भरपाई कैसे होगी यह न तो आन्दोलन कारी बता सकते हैं ओर न ही सरकार ।
इस प्रकार के होने वाले आन्दोलन मैं आमजन को होने वाली असुबिधा के लिए आन्दोलन कारी तो जिम्मेदार होते ही है वही प्रशासनिक व्यवस्था भी उतनी ही जबाबदार होती है । क्योंकि सरकार ओर प्रशासन की यह जिम्मेदारी होती है की जनता सुरक्षित ओर निर्भय होकर शांतिपूर्ण जीवन यापन कर सके । अतः प्रायः देखने मैं यह आता है की ऐसे आन्दोलन मैं सरकार आन्दोलन कारियों के ऊपर लगाम कसने मैं असफल साबित होती है । वे बेधड़क होकर रेल रोकते है , रास्ता जाम करते है ओर राष्ट्रीय ओर सार्वजानिक संपत्ति को नुक्सान पहुचाते है । जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है ।
अतः यह सुनाश्चित किया जाना आवश्यक है की आन्दोलन शान्ति पूर्वक हो ओर उसके आयोजन से आमजनता का कोई परेशानी न हो , न ही राष्ट्रीय ओर सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुक्सान हो । यदि ऐसा होता है तो ऐसे लोगों से शक्ति से निपटा जाना चाहिए । ऐसे माफ़ी मांगकर तो न ही नुक्सान की भरपाई की जा सकती है ओर न ही अपनी जिम्मेदारी से बचा जा सकता है ।

बुधवार, 18 जून 2008

रेणुका जी का सुझाव बहुत अच्छा है !

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका जी ने नाबालिग़ बच्चों के हाथ मैं गाड़ियों की चाबी सौपने वाले अभिभावक को सजा दायरे मैं लाने और उनका लायसेंस रद्द करने का सुझाव दिया है । यदि इस तरह का कानून बनाया जाता है तो आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटना एवं नाबालिग़ उम्र मैं भयानक हादसे के शिकार होने जैसी घटनाओं मैं कमी लाने मैं यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । यह एक सच्चाई है की देश मैं धनाड्य वर्ग के अभिभावक अपने कमसिन और नाबालिग़ उम्र के बच्चे को उनकी बौद्धिक और शारीरिक क्षमता की सीमा को नजरअंदाज कर उन्हें कई ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए जाते है जिनका उपयोग वे ठीक ढंग से नही कर पाते है , परिणामस्वरूप बच्चों को कम उम्र मैं ही भयानक दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है , दूसरी और उनकी कम उम्र की नादानियाँ का खामियाजा कई मासूम लोगों को अपनी जान से हाथ धोकर भरना पड़ता है । इन भयानक दुर्घटनाओं मैं कई बार बच्चे को शारीरिक नुक्सान भी उठाना पड़ता है उनकी छोटी सी गलती उन्हें जिन्दगी भर के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज बना देती है । जिसका खामियाजा बच्चे तो भुगतते ही है साथ ही साथ अभिभावक को भी भुगतना पड़ता है । इससे इतर जो इन दुर्घटनाओं का शिकार होता है वह बेक़सूर तो वेवजह ही मारा जाता है उसे भी कई बार शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज होकर जिन्दगी भर के लिए यह सजा भुगतनी पड़ती है । यदि वह कोई गरीब व्यक्ति है तो उसके लिए जीवन जीना और भी दूभर हो जाता है वैसे ही तो उसको दो जून का भोजन जुटाना मुश्किल होता है तो भला अपाहिज होकर और मनाह्गी दवा वाला इलाज़ कराना तो उसके लिए गंभीर संकट पैदा कर देता है ।

अतः आवश्यक है की सरकार को इस तरह के क़ानून बनाने चाहिए जिससे कम उम्र के नाबालिग़ और नासमझ बच्चों की अवांछित और असयांमित गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके , एक तो इससे बच्चे जो की देश का भविष्य है को भविष्य के लिए सहेजा जा सकता है । साथ ही सड़क मैं होने वाली दुर्घटनाओं मैं कमी लाइ जा सकती है और उसमे शिकार होने वाले बेक़सूर लोगों को भी बचाया जा सकता है।

सोमवार, 16 जून 2008

उच्च शिक्षाओं मैं शिक्षण का माध्यम आमजन की भाषा हो !

कहते हैं की राजभाषा / राष्ट्रभाषा किसी राष्ट्र के विकास और समृद्धि मैं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है , और उसके साथ साथ स्थानीय स्तर की आमजन भाषा का विशेष योगदान रहता है । किंतु वर्तमान परिद्रश्य को देखते हुए लगता है की हमारे देश मैं राष्ट्र भाषा के साथ उपेक्षित और तिरस्कार पूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है । जब तब देश की राष्ट्रभाषा के उपयोग और उसके प्रचार और प्रसार की बात की जाती है किंतु यह बात सरकारी खानापूर्ति , भाषणों और हिन्दी दिवस जैसे समारोह तक सीमित रहती है , उसकी समृद्धि और विकास के लिए वैसे प्रयास नही किए जाते है जैसे की किए जाना चाहिए । यंहा तक की देश के शीर्ष स्तर के राजनेता , सरकारी नुमाइंदे भी अपनी राजभाषा का कम ही उपयोग करते नजर आते है । यंहा तक की उनके अपने बच्चे को वे गैर हिन्दी / गैर स्थानीय भाषा के स्कूलों मैं शिक्षा दिलाते हैं । जो की काफी मंहगे और उच्च स्तर की स्टेटस सिम्बोल वाले होते है । जिसका खर्चा आमजन वहन नही कर सकते हैं । ठीक इसी प्रकार आई आई ऍम और आई आई टी एवं अन्य उच्च शिक्षा प्रदान करने वाली उच्च शिक्षण संस्थाओं मैं भी शिक्षा का माध्यम राष्ट्रभाषा / स्थानीय स्तर की आमजन की भाषा न होकर विदेश भाषा मैं होता है । परिणाम स्वरूप इन विशिष्ट और उच्च स्तर की शिक्षाओं मैं प्रवेश पाने वाले अधिकांश छात्र जो विदेशी भाषा मैं निपुण नही रहते है उन्हें या तो अपने अध्ययन को बीच मैं ही छोड़ देने हेतु मजबूर होना पड़ता है या फिर संस्थाओं द्वारा उन्हें निकाल दिया जाता है , जिससे इस प्रकार की छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित होना पड़ता है । वर्तमान मैं यह प्रचारित भी किया जा रहा है की यदि अच्छा रोजगार और नौकरी प्राप्त करना है तो विदेशी भाषा का ज्ञान होना या फिर विदेशी भाषा मैं शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनी भी इसी प्रकार के लोगों को अपनी कंपनी मैं नौकरी देने को आतुर रहती है । इस प्रकार की समस्या को उन लोगों को सामना करना पड़ता है जिनका आर्थिक और सामाजिक स्तर बहुत कमजोर होता है । इस प्रकार यह बात सामाजिक समानता की नीति पर कुठाराघात करते हुए नजर आती है ।
क्या बात है की हम आजादी की इतने वर्षों बाद भी अपने देश मैं राष्ट्रभाषा / आमजन की स्थानीय भाषा का राज कायम नही कर पाये हैं । अभी तक उच्च शिक्षा के विषयों का माध्यम हमारी राष्ट्रभाषा / आमजन की स्थानीय भाषा क्यों नही हो पायी है । जबकि विश्व के कई देश जिन्होंने अपनी राष्ट्रभाषा को पूरे समान के साथ अपना रखा है आज वे उत्तरोतर विकास कर रहे हैं । जिनमे जापान और चीन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है , तो फिर हमारे देश मैं राष्ट्रभाषा / आमजन की स्थानीय भाषा इतनी उपेक्षित क्यों ?
अतः आवश्यक है की देश के विकास मैं सभी वर्गों और सभी लोगों का बराबर का योगदान मिल सके , इसके लिए यह आवश्यक है की राष्ट्रभाषा / आमजन की स्थानीय भाषा को पूर्ण सम्मान के साथ अपनाया जाना चाहिए । देश की उच्च उच्च से शिक्षण का माध्यम इन देशी भाषा मैं किया जाना चाहिए ।
यंहा किसी भाषा के विरोध की बात नही है वरन राष्ट्र हित मैं राष्ट्रभाषा / आमजन की स्थानीय भाषा को पूर्ण सम्मान के साथ अपनाए जाने की बात है ।

देश के उम्रदराज नेताओं को स्वयं आगे आना चाहिए !

वैसे तो लम्बी उम्र वाले लोगों को अधिक अनुभवी समझा जाता है , और यह माना जाता है की वे अपने लंबे जीवन के अनुभवों से कोई भी कार्य को बेहतर ढंग से कर सकते है , किंतु इसकी एक सीमा होती है । मनुष्य का शरीर एक समय के बाद शिथिलता की और बढ़ने लगता है , समय के साथ उसकी शारीरिक क्षमता और कार्यक्षमता मैं गिरावट आती जाती है , उसी के साथ ही उसके सोचने विचारने की क्षमता मैं भी कमी आने लगती है । यही कारण है की निजी और शासकीय संस्थाओं मैं सेवा की अवधि का निर्धारण किया गया है जिसके अनुसार मनुष्य ६० से ६५ वर्ष की अवधि मैं अपनी पूरी शारीरिक और मानसिक क्षमता से कार्य करने मैं अक्षम हो जाता है ।
किंतु हमारे देश मैं नेताओं ने अपने आप को इन बंधनों से मुक्त रखा है , वे मानते है की उनके लिए सेवा निवृति की कोई सीमा नही होती है । जब ६० से ६५ वर्ष की उम्र मैं एक प्रथम श्रेणी से लेकर चपरासी तक के पदों पर कार्य करने हेतु इंसान को अक्षम माना जाता है तो इतने बड़े प्रदेश और देश को चलाने हेतु बनाए गए अति महत्वपूर्ण पदों हेतु उम्र की सीमा क्यों नही है ? कई बार देखने मैं आता है की देश के उम्रदराज नेता कई महत्वपूर्ण अवसरों मैं थके हुए और सोते हुए पाये जाते है , चाहे संसद की कार्यवाही हो , चाहे कोई सेमिनार हो या फिर कोई जनता से मिलने का या फिर कोई शासकीय आयोजन हो । कई नेता तो ऐसे है जिन्हें ठीक से चलने हेतु भी सहारे की जरूरत होती है । कई ऐसे नेता है जो ७० से ८० का उम्र दशक पार कर चुके हुए है एवं शारीरिक रूप से स्वयं खड़े होने और ठीक से चलने मैं असमर्थ हैं , अभी भी महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान होने की लालसा पाले हुए है । जिस उम्र मैं इन्हे मानसिक शांति और शारीरिक आराम की जरूरत होती है उस उम्र मैं देश के इतने बड़े और महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान रहकर क्या वे अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति सही न्याय कर पाते है , यह या तो वे स्वयं जाने या फिर जनता ।
अतः इन उम्रदराज ६० का दशक पार कर चुके नेताओं की सत्ता लालसा के कारण ही देश को उर्जावान और साहसी युवा नेतृत्व नही मिल पा रहा है । परिणाम स्वरूप देश के विकास और नवनिर्माण हेतु ढुलमुल नीतियों को अपनाया जा रहा है । देश के सामने कोई ठोस और साहसिक निर्णय वाली नीति बनकर सामने नही आ रही है । देश वही पुराने और ढुलमुल रवैया पर चलता आ रहा है । विश्व मैं देश एक सॉफ्ट देश की छवि लिए हुए है । पड़ोसी देश और विश्व मैं भी अंतर्राष्ट्रीय छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । देश का युवा वर्ग भी अपने को उपेक्षित और ठगा सा महसूस कर रहा है ।
अतः आवश्यक है की देश को युवा और साहसी नेतृत्व मिले । देश के उम्रदराज नेताओं को स्वयं आगे आकर युवाओं को देश की बागडोर सौपने हेतु आगे आना चाहिए । साथ ही देश के विकास और नव निर्माण मैं इन उर्जावान युवाओं को अपने लंबे जीवन के अनुभवों से मार्गदर्शन प्रदाय कर उचित रास्ता दिखाना चाहिए ।

गुरुवार, 12 जून 2008

मोबाइल के कुछ नुकसान ऐसे भी !

मोबाइल से होने वाले नुकसान की ख़बर आए दिन समाचार पत्रों मैं और इलेक्ट्रोनिक मीडिया मैं आती रहती है । जंहा मोबाइल से निकलने वाली तरंग और विकिरण से दिल , दिमाग पर बुरा असर पड़ता है वही प्रजनन क्षमता पर भी इसका बुरा असर पड़ने की बात वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है । इसी के मद्देनजर अब केन्द्र सरकार मोबाइल टावर को अस्पताल परिसर और स्कूल परिसर मैं लगाने पर प्रतिबन्ध लगा रही है । साफ है की मोबाइल स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है ।
वही इस सबके इतर मोबाइल के कुछ नुकसान ऐसे भी है जो लोगों व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन मैं व्यवधान पैदा कर रहे है । ये व्यक्ति की निजता को भंग करते प्रतीत होते है । यदि आप कही दोस्तों के साथ मजा कर रहे है या फिर पार्टी मना रहे है और उसी समय आपके बॉस का फ़ोन आ जाए तो , आपका सारा मजा किरकिरा हो जाता है , और कही आप पत्नी को बगैर बताये सैर सपाटे या फिर किसी दोस्त के साथ केंद्ल लाइट डिनर ले रहे हो , और उसी समय पत्नी को फ़ोन आ जाए तो , फिर आपकी खैर नही , एक तो रंग मैं भंग पड़ जाता है और घर जाकर पत्नी की डांट सुनना पड़ेगा सो अलग। गहरी नींद मैं सो रहे है और मस्त मनभावन सपना देख रहे हो और उसी वक़्त मोबाइल की घंटी घनघना उठे , बस क्या है नींद अलग ख़राब और उस पर ख़ास क्षण मैं सपना टूटना बड़ा ही दुखदाई होता है , है न ? यदि किसी से बचते फिर रहे है जैसे कोई उधारी वाला , कोई चिपकू और सर पकाऊ दोस्त या फिर ऐसी दोस्त जिससे अब पीछा छुड़ाना चाह रहे हो , और यदि मोबाइल साथ मैं है , तो बड़ा ही मुश्किल हो जाता है ।
जंहा मोबाइल संचार का क्रांतिकारी माध्यम बनकर विज्ञान का एक वरदान बनकर सामने आया है , वही यह अभिशाप भी सिद्ध हो रहा है , इसके माध्यम से अश्लील , भद्दे और अमर्यादित भाषा वाले एस.ऍम एस महिलाओं को भेजे जा रहे है वही इसकी ऍम ऍम एस सेवा ने तो कहर ही ढा दिया है । स्कूल , कॉलेज या हॉस्टल के साथी दोस्त के या फिर चेंजिंग रूम मैं महिलाओं के अश्लील फोटो और ऍम ऍम एस बनने जैसी घटना ने मोबाइल के विकृत और ओछी मानसिकता के रूप मैं दुरूपयोग को उजागर किया है । इससे महिलाये सार्वजनिक स्थानों मैं अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगी है । इस प्रकार की घटना आधुनिक समाज के लिए एक अभिशाप से कम नही है ।
अतः आवश्यक है की मोबाइल का उपयोग इस प्रकार किया जाए की वह समाज की लिए वरदान साबित हो न की अभिश्राप । जितना मोबाइल का दखल हमारी जिन्दगी मैं बढ़ता जा रहा है उतना ही हमे इससे सचेत , सजग, सतर्क और चोकन्ना रहने की जरूरत है । यह हमारे लिए सेवक ही रहे न की भक्षक या भयानक राक्षस ।

बुधवार, 11 जून 2008

कौन घड़ी आवेंगे भगवान् ।

आस लगाये बैठे हैं कौन घड़ी आवेंगे भगवान् ।
मुम्बई के महिम तट पर मीठा हुआ पानी तो लगा की आए भगवान् ।

मूर्तियों ने दुग्ध पान किया तो लगा की आए भगवान् ।

तस्वीरो से आंसू निकले तो लगा की आए भगवान् ।

मदर टेरसा की तस्वीर से हुआ चमत्कार तो लगा की आए भगवान् ।

चमत्कारिक घटना की आहट कोई हुई तो लगा की आए भगवान् ।

मन्दिर ,मस्जिद , चर्च और गुरुद्वारा गया तो लगा की आए भगवान् ।

साधू संत और फकीर आए तो लगा की आए भगवान् ।

कुम्भ , काबा और बेथलहम पंहुचा तो लगा की आए भगवान्

ईद , दीवाली और क्रिसमस आए तो लगा की आए भगवान् ।

कलियुग के इस दौर मैं भूख , भय और भ्रष्ट आचार से मुक्ति दिलाने

आस लगाये बैठे है , कौन घड़ी आवेंगे भगवान् ।

मंगलवार, 10 जून 2008

तेल का विकल्प खोजना आवश्यक हो गया है .

समस्त विश्व मैं मंहगाई की हा हा कर मची है । जनता बढ़ती हुई मंहगाई से त्रस्त है और सरकार मंहगाई को काबू मैं लाने के हर जतन कर हार गई है । किंतु मंहगाई है की कम होने कार नाम ही नही ले रही है । जिससे उन्हें जनता के क्रोध और नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है , और वोट बैंक से वोटर के दूर जाने के नुकसान को सहना पड़ रहा है ।
क्या करे अंतराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम जो आसमान छू रहे हैं । अब सरकार को भी तो इस कच्चे तेल को बाहर से बढे हुए दामों मैं खरीदना पड़ता है । अब ऐसे मैं सरकार कब तक नुकसान उठाकर इन तेल उत्पाद को कम दामों मैं जनता को उपलब्ध कराते रहेगी , मजबूरन सरकार को जन अलोकप्रिय कदम उठाने हेतु बाध्य होना पड़ रहा है और पेट्रोल , डीज़ल और रसोइगेस के दाम बढाना पड़ रहा है । संभवतः यही स्थिति विश्व के अधिकतर देशों की है ।
यह स्थिति कब तक ऐसे ही चलते रहेगी , कब तक हमे अपनी अर्थव्यवस्था का निर्धारण तेल देशों के इशारे पर करने हेतु मजबूर होना पड़ेगा । यह एक ही एक ऐसा उत्पाद है की जिसने विश्व के सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर अपनी दखल बनाए रखा है । कभी न कभी तो हमे इसका हल निकलना पड़ेगा , ताकि हम स्वतंत्र रूप से अपनी अर्थव्यवस्था को चला सके । अतः अब समय आ गया है की इस समस्या का समाधान समस्त विश्व को मिलकर ढूड़ना होगा । ईधन और उर्जा के अन्य सस्ते , प्राकृतिक और स्थानीय विकल्प को खोजना होगा । सूर्य उर्जा और पवन उर्जा सबसे सस्ते , सरल और सभी जगह विधमान साधन के रूप मैं सिद्ध हो सकते है । बस आवश्यकता है की इन पर और शोध और अनुसंधान कर सर्वसुलभ , सस्ते और तर्कसंगत युक्ति और उपकरण के आविष्कार की , ताकि आम जन अपने सीमित बज़ट मैं रहकर इसको अपना सके । ईधन के जेट्रोफा जैसे अन्य कई वनस्पातिक स्रोत को खोज निकालने की जो स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो सके और जिसको कम लागत मैं उगाकर उसका तेल निकलकर ईधन के रूप मैं उपयोग कर सके । इसी प्रकार ईधन और उर्जा के अन्य विकल्प पर अधिक शोध और अनुसंधान कर उसकी आमजन तक सर्व सुलभता सुनिश्चित करने की ।
इससे निश्चित रूप से विश्व को इन घटते हुए और मंहगे होते हुए ईधन और उर्जा के स्रोतों पर निर्भरता कम होगी । बड़ी धन राशी के देश के बाहर प्रवाह पर भी रोक लगाने मैं मदद मिलेगी । बढ़ती हुए मंहगाई को रोकने और इससे बिगड़ती हुए अर्थव्यवस्था को सवारने मैं भी मदद मिलेगी । तेल उत्पादों के प्रयोग से बढ़ते हुए पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से निपटने मैं भी मदद मिलेगी ।

सोमवार, 9 जून 2008

प्रशासन असहाय और मौन क्यों होता है.

आए दिन राजनैतिक पार्टी , वर्ग विशेष अथवा किसी संगठन द्वारा जुलुश , हड़ताल , धरना या फिर बंद या चक्काजाम का आयोजन कर सरकार अथवा प्रशासन के सामने अपनी मांगो को लेकर खड़े होते है । किंतु आजकल ये आयोजन आमजन के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे है । इन आयोजन मैं भाग लेने वाले प्रतिभागी और उनके नेता और प्रायोजक नेता क़ानून हाथ मैं लिए रहते है . कही रेल को रोकने हेतु पटरियों मैं बैठ जाना या फिर पटरियों को उखाड़ फेकना , सडको पर जाम की स्थिति पैदा करना , कही जनता की निजी संपत्ति अथवा देश प्रदेश की राष्ट्रीय संपत्ति को तोड़फोड़ और आग के हवाले कर नुकसान पहुचाना । प्रदर्शन कारियों और इन आयोजन के प्रतिभागियों द्वारा इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है और प्रशासन और सरकार मूक दर्शक बनी रहकर तमाशबीन बनी रहती है । कानून व्यवस्था का मखोल उड़ता रहता है , वह भी जाने माने और प्रख्यात नेताओं द्वारा जिनसे इसके पालन और शान्ति व्यस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी रहती है .
प्रदर्शन कारियों के रूप मैं मुट्ठी भर लोग उत्पात मचाते रहते है और इतनी बड़ी प्रशासन व्यवस्था असहाय सी खड़ी रहती है । जो आमजनता है जिसका इन आयोजन से सीधे तौर पर कोई सम्बन्ध नही होता है परेशानी झेलने को मजबूर होना पड़ता है . देश व प्रदेश की इतना बड़ा अमला उन लोगों के शान्ति पूर्वक जीने के अधिकार का हनन होते देखते रहती है . सभी को सुरक्षा उपलब्ध कराने मैं व्यवस्था नाकाम सिद्ध होती है ।
जैसा की इस समय गुर्जर आन्दोलन मैं हो रहा है , लोग रेल की पटरी पर बैठे है और कई महत्वपूर्ण रेल रद्द कर दी गई है , जिससे एक तो रेलवे को प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा है , वही आमजन अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुचने मैं असमर्थ और असहाय खड़ी है . सड़कों पर जाम होने से भी आवागमन के साधन बंद हो जाते है . मूलभूत आवश्यकताओं वाली वस्तुओं और दवाइयों का लक्ष्य तक पहुचना मुश्किल हो जाता है , गंभीर मरीजो को अस्पताल जाना , बच्चों का स्कूल और कॉलेज जाना एवं नौकरी पेशा लोगों का गंतव्य तक पहुचना मुश्किल होता है । प्रतिदिन का काम करके रोजी रोटी कमाने वाले लोग ऐसे समय पर काम पर नही जा पाते है , इससे कई बार तो उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता है . क्षेत्र मैं अशांति और तनाव का माहोल बनता है सो अलग . व्यापार , व्यवसाय और देश को भारी आर्थिक क्षति उठाना पड़ता है .
अतः आवश्यक है की इस प्रकार प्रदर्शन जब हिंसक , नुकसान दायक और दूसरे के जीने के अधिकार मैं खलल पैदा करने लगे तो उससे प्रशासन को शक्ति पूर्वक निपटना चाहिए . इस प्रकार के आयोजन होने के पहले इनके प्रायोजक नेताओं को शपथ पत्र प्रस्तुत करते हुए अनुमति प्रशासन से लेना चाहिए , जिसमे इस बात का उल्लेख होना चाहिए की आयोजन से किसी प्रकार की अव्यवस्था पैदा होने या फिर किसी प्रकार की नुकसानी होने या फिर शांति भंग होने पर पूरी जिम्मेदारी उनकी होगी और प्रशासन उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने हेतु स्वतंत्र होगा .

शनिवार, 7 जून 2008

अन्य क्षेत्रो की तरह मंत्रिमंडल मैं भी आरक्षण हो !

सरकार ने सभी शासकीय क्षेत्रों मैं आरक्षण देने का प्रावधान कर रखा है और इसे न्यायालय द्वारा ५० प्रतिशत तक की सीमा निर्धारित कर दी है । सभी क्षेत्रों मैं आरक्षण देने की बात और कई जातियों को वोट बैंक के खातिर आरक्षण के दायरे मैं लाने की बात कई राजनैतिक दलों और राजनेताओं द्वारा की जाती है । और तो और आरक्षण के दायरे को बढाकर इसे अशासकीय और निजी संस्थाओं मैं भी आरक्षण देने की भी बात की जा रही है और इसके लिया क़ानून बनाने की जद्दोजहद की जा रही है । किंतु इस आरक्षण के मामले मैं राजनेताओं और राजनैतिक दलों द्वारा पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है । अवसरवादिता के चलते और अपनी कुर्सी गवाने के चलते आरक्षण के दायरे से मंत्रिमंडल , विधान मंडल और संसद को दूर रखा जा रहा है । कभी इस पर आरक्षण की बात नही की जाती है । यंहा तक की आरक्षित वर्ग के राजनेताओं द्वारा भी इसकी मांग नही की जाती है ।
जिस प्रकार शासकीय नौकरियों मैं आरक्षण दिया गया है ठीक उसी प्रकार देश और प्रदेश के मंत्रिमंडल , विधान मंडल और संसद मैं भी आरक्षण दिया जाना चाहिए । आख़िर आरक्षण को इसमे लागू करने मैं पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों अपनाया जा रहा है । सिर्फ़ निचले स्तर की संस्थाओं जैसे पंचायत और जनपद पंचायत मैं आरक्षण को लागू करने मैं रूचि दिखाई गई है । क्या उच्च वर्ग के राजनेताओं की यह सोच है की आरक्षित वर्ग के लोग इन पदों की जिम्मेदारियां और कर्तव्यों का निर्वहन नही कर सकते है । जो की बिल्कुल ग़लत है ।
ठीक ऐसे ही महिला आरक्षण को लागू करने मैं इन लोगों द्वारा आनाकानी की जा रही है , क्योंकि इनकी पहले से जमी हुई सीट के ख़त्म होने का खतरा जो है । ठीक वैसे ही ५० प्रतिशत आरक्षण मंत्रिमंडल , विधान मंडल और संसद मैं लागू करने मैं मंडरा रहा है । यंहा तक की कुछ एक राजनैतिक पार्टियों छोड़कर अन्य पार्टियाँ अपने संगठन स्तर के पदों पर आरक्षण को लागू करने मैं गंभीरता नही दिखा रही है ।
अतः आवश्यक है की आरक्षण को देश की सभी संस्थाओं मैं समान रूप से लागू कर सभी को समान रूप से आगे बढ़ने और समुचित अवसर प्राप्त करने का हक़ मिले । यह सुनिश्चित करना सरकार का प्रमुख दायित्व है , और यह तभी सम्भव होगा जब सरकार मैं आरक्षित वर्ग के लोगों को भी बराबरी से अवसर और स्थान मिलेगा ।

गुरुवार, 5 जून 2008

कीमत तो बढ़ा दी अब आमजन के आय बढ़ाने के भी उपाय हो !

अंतराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेलों के बढ़ते दामों के मद्देनजर सरकार ने पेट्रोल , डिसल और रसोई गैस की कीमत बढ़ा दी । एक तो वैसे ही पहले से देश मंहगाई का दंश झेल रहा था , जिसे की सरकार रोक लगाने मैं पहले ही असफल रही थी , उस पर इस मूल्य वृद्धि ने गरीब जनता के गीले आंटे मैं और पानी डालने का काम किया है । हो सकता है इसमे अंतराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दामों से देशी तेल कंपनी को घाटे सहन करना पड़ रहा हो , फिर भी एक दम से इतना दाम बढाए जाना आमजन के लिए एक बड़ा अघात के समान है । कीमत बढ़ जाने से निः संदेह अन्य उत्पादों और आवश्यक वस्तुओं की कीमत मैं भी वृद्धि होगी , जिससे आम जनता की जेब ही ढीली होगी ।
समय के साथ साथ कीमतों मैं वृद्धि होना तो लाज़मी है और यह एक क्रमिक घटना है , और उसको रोक पाना किसी भी सरकार के बस की बात नही है , किंतु जिस अनुपात मैं कीमतों मैं इजाफा होता है उसी अनुपात मैं आम जनता के आय मैं भी वृद्धि होनी चाहिए , किंतु ऐसा नही होता है । एक शासकीय सेवक की ही बात करें तो उसके पारिश्रमिक मैं ही बमुश्किल सालों बाद वृद्धि की जाती है , किंतु उस दौरान मंहगाई मैं कई गुना वृद्धि हो जाती है । इस प्रकार वेतन / पारिश्रमिक वृद्धि उनके साथ बेमानी साबित होती है , प्रायः यह देखने मैं आता है की जैसे ही वेतन / पारिश्रमिक मैं वृद्धि की जाती है उसी क्षण बाजारों मैं मूल्य वृद्धि उससे कही अधिक अनुपात मैं हो जाती है । वैसे शासकीय सेवक तक तो ठीक है किंतु वह जनता क्या करे जो सरकार से सीधे तौर पर नही जुड़ी है , वह तो बढ़ती मंहगाई के अनुपात मैं अपनी आय नही बढ़ा सकती है , ऐसे मैं उसका जीना दूभर हो जाता है , दो वक़्त की दाल रोटी जुगाड़ना भी भारी मशक्कत भरा काम हो जाता है । वही व्यापारी वर्ग तो अपने उत्पादों और वस्तुओं की कीमत बढाकर हिसाब बराबर कर लेते है ।
अतः सरकार को चाहिए की जिस अनुपात मैं मंहगाई बढ़ती है उसी हिसाब से प्रतिव्यक्ति आय की गणना कर आमजन की आय बढ़ाने के उपाय किया जाना चाहिए , ताकि आमजन उससे प्रभावित न हो और देश के आमजन के व्यय और खर्च के बीच तदाताम्य स्थापित हो सके । इससे गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती खाई को भी कम करने मैं भी मदद मिलेगी ।

रविवार, 1 जून 2008

अनियंत्रित होती मंहगाई !

मंहगाई है की कम होने का नाम ही नही ले रही है । सरकार द्वारा अपने स्तर से किए गया सारे प्रयास निरर्थक साबित हुए है । यह विडंबना ही है की देश के वर्तमान सरकार मैं दो दो विदेश से शिक्षा प्राप्त अर्थशास्त्री बैठे है फिर भी मंहगाई को नियंत्रित नही किया जा सका है । हर बार यही कहा जाता रहा की सरकार द्वारा उठाये गया क़दमों के फलस्वरूप मंहगाई कुछ दिनों मैं निश्चित रूप से कम हो जायेगी । वैसे भी मंहगाई हेतु किए गए प्रयास सिर्फ़ उपरी स्तर के लगते है । जमीने स्तर पर ये प्रयास कम ही किए गए जान पड़ते है । अर्थशास्त्र से जुड़े ऐसे कदम उठाने का जिक्र किया , जिसका मतलब आम जनता तो जानती नही है । आम जनता के हिसाब से ऐसे कदम नही उठाये गए हैं जिससे मंहगाई कम होने मैं उल्लेखनीय सफलता मिली हो । और तो और देश की मंहगाई को बढ़ते हुए तेल के दाम और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती हुई मंहगाई से जोडा गया । जैसे देश मैं जमाखोरी और काला बाजारी रोकने के लिए कोई ठोस और कड़े कदम उठाये गए हो , खाद्य वितरण प्रणाली को चुस्त दिरुस्त किया गया हो , ऐसा तो अभी तक नजर नही आया है । यदि केन्द्र और राज्य स्तर से ही इस तरह के कदम कड़ाई से उठाये जाते तो शायद मंहगाई को बहुत हद काबू मैं किया जा सकता है । साथ ही सरकार और सरकार के घटक दल मैं ही मंहगाई को लेकर घमशान मचा हुआ है , एक दूसरे को दोष दिया जा रहा है , किंतु मिल बैठकर इसका हल निकलने का प्रयास बमुश्किल ही किया गया है । वाही विरोधी और सत्ताहीन दल बस विरोध के उद्देश्य से विरोध कर रहे हैं । वैसे कर्नाटक के चुनाव मैं मंहगाई से त्रस्त जनता ने अपना संकेत दे ही दिया है । किया यह जा सकता की मंहगाई की समस्या के निराकरण हेतु सर्वदलीय बैठक बुलाई जा सकते थी । अब भुगत तो आम जनता रही है , इन नेताओं और सत्तासीनो का क्या उन्हें तो सारी सुबिधा मिल रही है वह भी जनता के खून पसीनो की कमाई से । इस मंहगाई के जमाने मैं भी अपनी सुरक्षा और सुख सुबिधाओं के पीछे लाखो करोड रूपये खर्च हो रहे है , किसी नेता और सरकार के नुमईन्दे ने अपनी सुख सुबिधाओं मैं कटौती की बात भी नही की ।
अतः यदि जमीने स्तर पर इस तरह प्रयास किए जाते तो संभवतः अनियंत्रित होती मंहगाई को नियंत्रित किया जा सकता था ।