सोमवार, 16 जून 2008

देश के उम्रदराज नेताओं को स्वयं आगे आना चाहिए !

वैसे तो लम्बी उम्र वाले लोगों को अधिक अनुभवी समझा जाता है , और यह माना जाता है की वे अपने लंबे जीवन के अनुभवों से कोई भी कार्य को बेहतर ढंग से कर सकते है , किंतु इसकी एक सीमा होती है । मनुष्य का शरीर एक समय के बाद शिथिलता की और बढ़ने लगता है , समय के साथ उसकी शारीरिक क्षमता और कार्यक्षमता मैं गिरावट आती जाती है , उसी के साथ ही उसके सोचने विचारने की क्षमता मैं भी कमी आने लगती है । यही कारण है की निजी और शासकीय संस्थाओं मैं सेवा की अवधि का निर्धारण किया गया है जिसके अनुसार मनुष्य ६० से ६५ वर्ष की अवधि मैं अपनी पूरी शारीरिक और मानसिक क्षमता से कार्य करने मैं अक्षम हो जाता है ।
किंतु हमारे देश मैं नेताओं ने अपने आप को इन बंधनों से मुक्त रखा है , वे मानते है की उनके लिए सेवा निवृति की कोई सीमा नही होती है । जब ६० से ६५ वर्ष की उम्र मैं एक प्रथम श्रेणी से लेकर चपरासी तक के पदों पर कार्य करने हेतु इंसान को अक्षम माना जाता है तो इतने बड़े प्रदेश और देश को चलाने हेतु बनाए गए अति महत्वपूर्ण पदों हेतु उम्र की सीमा क्यों नही है ? कई बार देखने मैं आता है की देश के उम्रदराज नेता कई महत्वपूर्ण अवसरों मैं थके हुए और सोते हुए पाये जाते है , चाहे संसद की कार्यवाही हो , चाहे कोई सेमिनार हो या फिर कोई जनता से मिलने का या फिर कोई शासकीय आयोजन हो । कई नेता तो ऐसे है जिन्हें ठीक से चलने हेतु भी सहारे की जरूरत होती है । कई ऐसे नेता है जो ७० से ८० का उम्र दशक पार कर चुके हुए है एवं शारीरिक रूप से स्वयं खड़े होने और ठीक से चलने मैं असमर्थ हैं , अभी भी महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान होने की लालसा पाले हुए है । जिस उम्र मैं इन्हे मानसिक शांति और शारीरिक आराम की जरूरत होती है उस उम्र मैं देश के इतने बड़े और महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान रहकर क्या वे अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति सही न्याय कर पाते है , यह या तो वे स्वयं जाने या फिर जनता ।
अतः इन उम्रदराज ६० का दशक पार कर चुके नेताओं की सत्ता लालसा के कारण ही देश को उर्जावान और साहसी युवा नेतृत्व नही मिल पा रहा है । परिणाम स्वरूप देश के विकास और नवनिर्माण हेतु ढुलमुल नीतियों को अपनाया जा रहा है । देश के सामने कोई ठोस और साहसिक निर्णय वाली नीति बनकर सामने नही आ रही है । देश वही पुराने और ढुलमुल रवैया पर चलता आ रहा है । विश्व मैं देश एक सॉफ्ट देश की छवि लिए हुए है । पड़ोसी देश और विश्व मैं भी अंतर्राष्ट्रीय छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । देश का युवा वर्ग भी अपने को उपेक्षित और ठगा सा महसूस कर रहा है ।
अतः आवश्यक है की देश को युवा और साहसी नेतृत्व मिले । देश के उम्रदराज नेताओं को स्वयं आगे आकर युवाओं को देश की बागडोर सौपने हेतु आगे आना चाहिए । साथ ही देश के विकास और नव निर्माण मैं इन उर्जावान युवाओं को अपने लंबे जीवन के अनुभवों से मार्गदर्शन प्रदाय कर उचित रास्ता दिखाना चाहिए ।

2 टिप्‍पणियां:

DR.ANURAG ने कहा…

takat aor daulat ka nasha aisa hota hai ki insaan...ye lalach chod nahi pata.

Udan Tashtari ने कहा…

ये सब झंडे में लिपट कर ही आगे आयेंगे, तब तक तो यह नौजवान ही रहेंगे.