शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

कोसी के कहर जैसे त्रासदी के कसूरबार

बिहार मैं कोसी नदी द्वारा मचाई गई तबाही प्रदेश और देश के लिया बहुत बड़ी प्राकृतिक त्रासदी बनकर सामिने आई है । ख़बरों के अनुसार इसमे 15 जिले के लगभग 30 लाख लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं । इस तबाही के भयावहता को देखते हुए प्रधानमन्त्री द्वारा इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया हैं । इस दुःख एवं विपत्ति की घड़ी मैं प्रभावितों के साथ सारा देश साथ हैं किंतु अब प्रकृति ऐसे विकराल रूप क्यों धारण करने लगी है की जिससे प्रलय जैसे स्थिती पैदा होकर जन धन को भारी क्षति पहुचती हैं । अतः इन सब के पीछे कौन जिम्मेदार हैं ? आख़िर इस तरह की भयावह स्थिति निर्मित होने के पीछे कसूरवार कौन हैं ?

सामान्यतः हर बार के तरह इस बार भी प्रकृति को और सरकार को इस बात के लिए कसूरवार ठहराया जायेगा । प्रभावित लोग प्रशासन की बद इन्तजामी पर प्रशासन को कोसते रहेंगे और इस भयावह त्रासदी को झेलने हेतु मजबूर होंगे । क्या इस प्रकार की त्रासदियों के लिए सिर्फ़ शासन प्रशासन और सरकार दोषी है ? वैसे इस बात से इनकार भी तो नही किया जा सकता हैं , किंतु जितने ये कारक दोषी हैं उससे कंही अधिक जनता भी दोषी है । जी हाँ देश की जनता जो अपने जनप्रतिनिधियों जिनसे सरकार बनती हैं को ऐसी प्रभावी नीति एवं पुख्ता व्यवस्था बनाने हेतु मजबूर नही कर सकी , जिससे भविष्य मैं होने वाली ऐसी प्राकृतिक त्राश्दियों से बचा जा सका एवं जानमाल के होने वाले भारी नुक्सान को कम किया जा सके । अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ते हुए नदियों को दूषित कचरे से पाटकर उसे उथला बना रहे हैं जिससे नदी अपना रास्ता भटककर एवं तटबंध तोड़कर रहवासी बस्तियों मैं अपना रास्ता खोजती हैं । सीमेंट कंक्रीट के जंगल से धरती से को पाटकर बारिश के पानी को धरती मैं न सोखने देकर सीधे अपार जलराशि को नदियों मैं प्रवाहित होने देते हैं । जंगलों को काटकर एवं नए पेड़ पौधे को ना लगाकर प्रक्रत्रिक ऋतू चक्र को प्रभावित कर रहे हैं जिससे असमय एवं असंतुलित बारिश होती हैं जो त्रासदी का कारण बनती है । तात्कालिक फायदे को ध्यान मैं रखकर जनता के हितों के सरोकारों से अगंभीर एवं अदूरदर्शी जन प्रतिनिधि को चुनकर भेजते हैं जो सिर्फ़ अपना और सिर्फ़ अपना ही फायदा सोचते हैं । शासन प्रशासन और सरकार मैं भी तो हमारे बीच के ही लोग होते हैं अत ऐसी सोच वाले लोग ही उनमे होंगे तो स्वाभाविक हैं की शासकीय एवं प्रशासकीय व्यवस्था मैं खामी तो होगी ही । मीडिया भी इस बात के लिए दोषी है की वह भी सिर्फ़ ऐसे त्रासदी होने पर ही शासन प्रशासन एवं सरकार की कार्यप्रणाली पर खोजबीन कर ऊँगली उठाती है , आम दिनों मैं वह भी इस तरफ़ ध्यान नही देता हैं ।

आवश्यक है की प्रकृति के साथ बलात खिलवाड़ और अनावश्यक दखल अंदाजी को बंद किया जावे । प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर उसके हमजोली बनकर चला जावे । आम आदमी भी अपनी जबाबदेही समझते हुए नदियों को प्रदूषित कचरे से पाटने से रोके एवं अपने जनप्रतिनिधियों को इसके पुख्ता इंतज़ाम करने हेतु मजबूर करें । तात्कालिक फायदे को त्याग कर दूरदर्शी एवं सकारात्मक सोच एवं जनता के समस्याओं के प्रति संवेदन शील प्रतिनिधियों को चुनकर सरकार मैं भेजे जो जनहित मैं दूरदर्शी अवं कारगर नीतियां बना सके ।

पुनः स्थापित होने एवं सामान्य स्थिति बहाल होने मैं वर्षों लग जायेंगे , प्रभावित लोगों को अपनों को खोने का एवं अपनी धन संपत्ति एवं ऐश्वर्या खोने का दुःख जीवनभर सालते रहेगा । किंतु अब ऐसे कारगर नीतियों एवं व्यवस्ता बनाने के प्रयास किए जावे की कोसी जैसी भयावह बाढ़ की स्थिति पुनः देश की अन्य नदियों द्वारा ना पैदा की जा सके और कसूरवार बन्ने की स्थिति न बने ।

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

कलाकार की नैसर्गिक प्रतिभा का दम न घुटे !

टीवी चैनल प्रतियोगिताएं का आयोजन कर देश के कला प्रतिभायों को कला प्रदर्शन हेतु समुचित मंच और उचित अवसर प्रदान करा रहे है । जिसमे गायन , नृत्य , हास्य कला , साहसिक खेल और ज्ञान आधारित प्रतियोगिताएं शामिल हैं । टीवी मैं होने वाली इन प्रतियोगिताएं मैं प्रतियोगियों को स्वयं की मौलिक और प्रक्रत्रिक प्रतिभायों के प्रदर्शन का अवसर मिलता है और वे अपने अन्दर निहित प्रतिभा , कला और हुनर को प्रर्दशित करते हैं , किंतु इस समय टीवी मैं कुछ प्रतियोगिताएं जैसे गायन और नृत्य की , जिसमे प्रतियोगी अपनी मौलिक और स्वाभाविक प्रतिभा के स्थान पर सिखर कलाकारों की नक़ल करते दिखायी देते हैं । जैसे की गायन मैं गायक प्रतिभाएं सुप्रसिद्ध गायकों के गाने अपनी मौलिक आवाज़ मैं गाने के स्थान पर हु बा हु नक़ल करते हैं । ठीक इसी तरह नृत्य कला के प्रतियोगी भी नृत्य कलाकारों के नृत्य की नक़ल करते हैं । ऐसी स्थिती मैं ऐसा लगता है की ये प्रतियोगी प्रतिभाएं परंपरागत और पूर्व कलाकारों का अनुसरण और नक़ल कर अपने अन्दर के स्वाभाविक कलाकार को मार रहें हैं ।

सिखर कलाकारों की कला शैली का अनुसरण सिर्फ़ अपनी प्रतिभा को बढ़ाने और निखारने के लिए होना चाहिए ना अपनी स्वाभाविक और मौलिक प्रतिभा को दबाने और ख़त्म करने के लिए । इन प्रतियोगिताएं के निर्णायक मंडल के सदस्य भी प्रतियोगियों को इस तरह करने से नही रोकते हैं , कई बार इन निर्णायक मंडल मैं ऐसे सदस्य होते हैं जो उस कला मैं पारंगत नही होते हैं या फिर उस कला प्रतियोगिता के क्षेत्र के नही होते हैं , ऐसे मैं ये निर्णायक सदस्य प्रतियोगी की प्रतिभाओं को आंके मैं कितना न्याय करते होंगे , यह सोचने बाली बात है ।

इस समय टीवी चैनल द्वारा नई प्रतिभाओं को उनकी कला और हुनर को दुनिया के सामने प्रदर्शन हेतु उचित मंच प्रदान किया जा रहा है साथ ही उनकी कला को परिमार्जित और पल्लवित होने हेतु समुचित अवसर और संसाधन उपलब्ध कराये जा रहे है । टीवी चैनल के ये प्रयास अत्यन्त सराहनीय हैं और वे इस बात के लिए साधुबाद के पात्र हैं । किंतु आयोजित होने वाली प्रतियोगिताएं मैं इस बात पर तबज्जो दी जानी चाहिए की प्रतियोगी कलाकारों की नैसर्गिक , मौलिक और स्वाभाविक प्रतिभा को निखरने का अवसर मिले , ना की उसका दम घुटे । प्रतियोगी को भी इस बात ध्यान रखना चाहिए की सिखर कलाकारों की कला शैली को प्रेरणा और मार्गदर्शन स्वरुप अपनाना चाहिए , और उसका उपयोग अपनी स्वाभाविक और नैसर्गिक प्रतिभा और कला को परिमार्जित और परिष्कृत करने हेतु अपनाए , ना की हु बा हु नक़ल कर अपने अन्दर की नैसर्गिक प्रतिभा को दबाने हेतु ।

बुधवार, 20 अगस्त 2008

हर बार पदकों के लाले क्यों ?

एक एक कर ओलंपिक मैं ज्यादा से ज्यादा पदक जीतने की सभी आशाएं धूमिल होती जा रही है । लगता है हमें मातृ दो तीन पदक से ही संतोष करना पड़ेगा । आख़िर ऐसा क्यों ? इस १०२ करोड़ लोगों के देश मैं जिसकी आबादी पड़ोसी देश चीन से थोडी ही कम है , ओलंपिक मैं पदकों के लाले पड़े हैं । वही चीन पदकों की तालिका मैं प्रथम स्थान बनाकर बढ़त बनाए हुए हैं । क्या हम इन १०२ लोगों मैं १०० - २०० खिलाडी ऐसे नही ढूंढ सकते , जिनमे खेल मैं सिखर तक पहुचने का जज्बा , माद्दा , योग्यता और काबिलियत हो । क्या देश मैं ऐसे दृढ इक्छा शक्ति वाले कुछ अच्छा कर गुजरने की लालसा रखने वाले लोगों की कमी है ।
मेरे से विचार से तो ऐसा नही है । हमारे यंहा ऐसे लोगों की कमी नही है । बस कमी है तो ऐसे लोगों को बिना किसे पूर्वाग्रह के तलाश कर तराशने और उचित अवसर प्रदान करने की । किंतु अभी तक ऐसा नही हो पा रहा है । राजनीती की काली छाया ने खेल की भावना और पवित्रता को धूमिल कर भाई भातीजबाद को बढ़ावा दे योग्यता और काबिलियत को दरकिनार कर दिया है । इसी का ही परिणाम है की हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हर खेल मोर्चे मैं असफल हो जाता है । और देश के खाते मैं पदकों मैं के लाले पड़ जाते है ।
आख़िर क्यों न एक निष्पक्ष खेल नीति बनायी जाए जिसमे बिना किसी आग्रह विग्रह के योग्य और क्षमतावान खेल प्रतिभाओं को अवसर दिया जाए । हर जिला स्तर मैं एवं स्कूल और कॉलेज के माध्यम से खेल प्रतिभाओं को बढ़ावा देकर तराशा जाए । स्कूल और कॉलेज मैं खेल के पाठ्यक्रम मैं अनिवार्य रूप से खेल को एक विषय के रूप मैं शामिल कर उसके प्रायोगिक और व्यवहारिक रूप मैं अपनाया जाना चाहिए । खेल को बढ़ावा देने हेतु इसके लिए आवश्यक इन्फ्रा स्ट्रक्चर और समुचित खेल वातावरण को निर्मित किया जाना चाहिए । खेल प्रतिभाओं हेतु आवश्यक आर्थिक सहायता और छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए । साथ ही इस बात की व्यवस्था रखा जाना चाहिए की जो खिलाडी खेल मैं अपने जीवन का स्वर्णिम समय अर्पित करता है उनके जीवन के संध्याकाल हेतु अथवा खेल के दौरान होने वाले शारीरिक नुक्सान से भरपाई हेतु जीवनोपयोगी सभी आवश्यक सुख सुविधायों की व्यवस्था की जाना चाना चाहिए । इससे निसंदेह हर खिलाडी जी जान से अपना सारा समय सिर्फ़ खेल और सिर्फ़ खेल हेतु बिताएगा और इससे निश्चित रूप से आशाजनक परिणाम सामने आयेंगे और देश को फिर किसी भी अन्तराष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिता मैं पदकों के लाले नही पड़ेंगे ।

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

एक लड़ाई नकारात्मक सोच के अपने ही लोगों से !

आजादी की 61 वी वर्षगाँठ मना रहे हैं . न जाने कितने ही लोगों ने अपने सुखों , पारिवारिक हितों और अपनी जान की परवाह किए बगैर बाहरी लोगों से लड़कर आजादी को दिलाने हेतु अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया होगा और इस मंगल कामना के साथ इस देश को आगामी पीढी के हवाले कर इस जन्हा से रुखसत हुए होंगे की , देश के लोग और देश भय , भूख , भ्रष्टाचार और अराजकता जैसी समस्याओं से मुक्त होकर निरंतर सुख , समृद्धि और विकास के नित नए आयाम और सिखर को छुयेगा . किंतु इन सब से इतर देश मैं अपने ही लोगों द्वारा बनायी जा रही भूख , भय , भ्रष्टाचार और राजनैतिक और सामाजिक अराजकता की बेडियों मैं जकड़ते जा रहा हैं .
आजादी से लेकर अब तक हर क्षेत्र मैं हुए विकास को नकारा नही जा सकता है . किंतु लगता है की देश ने जन्हा स्रजनात्मक द्रष्टि वाले कड़ी म्हणत और दृढ इक्छा वाले लोगों के योगदान से विकास किया है वन्ही नकारात्मक और अरचनात्मक द्रष्टिकोण वाले लोगों द्वारा पैदा की जा रही नित नई समस्याएं जो लोगों का जीना मुहाल कर रही है और देश मैं अशांति और भय का वातावरण निर्मित कर देश के अब तक हुए विकास को धता बता रही .
देश मैं धधकती कश्मीर की आग जो वोट बैंक और दृढ इक्छा शक्ति के अभाव मैं उन्सुल्झी रहकर सारे देश को झुलसाने को तैयार है , कमर तोड़ मंहगाई जो हर प्रयासों के बाद भी दिनों दिन सुरसा की तरह मुंह फाड़ रही है और आम आदमी के लिए संतुलित भोजन को दूर की कौडी साबित कर पेट भरने के लिए दो वक़्त की रोटी जुटाने मैं भी उलझाने पैदा कर रही है , आतंकवाद की समस्या जो इतनी सम्रद्धि होने के वाद भी लोगों को असुरक्षा और भय के माहोल मैं जीने को मजबूर कर रही है , देश मैं उत्पन्न राजनीति अराजकता की स्थिति जिसमे नैतिकता , सैधांतिक वैचारिकता और संवेदनशीलता शुन्य हो गई है , जन्हा देश हित और जन हित गौण होकर सत्ता सुख , व्यक्तिगत और राजनैतिक हित महत्वपूर्ण हो गए है , जन प्रतिनिधियों के खरीद फरोख्त से लेकर हर छोटे छोटे कार्यों मैं रुपयों की बोली लगने लगी है , जिससे ऐसा लगता है की भ्रष्टाचार अब समस्या नही अब जीवन के आम दिनचर्या का हिस्सा है . धर्मं और आध्यात्मिकता को व्यापार और वसाय का रूप देकर और छल कपट की नीति को अपनाकर उसकी आड़ मैं नैतिकता की हदें पार की जा रही है . विरोध प्रदर्शन के नाम पर चक्का जाम , जुलुश और बंद के दौरान लूट , आगजनी , हिंसा और तोड़फोड़ कर राष्ट्रीय संपत्ति को नुक्सान पहुचकर और आम आदमी के जीवन की परवाह न कर मानविय संवेदना को टाक पर रखा जा रहा है .
इन समस्यायों के अब तक तो कोई ठोस और सर्वमान्य हल सामने नही आए है . देश की सरकार और प्रशासन की कार्यशैली को देखते हुए ऐसा लगता भी नही है इन समस्याओं से देश को मुक्ति मिल सकेगी ।

अतः आवश्यकता है अपने ही बीच के नकारात्मक और अरचनात्मक द्रष्टिकोण वाले लोगों से एक लड़ाई और लड़ने की जो देश को भूख , भय , भ्रष्टाचार और राजनैतिक और सामाजिक अराजकता की बेडियों से मुक्ति दिला सके ।

इस आशा और विश्वाश के साथ की यह पर्व देश और देश के सभी लोगों के लिए सुख समृद्दी भरा होगा । सभी को इस राष्ट्रीय पर्व की हार्दिक बधाई ।