मंगलवार, 30 सितंबर 2008

जोधपुर की दुखद घटना - कब समझेंगे सब .

जोधपुर मैं मेहरानगढ़ चामुंडा देवी मन्दिर हुई दुखद घटना का क्या सबब हो सकता है . पहले भी इस तरह की दुखद घटना देश के कई हिस्सों मैं हो चुकी है , जन्हा बड़ी संख्या मैं श्रद्धालु हताहत हुए हैं . किंतु धार्मिक क्रियाकलाओं और पूजा के स्थलों मैं जन्हा की श्रद्धालु की भारी भीड़ दर्शनार्थ और पूजा के कार्यों हेतु जमा होती है घटी इस प्रकार की दुखद घटनाओं से ना ताओ सरकार , ना ही प्रशासन और ना ही जनता ने कोई सबक लिया है । लापरवाही और नजरान्दाजी के परिणाम स्वरुप जोधपुर मैं मेहरानगढ़ चामुंडा देवी मन्दिर दुखद हिरदय विदारक घटना घटित हुई . दुखद घटना मैं मारे गए श्रद्धालु और हताहतों के साथ गहरी सवेंदना है ।
इसको हम प्रशासन की समुचित व्यवस्था बनाने की नाकामी कहें , या फिर वी आई पी को तबाज्जों देकर भक्तों के साथ भगवान् के दरबार मैं भेदभाव का परिणाम कहें या फिर दर्शन और पूजा की जल्दी हेतु अधीर और धैर्यहीन श्रद्धालु की नासमझी कहें . कहा जाता है की वी आई पी सांसद को श्रद्धालु की भीड़ के बीच मैं से दर्शनार्थ ले जाया गया था । यह भी कहा जा रहा है की धैर्यहीन श्रद्धालु द्वारा रास्ते मैं ही नारियल फोडे जाने लगे थे जिसके कारण रास्ता फिसलन भरा हो गया था । और यह हो सकता है की प्रशासन द्वारा भक्तों के संख्या को नजरअंदाज कर पर्याप्त व्यवस्था नही की गई होगी , क्यों नही मन्दिर की क्षमता के अनुपात से अधिक श्रद्धालु को मन्दिर के अन्दर जाने से रोका गया ।
क्यों नही मन्दिर प्रशासन और सरकार ऐसी घटनाओं से सबक लेती है ? क्यों हर धार्मिक उत्सवों और धार्मिक अवसरों के शुभ और पवित्र मौके पर धार्मिक स्थानों मैं इस तरह की दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है . वी आई पी के लिए तो पलकें बिछाई जाती है किंतु आम श्रद्धालु को यूँ ही खतरों से खेलने हेतु छोड़ दिया जाता है ।
जन्हा भक्त और श्रद्धालु अपनी व्यस्तम जीवन से कुछ सुकून और शान्ति के पल बिताने हेतु धार्मिक अवसरों पर इन पूजा स्थलों के देवी देवताओं की शरण मैं मंगल कामना के साथ जाता है . किंतु लापरवाहियों और बदिन्ताजामी के चलते दुःख और शोक झेलना पड़ता है . अपने अजीजों और चहेतों को खोने का भारी श्राप ढोना पड़ता है .
अतः इस ईद और नवरात्र के पवित्र मौके पर ऐसी मंगल कामना की जानी चाहिए की धार्मिक उत्सवों और आयोजन के शुभ अवसरों पर ऐसी दुखद और हिरदय विदारक घटना की पुनरावृत्ति नही होगी . हमारी वी आई पी भी भगवान् के दरबार मैं भी अपने को श्रेष्ट साबित करने से बचेंगे । मन्दिर प्रशासन और सरकार भी ऐसे धार्मिक शुभ अवसरों पर समुचित व्यवस्था करेंगी . साथ ही भक्त और श्रद्धालु भी भगवान् के दरबार मैं शान्ति और धैर्य के साथ शुभाशीष प्राप्त करने हेतु पहुचेंगे .
ऐसी मंगल कामना और श्रद्धा के साथ सभी को ईद और नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

रविवार, 28 सितंबर 2008

महिलाओं की सुन्दरता और बाजारवाद का प्रभाव !

कहा जाता है की सुन्दरता देखने वालों की नजर मैं होती है । यह भी कहा जाता है की तन की सुन्दरता की जगह मन विचार और वाणी की सुन्दरता ज्यादा महत्वपूर्ण होती है । किंतु इस बाजारवाद के युग मैं मन की सुन्दरता हाशिये मैं चली गई है और तन की सुन्दरता श्रेष्ठता हासिल कर रही है । इसी बढ़ते बाजारवाद के प्रभाव के कारण विश्व के लोगों को इस साँप बिच्छू और साधुओं के देश के लोगों मैं अचानक सुन्दरता नजर आने लगी है । और यह सुन्दरता पुरुषों मैं कम महिलायें मैं ज्यादा ढूँढी जा रही है ।। इसी बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण देश की महिलायें विश्व मैं सुन्दरता का परचम लहराती नजर आ रही है ।
महिलायों की सुन्दरता के नाम पर मिस इंडिया , मिस एशिया , मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स जैसी न जाने क्या क्या प्रतियोगिताएं आजकल आयोजित की जा रही है । अब तो प्रदेशों के नाम पर , तो कहीं जिलों के नाम पर ये प्रतियोगिताएं होने लगी हैं और लगता है अब तो मिस मौहल्ला प्रतियोगिता भी होने लगेंगी , अर्थात हो सकता है अब गली गली मैं सुदरता की खोज होगी । और अब तो मिस के मिसेस की भी ब्यूटी प्रतियोगिताएं होने लगी है ।
किंतु प्रश्न उठता है की श्रेष्ठ सुन्दरता की खोज सिर्फ़ महिलायों मैं क्यों खोजी जा रही है । क्या इस देश के पुरूष सुंदर नही होते हैं । क्या पुरुषों मैं सुन्दरता नही होती है । उनके लिए क्यों नही इस तरह की प्रतियोगिताएं की भरमार हैं पुरुषों के लिए बमुश्किल एक्का दुक्का ऐसे प्रतियोगिताएं देखने को मिलेंगी । किंतु महिलायों के नाम पर ऐसी प्रतियोगिताएं की भरमार हैं ।
इसी बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव को देखें तो देश मैं इसका और विस्तृत रूप मिल जायेगा । पहले तो बड़ी बड़ी कंपनियां रिसेप्निस्ट और पब्लिक संपर्क वाली जगहों मैं आकर्षक और सुंदर मुखमुद्रा वाली महिलायों को नौकरी मैं रखती थी , अब तो छोटे छोट दुकानों मैं सुंदर महिलायों को रखा जाना एक चलन सा बनने लगा है ।
इसी बाजारवाद का प्रभाव फिल्मों , प्रिंट मीडिया और द्रश्य और श्रव्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कार्यों मैं भी देखने को मिलेगा । न्यूज़ रीडर , एंकर एवं रिपोर्टर जैसे प्रोफेसन मैं भी आजकल सुंदर महिलायों को अधिक से अधिक स्थान दिया जा रहा है । किसी भी कंपनी के विज्ञापनों मैं चाहे उस प्रोडक्ट का सम्बन्ध महिलायों से हो न हो सुंदर महिलायों को जरूर स्थान दिया जा रहा है ।
अब इस बाजारवाद के प्रभाव के चलते वे महिलायें क्या करें जिनके पास बाह्य सुन्दरता नही है । कई बार उन्हें इसके कारण वाँछित परिणाम पाने मैं असफलता हाथ लगती है और निराशा झेलने पड़ती है भले ही उसके पास बाहरी सुन्दरता के अतिरिक्त सभी गुण विद्धमान हैं । इसी बाजारवाद का प्रभाव यह हो रहा है की आज के युवा वर्ग मैं सुंदर जीवनसाथी पाने की चाह तो होती है भले ही वह दिखने मैं अच्छा न हो । युवा वर्ग अब यह भी चाहने लगा है की उनकी माँ और बहने भी सुंदर हो ।
अतः जरूरी है की बाजारवाद के इस बढ़ते प्रभाव जिसमे आंतरिक गुणों की जगह बाह्य सुन्दरता जैसे गुणों को तरजीह दी जा रही है उसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए । और योग्य और गुणवान लोगों को प्रोत्साहित कर एक स्वस्थ्य समाज के विकास की कामना की जानी चाहिए ।

शनिवार, 27 सितंबर 2008

आतंकवाद की आग मैं घी डालने का काम कर रही है देश की राजनीति !

देश दिनोंदिन आतंकवादी घटना के चपेट मैं आता जा रहा है । अब तो देशवासिओं की हर दिन और हर रात भय के साए मैं गुजर रही है की ना जाने कब और कंहा आतंकवादी घटना हो जाए या फिर विष्फोट हो जाए . देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था चरमरा रही है । देश की खुफिया और सुरक्षा एजेन्सी चिंतित और परेशान हैं की आगे होने वाली आतंकवादी घटना देश की किस स्थान पर होगी और उन्हें किस प्रकार और किस तरह से रोका जाए ।
किंतु देश मैं मची इस आपाधापी के बीच राजनैतिक पार्टी आतंकवाद की आग मैं घी डालने का काम कर रही है । सब अपनी अपनी राजनैतिक रोटी सकने को लगे हैं । विपक्ष सत्ता पक्ष को , तो सत्ता पक्ष विपक्ष को दोषी ठहरा रही है । किंतु इन सब बीच इन लोगों को ना तो जनता की चिंता है और ना ही देश की ।
सत्तापक्ष के कुछ नुमाइंदे पकड़े गए आतंकवादियों की तरफदारी और सरकारी मदद दिलाने की बात कर रहे हैं । सरकारी खर्च मैं उनका कोर्ट केस लड़ने की तैयारी कर रहे हैं । यह पहला ऐसा उदाहरण है की सरकार , सरकार के विरुद्ध लडेगी जो शायद अपने भारत जैसे देश मैं सम्भव है । अब क्या कोई ऐसी संस्था हो सकती है जो अपने विरोधी पक्ष की और स्वयं की पैरवी एक साथ निष्पक्ष ढंग से कर सके । अब इससे देश की सुरक्षा और आतंकवादी घटना को रोकने मैं जी जान से जुड़े जवानों और सुरक्षा कर्मियों के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा । जान जोखिम मैं डालकर जिन्हें पकड़ा आज उनकी ही सरकार उन्हें ही सरक्षण देने मैं लगी है । ऐसे मैं क्या आतंकवाद के इन आरोपियों को उचित सजा मिल पाएगी , यह एक यक्ष प्रश्न देश के सुरक्षा मैं जुड़े जवानों और देश वासियों के सामने मुंह बाएँ खड़ा है ।
अब दूसरी बात यह की क्या किसी व्यक्ति के बुरे कामों को प्रश्रय देकर या अनदेखा कर और इसके लिए उसे दण्डित न कर , आप उसे और बिगडेल बनाने के साजिश कर , आगे और बुरे और ग़लत कार्यों हेतु उसे प्रेरित नही कर रहे हैं । अपने तात्कालिक निजी स्वार्थों के मद्देनजर की गई क्या ऐसी मदद उस दोषी व्यक्ति और समाज के लिए भलाई कही जा सकती है ? यह तो दोषी व्यक्ति और समाज को एक अंधेरे कुंए मैं धकेलने के समान हैं ।
साथ ही यह बात भी ग़लत है की कुछ बहके और नासमझ लोगों के कुत्सित कारनामे के कारण उससे जुड़े सारे समाज को दोष देना भी ठीक नही । जिससे की अन्य लोग भी आक्रोश वश और निराशा वश ग़लत मार्ग मैं जाने को मजबूर हो ।
अतः सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष दोनों की राजनीति देशहित और जनहित को छोड़कर अपने निजी स्वार्थों के मद्देनजर देश मैं बढ़ते हुए आतंकवाद को हवा देने का काम कर रहें हैं जो की बिल्कुल ग़लत है । और इस बात को देश और देश की जनता को समझना होगा ।

बुधवार, 24 सितंबर 2008

ना कोई सीमा ना कोई बंधन - बस एक ब्लॉग और खुलकर कहो बात !

हिन्दी ब्लॉग हम हिन्दी भाषी लोगों के लिए एक सशक्त अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है । हम बेधड़क और बेवाक तरीके से अपनी बात इस माध्यम से अभिव्यक्त कर सकते हैं । ना कोई रोकने वाला और ना कोई टोकने वाला , जो मन मैं है , जो मन मैं द्वंद है , जो कसक है उसे शव्दों मैं पिरोकर व्यक्त कर दो । यंहा कोई सेंसर बोर्ड नही है जो आपकी अभिव्यक्ति पर कांट छाँट कर सके । अतः यंहा पूर्ण अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है । अब वो दिन लद गए जब हमें अभी बात पहुचाने के लिए समाचार पत्रों का माध्यम लेना पड़ता था , और उस पर आपकी बात छपेगी या नही इस बात की कोई गारंटी नही , यदि छाप भी दी गई तो वह भी कांट छाँट के साथ , पता लग जो बात आप कहना चाह रहे हैं उसे छापा ही नही गया । किंतु शुक्र है की ब्लॉग मैं ऐसा नही है । ब्लॉग मैं बात कहने का एक सबसे बड़ा फायदा है की इसमे कोई क्षेत्र ,प्रदेश और देश की सीमा नही है , यह सीमाहीन है , ब्लॉग के माध्यम से अपनी बात रखने का मतलब है अपनी बात को सार्वभोमिक रूप मैं विश्व के कोने कोने मैं बैठे हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी बंधुओं तक पहुचाना । अब तो हम भाषा परिवर्तन की सुबिधा को अपने ब्लॉग मैं जोड़कर अपनी बात को विभिन्न भाषा भाषी के लोगों को पढने हेतु दे सकते हैं यानी की अब भाषा का बंधन भी ख़त्म । साथ ही यह एक तरफा माध्यम नही है की अपनी बात रखने के बाद उस पर लोगों की प्रतिक्रिया न जान सके , यह तो द्वि तरफा मार्ग प्रदान करता है की अपनी बात कहने और लोगों की बात सुनने का अवसर भी प्रदान करता है ।
हिन्दी ब्लॉग सृजनात्मक द्रष्टिकोण एवं लेखन प्रतिभा वाले नए प्रतिभाओं को उचित मंच और अवसर प्रदान करने मैं महत्ती भूमिका निभा रहा है । अतः परिणामस्वरूप हम हिन्दी ब्लॉग जगत मैं नित नए हिन्दी ब्लॉगर का पदार्पण होते देखा जा सकता है ।
अतः हिन्दी ब्लॉग निसंदेह हिन्दी भाषा को पुष्पित और पल्लवित होने का अवसर प्रदान कर उसे विश्व स्तर पर सम्रद्ध और सशक्त बनाने मैं मददगार साबित हो रहा है । अब विश्व की कई वेबसाइट और सर्च इंजन भी हिन्दी मैं आ गए हैं । हिन्दी ब्लॉग और सशक्त और प्रभावशाली बनकर विश्व मैं अपना परचम लहरा सके अतः आवश्यक है की हम विचार अभिव्यक्ति के इस माध्यम का समाज , देश और विश्व हित मैं इसे एक सशक्त माध्यम के रूप मैं प्रयोग करें । देश और विश्व मैं शान्ति , भाईचारा , भलाई और विकास के लिए करें । इसे देश और विश्व मैं फैली विभिन्न समस्यायों के निराकरण और समाधान के मंच के रूप मैं तब्दील करने का प्रयास करें ।
तो फ़िर क्यों न हम ब्लॉग के माध्यम से खुलकर अपनी बात रखें और इसे समाज हित मैं मनन और समाधान का माध्यम बनाएं ।

सोमवार, 22 सितंबर 2008

उम्मीद करें की जांबाज सिपाही शर्मा जी का बलिदान जाया नही जायेगा !

जिस बहादूरी से दिल्ली की ए टी सी सेल के जांबाज ऍम सी शर्मा जी ने देश के लिए बलिदान दिया है जिसे सारा देश कभी नही भुला पायेगा । आज उनके इस बलिदान का ही परिणाम है की दिल्ली के वासी चैन और राहत की साँस ले रहा है नही तो न जाने कितने और धमाके दिल्ली वासी और देश को झेलने पड़ते । उन्ही के ही बलिदान के कारण देश के अन्य राज्यों मैं हुए बम धमाकों के जिम्मेदार लोगों को ढूँढने मैं सफलता मिल रही है । दिल्ली के जामिया नगर के एल- १८ से पकड़े गए आतंकवादी की ही बदोलत देश मैं फ़ैल रहे आतंकवाद की जड़ों तक पहुचने मैं सरकार और पुलिस को मदद मिल रही है ।
बेशक दिल्ली पुलिस और देश की अन्य राज्यों की पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेन्सी दिन रात मेहनत कर धमाकों मैं लिप्त आतंकवादी और आपस मैं जुड़े उनके तार को खोजने लगी हुई है । और इन्ही सतर्क सुरक्षा एजेन्सी और पुलिस के कारण ही आज देश और देश के लोग सुरक्षित महसूस कर रहे हैं । हाँ कुछ खामी हो सकती है और हो सकता है कुछ लोग अपने जिम्मेदारी मैं कोताही बरतते हो , किंतु इस लिहाज़ से सभी को दोष नही दिया जा सकता है । आख़िर वे भी हमारे समाज के बीच के इंसान होते हैं और उनके भी परिवार होते हैं । फ़िर भी उन लोगों द्वारा इन पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाबजूद देश और देश के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी बखूबी निभायी जा रही है । दिन रात एक कर और जान जोखिम मैं डालकर हमारी देश की पुलिस और सुरक्षा एजेन्सी द्वारा आतंकवाद के पीछे छुपे आतंकवादी चेहरे को बेनकाब करने का प्रयास किया जा रहा है । और इसमे इन्हे सफलता भी मिल रही है ।
किंतु जिस बहादूरी से और जान जोखिम डालकर इन आतंकवादी घटना के जिम्मेदार अपराधियों को पकड़ा जाता है उसी अनुपात मैं और उसी जज्वे के साथ हमारा यह तंत्र इन्हे सजा दिलाने मैं नाकाम रहता है । यंहा तक की कोर्ट द्वारा दोषी करार दिया जाने के बाद भी इन्हे सजा मिल नही पाती है । अभी भी पहले पकड़े गए कई आतंकवादी या तो जेल मैं मेहमान बनकर रह रहे हैं या फिर कोर्ट से दोषी सिद्ध हो जाने के बाद भी उन्हें सजा नही दिलाई जा सकी है । संसद परिसर मैं हुई घटना के अपराधी कोर्ट द्वारा दोषी सिद्ध हो जाने के बाद भी उन्हें सजा न मिलना देश की क़ानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह है । ऐसा लगता है की इस घटना मैं शहीद हुए वीर जांबाज सिपाहियों के बलिदान को नजरअंदाज किया जा रहा है ।
ऐसे मैं देश की पुलिस और सुरक्षा एजेन्सी के जांबाज कर्मयोद्धा के मनोबल मैं कमी आना स्वाभाविक है । जिस तेजी से और वीरता को अंजाम देकर हमारे देश के वीर जांबाज द्वारा अपराधियों को पकड़ा जाता है उसी तेजी से और तत्परता से इन्हे सजा नही दिलाई जाती है ।
देश की सुरक्षा मैं लगे जांबाज कर्मयोद्धा का मनोबल और देश भक्ति का जज्बा हमेशा ऊँचा रहे जिसके लिए आवश्यक है की जान की बाज़ी लगाकर पकड़े गए अपराधी को उनकी सजा के अंजाम तक पहुचाना जरूरी है । न्याय व्यवस्था भी ऐसी हो की ऐसे अपराधों की सुनवाई तेजी से की जाए । देश की सरकार और राजनेताओं को भी अपने हितों से ऊपर उठकर ऐसे अपराधियों को जल्द जल्द से सजा दिलवाने का प्रयास किया जाना चाहिए । अतः हम देश वासी आशा करेंगे और भगवान् से प्रार्थना करेंगे की देश के वीर जांबाज कर्मयोद्धा ऍम सी शर्मा जी का बलिदान एवं देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा मैं शहीद हुए वीर जाबांजों का बलिदान जाया नही जायेगा ।

बुधवार, 17 सितंबर 2008

आतंकवाद से भी बडा आतंकवाद !

देश एक नए आतंकवाद से जूझ रहा है , जिसके कारण देश के विकास की रफ़्तार धीमी हो गई है । देश मैं सांप्रदायिकता का जहर घुल रहा है , हर दिन कही न कही जुलुश , प्रदर्शन , धरने और हड़ताल के साथ तोड़फोड़ और आगजनी की घटना हो रही है , देश की बाहरी तथा आंतरिक सुरक्षा खतरे मैं पड़ गई है , देश की अन्तराष्ट्रीय साख मैं बट्टा लग रहा है और अब देश असुरक्षित देश के रूप मैं चर्चित होने लगा है , आस्ट्रेलिया जैसा देश की टीम सुरक्षा कारणों से देश मैं खेलने आने मैं कतरा रहे हैं । अन्तराष्ट्रीय स्तर की , देश की खुफिया एजेन्सी और बाहरी तथा आंतरिक सुरक्षा हेतु लगा तंत्र कमजोर हो रहा है । पड़ोसी देश हमें आँखें दिखा रहे हैं , इसके आतंक से भयभीत होकर सीमापार घुसपैठ होकर आए लोगों को भी देशी नागरिक का दर्जा देने की बात देश के अंदर ही उठने लगी है इस नए आतंकवाद के चलते देश मैं अशिक्षा , बेरोजगारी , गरीबी और जनहित के मुद्दे हासिये पर चले गए हैं और आतंकवाद से देश की सुरक्षा जैसा मुद्दा भी उसके सामने बोना साबित हो रहा है ।
जी हाँ आप सोच रहे होंगे आख़िर कौन से आतंकवाद की बात हो रही है , जी हाँ इसका नाम है वोट का आतंकवाद , यह एक ऐसा आतंकवाद जिसके धमाके मैं बोम्ब से भी ज्यादा देश को नुक्सान पहुचाने की तीव्रता और शक्ति है जिसके के कारण देश के हुक्मरानों की तो बात ही छोड़ दीजिये सत्ता शक्ति होने के बाद भी वे असहाय और मजबूर बने हुए हैं । देश के नेता और जननायक निकम्मे और नकारे साबित हो रहे हैं । वे यह जानते हुए भी की जो वे कर रहे है वह नैतिक और तार्किक द्रष्टि से ग़लत है फ़िर भी वे करने को मजबूर है । यही आतंकवाद की वजह से कल हुई कबिनेट की बैठक मैं टालू निर्णय लेकर एवं पुराना घिसी पिटी बात की गई की आतंकवाद से शक्ति से निपटेंगे वगैरह वगैरह ।
अब जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं इसके नुक्सान पहुचाने की तीव्रता और शक्ति बढती जाती है । इसके आगे देश हित और जनहित के मुद्दे हासिये मैं चले जाते हैं । हाँ किंतु चुनाव नजदीक आते ही इसका आतंक राजनेताओं को कुछ ज्यादा ही परेशान और त्रस्त करने लगता है किंतु देश की जनता कुछ दिनों के लिए ही सही जनता से जनार्दन बन जाती है और इसी समय उनके खूब पूछ परख बढ़ जाती है । तो देखा आपने देश मैं वोट का आतंक कैसे अपना खेल दिखा रहा है और देश को स्थिर और टुकड़े करने को भी अमादा हैं ।
ना जाने इस वोट के आतंक से देश को कब मुक्ति मिलेगी और इसके ख़िलाफ़ लड़ने हेतु कौन सी और कौन रणनीति तय करेगा ? क्या देश की जनता या फिर ...... ????.

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

अजी ये कैसे चयन कर्ता है !

अजी हाँ मैं कोई क्रिकेट , हांकी या किसी खेल की टीम के चयन कर्ता या फिर किसी रोमांचक और साहसिक कार्य के लिए चुने वाले दलों के चयन कर्ताओं की बात नही कर रहा हूँ , जिन्हें की उनके क्षेत्रों के भरपूर ज्ञान और अनुभव रहता है , उनकी एक निर्धारित योग्यता रहती है । उन्हें चयन किए गए या चुने गए उम्मीदवारों को चयन करने के साथ बापस हटाने या बुलाने का अधिकार भी रहता है ।
किंतु यहाँ चयन कर्ता को न कोई योग्यता की जरूरत होती है और न कोई अनुभव की । और तो और उन्हें यह तक नही पता होता है की हम जिस उम्मीदवार का चयन करने जा रहे है उसकी योग्यता क्या है ? उसे हम किस दल और किस टीम और किस कार्य के लिए चुन रहे है यह भी पता नही रहता है । चयन कर्ता इतने कमजोर और इक्छा शक्ति मैं कमी वाले होते हैं की उन्हें साम , दाम और दंड भेद से किसी भी दिशा मैं बहकाया जा सकता है । और यदि वे किसी उम्मीदवार का चयन भी कर लेते हैं तो उसे हटाने या बापस बुलाने का अधिकार भी नही रहता है ।
जी हाँ हमारे लोकतंत्र के मुख्य आधार स्तम्भ है , अर्थात वोटर या मतदाता । न तो उन्हें कोई योग्यता की जरूरत होती है , और न कोई अनुभव की , और न कोई उनके पारिवारिक इतिहास की । बस उन्हें देश का नागरिक होने के साथ उनकी उम्र १८ वर्ष होनी चाहिए । फिर चाहे वह अनपढ़ हो , अपराधी हो या फिर कुछ और । और उनके कन्धों पर उन उम्मीदवारों को चुनने की जिम्मेदारी होती है जो उसके क्षेत्र , जिला , प्रदेश और देश की लाखों करोरों लोगों की भावनाओं और विचारों का प्रतिनिधितव करते है , लोगों की समस्याओं और क्षेत्र के विकास के लिए जिन्हें अथक प्रयास और मेहनत करना होता है ।
इन सब कमियों के चलते ही ताओ आज देश के राजनेता मनमानी करने पर तुले हुए हैं , क्योंकि एक बार चुनने के बाद ताओ कोई हटा नही सकता है . और दूसरी बात यह भी है की उनकी इन कारगुजारियों को आम अनपढ़ और नासमझ मतदाता कितना समाज पायेगा , उन्हें पता है की चुनाव के नजदीक समय पर साम दाम और दंड भेद से इन मतदाताओं को बरगलाया जा सकता है . इस लोकतान्त्रिक देश मैं इन राजनेताओ द्वारा देश का कैसा मजाक बनाया जा रहा है की पढ़ा लिखा और समझदार बुद्धिजीवी वर्ग अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है और मन मसोस कर रह जाता है .

अतः प्रदेश और देश को चलाने वाली टीम का चयन करने वाले चयन कर्ताओं हेतु कुछ तो योग्यता का निर्धारण होना चाहिए । ताकि वह स्व विवेक से अपने वोट के महत्व और चयन किए जाने वाले उम्मीदवार की साख , उसके सामाजिक कार्यों और उसकी योग्यता को देखते हुए फ़ैसला कर अपना अमूल्य वोट दे सकें , और उसे पाँच साल तक किम कर्तव्य बिमूढ़ होकर हाथ मलते रह जाना न पड़े ।

सोमवार, 15 सितंबर 2008

आतंकी घटना पर गृह मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण बैठक .

हमारा गृह मंत्रालय बहुत ही परेशान था की हमारे गृह मंत्री श्री शिवराज जी इस बार बार के आतंकी हमले लो लेकर बहुत चिंतित हैं । आख़िर उनको समझ नही आ रहा था की उनकी परेशानी को कैसे दूर किया जाए । शिवराज जी अपने कार्यालय मैं इधर इस इधर टहल रहे हैं , और मन ही मन बडबडा रहें है की ये आतंकवादियों अति कर दी है । दूसरों राज्यों तक तो ठीक था , अब दिल्ली मैं भी बम विस्फोट कर रहे हैं । मुझे अपने लोगों की सुरक्षा की बड़ी चिंता हो रही है । ठीक उसी समय गृह राज्य मंत्री श्री जय प्रकाश जी आ जाते हैं वे भी बड़े परेशान दिख रहे हैं इन आतंकी हमलों से । तभी शिवराज जी की नजर जय प्रकाश जी पर पड़ती है और वे तपाक से कह उठते हैं की अच्छा हुआ आप आ गए हैं । मैं तो बहुत ही परेशान हूँ दिल्ली मैं हुए इन आतंकी हमलों से । मैं अपने लोगों की सुरक्षा की बड़ी चिंता सता रहे हैं । जय प्रकाश जी बोले कौन अपने लोग , उनका नाम तो बताये अभी खुफिया और सुरक्षा एजेन्सी को भेजकर पता लगा लेते हैं , तभी शिवराज जी बोले अरे मेरे कपड़े सिलने वाले दर्जी , लौंड्री वाले और वह दूकान जन्हा से मैं अपने लिए कपड़ा पसंद करते हूँ , वे ठीक हैं की नही , यार बड़ी चिंता हो रही है , मेरे कपड़े कौन सिलेगा , मेरे कपड़े मैं प्रेस कौन करेगा और मेरी पसंद की दूकान मैं पसंद के कपड़े कैसे मिलेंगा । अब मैं कैसे बदल बदल कर कपड़े पहन पाऊंगा ।
सुनते सुनते श्री जय प्रकाश जी भी अपने को रोक नही पाते हैं , वे भी अपना दुःख सुनाने शुरू कर देते हैं । आप सही कह रहे हैं शिवराज सर , इन आतंकी वादी हमलों के कारण मुझे भी उदघाटन समारोह मैं फीते काटने हेतु जाने मैं परेशानी हो रही हैं , क्या करुँ अब बमुश्किल मैं भी दिन मैं एकाध , दो फीते काटने के समारोह मैं जा रहा हों , क्या करुँ बड़ा परेशान हूँ ।
इसी समय बाहर मीडिया वाले परेशान कर रहे थे की देश मैं इतने आतंकी हमले हो रहे हैं और गृह मंत्रालय क्या कर रहा है ? उसी समय शकील साहब आ जाते हैं , शिवराज जी कहते हैं अच्छा हुआ आप आ गए । बाहर जाओ और मीडिया वाले को सम्भालों , वे ठीक हैं सर कहकर बाहर मीडिया वालों से रूबरू होने आ जाते हैं , और कहते हैं की इसी सम्बन्ध मैं अन्दर महत्वपूर्ण बैठक चल रही है ।
और अन्दर गुफ्त गू चल रही हैं । अंत मैं देश की सुरक्षा एजेन्सी और खुफिया एजेन्सी के प्रमुख बुलाते हैं और उन्हें कहते हैं की शीघ्र ही श्री शिवराज जी के धोबी , दर्जी और कपड़े की दूकान वालों की सुरक्षा के प्रबंध करें । साथ ही जयप्रकाश जी के हर फीते काटने वाले आयोजन के स्थान के कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जाए । इस तरह महत्वपूर्ण बैठक समाप्त हो जाती है ।
और बाहर मीडिया वालों के पास ख़बर आती हैं की बैठक ख़त्म हो गई हैं । और निर्णय लिया गया है की दिल्ली और देश के महत्वपूर्ण ठिकानों की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जायेगी और आतंकवादी घटना से शक्ति से निपटा जायेगा ।

बुधवार, 10 सितंबर 2008

Give and Take पर निर्भर है ब्लॉगर की दुनिया !

ये दुनिया का दस्तूर है की इस हाथ से ले तो उस हाथ से दे । आख़िर जब तक आप दोगे नही तब तक आप कुछ प्राप्त करने की आशा नही कर सकते हैं । सरकारी कामकाजों की तो बात ही छोड़ दो , यंहा तक की भगवान् के पास भी बिना लिए दिए कोई काम नही बनता है । तो अब आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं की ब्लॉगर की इस दुनिया मैं बिना कुछ दिए आपका काम होगा । अर्थात यदि आप चाहते हैं की आपके ब्लॉग को ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े और उस पर ज्यादा से ज्यादा टिप्पणी आए । तो आपको भी दूसरों के ब्लॉग मैं जाकर , पढ़कर उस पर टिप्पणी भी करनी होगी और यह बात सार्भोमिक सत्य की तरह अडिग है । यानी की यह दुनिया Give and Take के सिद्धांत टिकी है ।
हाल ही मैं हिन्दी के वरिष्ट ख्यातिनाम ब्लोग्गेर्स द्वारा ब्लोग्स मैं टिप्पणी की बात पर अपनी बात रखी गई तो , इस बात पर ब्लोग्गेर्स के बीच वैचारिक द्वंद छिड़ गया । वाकई गंभीर बात कही गई है और यह ब्लॉग की दुनिया के लिए बहुत आवश्यक है खासकर हिन्दी ब्लॉग के लिए जिसे की अभी बहुत दूरी तय करनी है अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए । और इस बात पर इतना हंगामा नही बरपना चाहिए ।
यह सच भी है एक तरफा रास्ते से विश्व मैं ज्ञान एवं जानकारी प्रचार प्रसार सम्भव नही हैं । इसके लिए दो तरफा रास्ता खुला रखना होगा । कहा जाता है की अच्छा वक्ता वही हो सकता है जो अच्छा श्रोता भी हो , इसी तरह मेरा मानना है की अच्छा ब्लॉगर वही है जो सिर्फ़ लोगों को अपना ब्लॉग पढने के लिए दे वरन सभी को पढ़े भी और उस पर उचित टिप्पणी भी दे , तभी हम दूसरों से यह अपेक्षा कर सकते हैं की वे हमारे ब्लॉग मैं आकर , पढ़कर उस पर टिप्पणी करें । वैसे भी अपने ब्लॉग की पहुच अधिक से अधिक लोगों तक बने इसके लिए दूसरों के ब्लॉग पर टिप्पणी करने से बेहतर और कोई उपाय नही सूझता हैं । अतः दूसरों के ब्लॉग को पढ़कर उस पर टिप्पणी करने से ब्लॉगर का उत्साह वर्धन तो होगा ही होगा साथ ही हम उसे अपने ब्लॉग पर आने हेतु आमंत्रित करने का अच्छा माध्यम भी प्रदान कर सकेंगे ।
तो महोदय मुझे लगता है की हिन्दी ब्लॉग नित नई बुलंदियों को छुए इसके लिए आवश्यक है की टिप्पणी के माध्यम से हम एक दूसरे के बीच स्वस्थ्य संवाद स्थापित करने की परम्परा को कायम रख सकते हैं । विश्व के कोने कोने मैं बैठे हुए हिन्दी ब्लॉगर बंधुओं से सतत संपर्क बनाए रख सकते हैं और एक दूसरे के उन्नत विचार और ज्ञान को आपस मैं बांटकर अपने और समाज के हित मैं उपयोग कर सकते हैं ।
अतः ब्लॉगर की दुनिया मैं भी Give and Take के सिद्धांत की सच्चाई को स्वीकार कर उसे अपनाना होगा ।

सोमवार, 8 सितंबर 2008

परमाणु करार पर इतनी उदारता क्यों ?

यह देश की लिए बड़े सुकून और खुशी की बात है की देश की उर्जा जरूरतों के मद्देनजर अमेरिका से परमाणु करार को करने हेतु अन्तराष्ट्रीय स्तर के परमाणु इधन आपूर्ति कर्ता देशों ने भी बिना किसी शर्त मंजूरी दे दी है । अर्थात परमाणु करार पर अब भारत और अमेरिका के बीच कोई रोड़ा नही है । यह एक उपलब्धि भरी बात है की भारत द्वारा सी टी बी टी और एन पी टी जैसी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बगैर भारत को उसकी आवश्यकता हेतु अन्तराष्ट्रीय बाज़ार से परमाणु संसाधन सप्लाई करने की मंजूरी मिली है साथ ही यह भी कहा जा रहा है देश को उच्च परमाणु संसाधन तकनीक भी मिल सकेगी । अन्तराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु करार को मिली सहमती पर यह तो हुआ एक उपलब्धि भरा और करार का उजला पक्ष ।
किंतु इस करार पर कुछ प्रश्न देश के सामने अभी अनुतरित और उन्सुल्झे है । जिसका की जवाव अभी मिलना बाकी है । ३४ वर्षा के वनवास के बाद ऐसा अचानक क्या हो गया की सिर्फ़ भारत देश को ही परमाणु अप्रसार सी टी बी टी और एन पी टी जैसी संधि पर हस्ताक्षर किए बिना उसे परमाणु इंधन सप्लाई की अनुमति दी गई ? अमेरिका और परमाणु सप्लाई देश भारत पर इतनी उदारता क्यों दिखा रहे हैं ? क्या अमेरिका जैसा देश अपने किसी बड़े निजी स्वार्थ के भारत देश के प्रति इतना उदार हो सकता है ? कही ऐसा तो नही भारत परमाणु इंधन सप्लाई देशों के लिए एक बड़ा बाज़ार नजर आ रहा है , जिसके मद्देनजर भारत देश के प्रति इतनी उदारता दिखायी जा रही है । कहा यह भी जा रहा है की परमाणु इंधन का उपयोग पर्यावरण और स्वास्थय की द्रष्टि से काफ़ी नुक्सान दायक हैं एवं महंगा भी है और कुछ देश तो उर्जा उत्पादन के इन प्लांटों को बंद करने की मानसिकता बना रहे हैं , हो सकता है इसी के मद्देनजर अब परमाणु संसाधन संपन्न देश अपने इस संसाधन को खपाने हेतु नया बाज़ार ढूँढ रहे हैं ।
अभी भी देश के सामने इस परमाणु करार के कई पहलु को खुलकर नही रखा गया है । १२३ हाइड एक्ट के बारे मैं कोई स्पष्ट बात देश के सामने नही राखी गई है जिससे की देश के सामने अभी भी संशय की स्थिती बनी हुई हैं । वर्तमान सरकार भी अपने कार्यकाल की कोई बड़ी उपलब्धि को दिखाने के चक्कर मैं , हो सकता है देश के सामने इस करार के सिर्फ़ उजले पक्ष को रख रही है ।
काश यह सब आशंकाएं निराधार हो और यह करार देश के हित मैं हो और देश की सभी आवश्यक उर्जा जरूरत पूरी हो , जिससे देश के चहुमुखी विकास मैं कोई बाधा न हो । ऐसी मनोकामना हम सभी देशवासी करते हैं ।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

कुर्सी प्रेम छोड़कर - कुछ ऐसे भी जन सेवा करके देखे !

जनसेवा और देश सेवा के नाम पर सत्ताप्राप्ति हेतु देश की राजनैतिक पार्टी बड़े बड़े आन्दोलन , जुलुश , रेलिया और हिंसक प्रदर्शन करती है , जिसमे लाखों लाखों लोगों को भाड़े पर लाकर इक्कट्ठा किया जाता है , इसमे राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्त्ता बड़े जोर शोर से भाग लेते हैं , एवं मरने मारने पर उतारू होते हैं , इन प्रदर्शन के बहाने आम लोगों को जन जीवन को अस्तव्यस्त करते हैं एवं व्यक्तिगत , सामजिक और राष्ट्रीय संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुक्सान पहुचाते हैं और कभी कभी तो जनहानि करने से भी नही चूकते हैं । साथ ही राजनैतिक प्रदर्शन मैं बैनर , पोस्टर , पम्पलेट और अन्य प्रचार सामग्री मैं काफ़ी पैसा पानी की तरह बहाया जाता है ।
निजी स्वार्थ और सत्ता प्राप्ति के कामों मैं अपने कार्यकर्ताओं की श्रम शक्ति और पार्टी की धनशक्ति को जाया किया जाता है । देश की युवा और मानव शक्ति की उर्जा को नकारात्मक और अरचनात्मक कार्यों मैं नष्ट होने दिया जाता है । कई बार तो ऐसे कामों मैं कार्यकर्ताओं को जान जोखिम तक डालना पड़ता है । साथ ही पैसों का भी अनावश्यक खर्चा भी किया जाता है ।
इस तरह से देश की सभी पार्टी द्वारा धन बल और बाहुबल का प्रदर्शन करते देखा गया हैं , किंतु देश की गंभीर प्रक्रत्रिक अथवा मानवीय चूकों से होने वाली भयंकर त्रासदियों मैं मदद के लिए आगे आते बहुत ही कम देखने को मिलता है । ये राजनैतिक पार्टियाँ तो जन सेवा और मानव सेवा का खूब धिन्डोरा पीटती हैं , किंतु जब सही मैं मानव सेवा और जनसेवा की बात आती हैं तो उनकी भूमिका नगण्य नजर आती हैं । और तो और ऐसे मौके मैं गन्दी राजनीति करने से भी बाज़ नही आते हैं ।
यदि सही मैं जनसेवा और मानव सेवा की भावना इन राजनैतिक पार्टियों मैं हैं तो क्यों नही वे स्वयं कोसी के कहर से हताहत लोगों की सेवा मैं मानव सेवा करने जाते हैं ? क्यों नही अपनी पार्टी के फंड से आवश्यक आर्थिक सहायता उन हताहतों के लिए मुहैया कराते हैं ? क्यों नही अपने कार्यकर्ताओं को कोसी के कहर से प्रभावित स्थानों मैं जन सेवा के लिए भेजते हैं ? उनके कार्यकर्ता जो आन्दोलन एवं प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ और हिंसक घटनाओं मैं जिस अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हैं ठीक उसी तरह का प्रदर्शन बाढ़ मैं फसे लोगों को निकालकर और उनकी जान बचाकर क्यों नही करते हैं । क्या राजनैतिक पार्टी जनसेवा के नाम पर कोसी के कहर मैं बिस्थापित और हताहत हुए लोगों के पुनर्वास की जिम्मेदारी लेंगी ?
अतः देश की राजनैतिक पार्टियों को सत्ता प्रेम को छोड़कर ऐसे भी जनसेवा और मानवसेवा करके देखना चाहिए। अपनी और अपने कार्यकर्ता की उर्जा को सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों मैं लगाने हेतु प्रेरित करें । निःसंदेह यह जनसेवा का एक अच्छा अवसर हैं ।
क्या देश की राजनैतिक पार्टी ऐसा करेंगी ?

त्राश्दियों मैं हताहतों की मदद का विकृत रूप ?

विश्व या देश के किसी भी कोने मैं प्राक्रत्रिक आपदाओं जैसे बाढ़ , भूकंप , तूफ़ान अथवा सूखा अथवा मानव चूक से पैदा होने वाली कृत्रिम आपदाएं हो , इस प्रकार की घटित होने वाली भयंकर आपदाओं मैं देश विदेश से मदद के लिए कई हाथ आगे आते हैं । व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से लोग मदद के लिए सामने आते हैं । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज मैं सामूहिक रूप मैं साथ रहकर , एक दूसरे के सुख दुःख मैं काम आकर अपने जीवन का निर्वहन करता है । इसी स्वाभाविक वृत्ति के कारण मनुष्य अपने आसपास के लोगों की अपने सामर्थ्य के अनुसार दुखित और किसी घटना मैं पीड़ित लोगों की मदद करता है । सामान्तया दवाएं , भोजन , कपड़े एवं जीवन हेतु आवश्यक वस्तुओं अथवा आर्थिक सहायता के रूप मैं हताहतों की मदद की जाती है ।
कई बार ऐसी मदद तो निःस्वार्थ भाव से अंतरात्मा की आवाज पर स्वतः स्फूर्त होकर की जाती है । किंतु कई बार ये मदद दिखावा अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा के मद्देनजर मजबूरी बस की जाती है , जिसमे इसका खूब प्रचार प्रसार किया जाता है । इसी प्रकार कई बार यह देखने मैं आता है की मदद स्वरुप पहुचाई जाने वाली आवश्यक सामग्री अथवा आर्थिक राशि पीडितों तक पहुच ही नही पाती है । सरकार अथवा प्रशासन द्वारा प्रदान की जाने वाली लाखों करोरों रूपये की मदद प्रशासन मैं बैठे बीच के लोगों द्वारा ही पचा ली जाती है जिससे हताहतों और पीडितों को इन मददों के आभाव मैं भारी दुःख एवं कठिनाई झेलनी पड़ती है । यह देखने मैं भी आता है कई लोग मदद के नाम पर हताहतों और पीडितों के बीच कीमती सामानों के लालच मैं जाते हैं । लोग शहर और बस्तियों मैं निकलकर हताहतों के नाम पर चंदा एवं आर्थिक सहायता मांगते हैं , जिसका कोई हिसाब नही रहता है की वे कितना पैसा पीडितों तक पंहुचा रही हैं , अथवा पंहुचा भी रहे हैं या नही । एक चीज और गौर करने वाली है की मदद के नाम पर कई परिवार , घर के मैले कुचेले और फटे कपड़े एवं घर के अनावश्यक समान रुपी कूड़ा करकट को देते हैं , जो की मजबूरी बस दी गई मदद को दर्शाता है और मजबूर और हालात के मारे हुए लोगों के माखोल उडाने के सामान है।
इन सबके बीच ऐसे लोग अथवा संस्था है जो खामोशी के साथ निःस्वार्थ भावना से मदद हेतु आगे आते हैं । ऐसे लोगों की कमी नही है जो जान जोखिम मैं डालकर लोगों की मदद करते हैं । अतः मददों के इन अच्छे पहलु के इतर मददों के विकृत स्वरुप मैं सुधार होना जरूरी है । मदद ऐसी की जाए जो आडम्बर रहित हो , जिसमे कोई मजबूरी न हो । सामर्थ्य के अनुसार ऐसी मदद की जाए की सम्मान के साथ एवं आवश्यकता के अनुरूप , मदद पाने वाले लोगों तक यह मदद पहुचे । उनको भी लगे की इस दुःख और परेशानी की घड़ी मैं हमारे अपने साथ हैं ।