बुधवार, 17 सितंबर 2008

आतंकवाद से भी बडा आतंकवाद !

देश एक नए आतंकवाद से जूझ रहा है , जिसके कारण देश के विकास की रफ़्तार धीमी हो गई है । देश मैं सांप्रदायिकता का जहर घुल रहा है , हर दिन कही न कही जुलुश , प्रदर्शन , धरने और हड़ताल के साथ तोड़फोड़ और आगजनी की घटना हो रही है , देश की बाहरी तथा आंतरिक सुरक्षा खतरे मैं पड़ गई है , देश की अन्तराष्ट्रीय साख मैं बट्टा लग रहा है और अब देश असुरक्षित देश के रूप मैं चर्चित होने लगा है , आस्ट्रेलिया जैसा देश की टीम सुरक्षा कारणों से देश मैं खेलने आने मैं कतरा रहे हैं । अन्तराष्ट्रीय स्तर की , देश की खुफिया एजेन्सी और बाहरी तथा आंतरिक सुरक्षा हेतु लगा तंत्र कमजोर हो रहा है । पड़ोसी देश हमें आँखें दिखा रहे हैं , इसके आतंक से भयभीत होकर सीमापार घुसपैठ होकर आए लोगों को भी देशी नागरिक का दर्जा देने की बात देश के अंदर ही उठने लगी है इस नए आतंकवाद के चलते देश मैं अशिक्षा , बेरोजगारी , गरीबी और जनहित के मुद्दे हासिये पर चले गए हैं और आतंकवाद से देश की सुरक्षा जैसा मुद्दा भी उसके सामने बोना साबित हो रहा है ।
जी हाँ आप सोच रहे होंगे आख़िर कौन से आतंकवाद की बात हो रही है , जी हाँ इसका नाम है वोट का आतंकवाद , यह एक ऐसा आतंकवाद जिसके धमाके मैं बोम्ब से भी ज्यादा देश को नुक्सान पहुचाने की तीव्रता और शक्ति है जिसके के कारण देश के हुक्मरानों की तो बात ही छोड़ दीजिये सत्ता शक्ति होने के बाद भी वे असहाय और मजबूर बने हुए हैं । देश के नेता और जननायक निकम्मे और नकारे साबित हो रहे हैं । वे यह जानते हुए भी की जो वे कर रहे है वह नैतिक और तार्किक द्रष्टि से ग़लत है फ़िर भी वे करने को मजबूर है । यही आतंकवाद की वजह से कल हुई कबिनेट की बैठक मैं टालू निर्णय लेकर एवं पुराना घिसी पिटी बात की गई की आतंकवाद से शक्ति से निपटेंगे वगैरह वगैरह ।
अब जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं इसके नुक्सान पहुचाने की तीव्रता और शक्ति बढती जाती है । इसके आगे देश हित और जनहित के मुद्दे हासिये मैं चले जाते हैं । हाँ किंतु चुनाव नजदीक आते ही इसका आतंक राजनेताओं को कुछ ज्यादा ही परेशान और त्रस्त करने लगता है किंतु देश की जनता कुछ दिनों के लिए ही सही जनता से जनार्दन बन जाती है और इसी समय उनके खूब पूछ परख बढ़ जाती है । तो देखा आपने देश मैं वोट का आतंक कैसे अपना खेल दिखा रहा है और देश को स्थिर और टुकड़े करने को भी अमादा हैं ।
ना जाने इस वोट के आतंक से देश को कब मुक्ति मिलेगी और इसके ख़िलाफ़ लड़ने हेतु कौन सी और कौन रणनीति तय करेगा ? क्या देश की जनता या फिर ...... ????.

4 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सही लिखा है आपने ..

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

बेशक...... बिल्कुल ठीक कहा आपने....

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

आप सही कह रहे हैं. यह वोट का राजनितिक आतंकवाद हर आतंकवाद से बड़ा है. और खुलासा करें तो बाकी सारे आतंकवाद इसी के साए में जन्म लेते है और जवान होते हैं.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बिलकुल सही लिखा हे आप ने, मै सुरेश जी की बात सै सहमत हु.
धन्यवाद