गुरुवार, 23 अक्तूबर 2008

ब्यूटीफुल और हेंडसम की चाहत !

आज की युवा पीढी मैं जन्हा युवक अपने जीवन साथी के रूप मैं एक सुंदर और ब्यूटीफुल लड़की की कल्पना करता है तो वन्ही युवती एक हेंडसम और सुंदर कद काठी वाले लड़के की चाहत रखती है । अतः एक सुंदर घर और सुखद जीवन के लिए हर व्यक्ति एक सुंदर जीवन साथी की चाहत रखता है । वैसे यह सोच वर्षों पुरानी है और जैसे की मानव मन की स्वाभाविक वृत्ति है की वह हमेशा नेत्रों के माध्यम से मन को सुंदर और मनोरम लगने वाली नश्वर और अनश्वर वस्तुओं की और आकर्षित होता रहा है । मानव मन की इसी प्रवृत्ति के कारण ही बाहरी आकर्षण के अतिरिक्त अन्य आंतरिक और छिपे हुए गुणों क्रम बाद मैं ही आता है । अतः इसी स्वभाव के चलते यदि किसी लड़का अथवा लड़की को पहली नजर मैं कोई भा जाता है तो इससे ही संभवतः सुखद अहसास की कोपल मन मैं प्रस्फुटित होने लगती है । इस पहली नजर को सिर्फ़ बाहरी व्यक्तित्व का ही आकर्षण प्रभावित कर पाता है अन्य आंतरिक गुणों का आकर्षण तो बाद की बात रहती है और किसी व्यक्ति के आंतरिक गुणों की और तभी आकर्षित होते हैं जब इसी पहली नजर की पहचान के कारण ही धीरे धीरे दूरियां नजदीकियां मैं बदलती है ।
जैसा की आज के दौर मैं सुन्दरता के मायने सिर्फ़ बाहरी और बाहरी आकर्षण मैं ढूंडा जाता है और इसी बाह्य आकर्षण के कारण ही हेंडसम लड़का ब्यूटीफुल लड़की अथवा ब्यूटीफुल लड़की हेंडसम लड़के की और आकर्षित हो रहें है । जन्हा प्यार की अन्तिम परिणिति दो दिलों के मेल से चलकर दो शरीर के मिलन पर होती है । यह संभवतः इसी अवधारणा के चलते आज लाइव इन रिलेशन शिप की बात की जा रही है । इन सबके इतर इसमे कुछ ही अपवाद होंगे जिसमे ब्यूटीफुल और हेंडसम की अवधारणा को नजर अंदाज कर आंतरिक सुन्दरता को ध्यान मैं रखकर अपने जीवनसाथी की कल्पना की होगी ।
वैसे भी आज की फिल्म और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इसी अवधारणा पर काम कर रही है । और बमुश्किल ही शारीरिक सुन्दरता के अतिरिक्त अन्य बातों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है फिल्मो और टीवी धारावाहिक मैं पहली प्राथमिकता तो ब्यूटीफुल चेहरे वाली नायिका और हेंडसम चेहरे वाले नायक ही होते हैं और उसके बाद ही उनपर अन्य अच्छे गुणों का मुलम्मा चढाया जाता है ।। इससे भी एक कदम आगे बढ़कर अंग प्रदर्शन को सुन्दरता के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है । संभवतः ये ही माध्यम है जो आज की पीढी को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहें है।
फिर भी मानव मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुरूप मानव नेत्रों को भाने वाले सुंदर और मनोहारी अर्थात ब्यूटीफुल और हेंडसम लगने वाली चीजों की और मानव तो आकर्षित होगा ही । किंतु इसके साथ ही अन्य आंतरिक ब्यूटीफुल और हेंडसम गुणों के साथ मन की सुदरता को भी तरजीह दी जानी चाहिए ।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2008

उत्तर भारतियों बंधुओं को अपने क्षेत्र से क्यों पलायन हेतु मजबूर होना पड़ता है .

महाराष्ट्र प्रदेश मैं महाराष्ट्र नवनिर्माण पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा रेलवे की परीक्षा देने आए उत्तरभारतीयों को ढूँढ कर उनकी पिटाई की गई और उन्हें महाराष्ट्र मैं परीक्षा देने से रोका गया और यह कहकर विरोध किया गया की उत्तर भारतियों स्थानियों लोगों के रोजगार और संसाधन का अतिक्रमण कह रहें है । उत्तर भारतियों के विरोध की यह लहर महाराष्ट्र नवनिर्माण पार्टी के प्रमुख राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ताओं की और से पहले भी उठ चुकी है और अब यह विकराल रूप लेती नजर आ रही है । इस तरह का विरोध देश के किसी भी नागरिक को देश के किसी भी कौने मैं जाकर रहने और जीवन बसर करने के अधिकार के विरुद्ध है और इस तरह का कार्य किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपना आधार मजबूत करने और वोट बैंक की राजनीति के तहत किया जा रहा है जो की बिल्कुल ग़लत है ।
फ़िर भी इस बात पर विचार तो किया जाना चाहिए की क्यों उत्तर भारतीय बंधू अपनी जन्मभूमि , माटी , अपने परिवार और अपने लोगोने को छोड़कर अपने प्रदेश से पलायन करने हेतु मजबूर होना पड़ता है । क्यों उन्हें अन्य प्रदेशों मैं रोजगार की तलाश हेतु भटकना पड़ता है और अपमानित होना पड़ता है । देश के हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे को भी राजनीतिक रंग दिया जा रहा है बजाय इस समस्या के मूल मैं जाने के । उत्तर भारतियों के प्रदेश के जननेता जो स्वयम को प्रदेश और प्रदेश की जनता का रहनुमा और जन हितेषी कहते हैं वे इस समस्या को राजनीति रंग देकर और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर जनता को दिग्भ्रमित और उलझाने का कार्य करते हैं । यदि यही जन नेता अपने प्रदेश की विकास और जनहित पर विशेष ध्यान देते और प्रदेश मैं उपलब्ध संसाधन के आधार पर विकास का मूलभूत ढांचा तैयार करते तो ऐसा कोई कारण नही बनता की उत्तर भारतीय बंधुओं को रोजगार की तलाश मैं इधर उधर भटकना पड़ता ।
वैसे इस प्रकार विरोध का स्वर आज नही तो कल उठाना स्वाभाविक था , जो की एक राजनीतिक पार्टी ने जल्द ही लपककर अपना आधार बढ़ाने और ख़ुद को महाराष्ट्रीय मानुष का हितेषी साबित करके वोट बैंक की राजनीति कर रही है । कोई घर का सदस्य यह कैसे बर्दाश्त करेगा की कोई बहार का व्यक्ति उसके संसाधन और सुबिधाओं का उपभोग करे और उसे उसके मूलभूत आवश्यकताओं के अधिकार से वंचित होने के स्थिती मैं खड़ा होना पड़े ।
अतः जरूरी है की प्रदेशों और देश के नीति निर्माताओं और प्रशासन को चाहिए की ऐसी नीतियां और विकास का ऐसा खाका तैयार किया जाए की देश के हर व्यक्ति को उसके स्थानीय स्तर पर रोजगार के साथ साथ जीवन की सभी आवश्यक मूलभूत सुबिधायें उपलब्ध हो , जिससे लोगों को अपनी माटी छोड़कर अन्य प्रदेशों मैं भटकना न पड़े । साथ ही इस बात का ध्यान दिया जाना चाहिए की देश मैं क्षेत्रीय आधार पर वैमनस्यता ना फैले और देश सभी नागरिक का देश के किसी भी कौने मैं जाकर रहने और जीवन बसर करने का अधिकार भी सुरक्षित रहें ।

देश के कदम चंद्रमा पर - कुछ खुशी कुछ गम !

आज स्वदेश निर्मित मानवरहित चंद्रयान -१ को पी एस एल वी - सी ११ से ६:२० मिनट पर पर चाँद पर कदम रखने हेतु छोड़ा गया । देश की अरबों रुपयों के लागत से तैयार यह एक महत्व्कांची परियोजना है निः संदेह यह कदम देश और देश वासियों के लिए वडा ही गौरान्वित करने वाला क्षण था ।
एक तरफ़ तो देश की यह उपलब्धि विज्ञानं के क्षेत्र मैं लगातार बढ़ते हुए कदम हुए कदम की और इंगित करते है । और इस उच्च तकनीक को भारत के अपने बलबूते पर प्राप्त करने और देश को अमेरिका , जापान , रूस और चीन के पंक्ति मैं ला खड़े करने मैं नि संदेह देश के वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं जिनकी कुशाग्र बुद्धि और कड़ी म्हणत से के योगदान से देश को आज यह गौरव प्राप्त हो रहा है । कल तक जो माँओं की लोरियों मैं मामा के रूप मैं और दादी और नानी की कहानियो मैं देवता के रूप विराजमान थे और जिस पर पहुच पाना अकल्पनीय सपना प्रतीत होता था । किंतु भारत ने आज उसे कल्पनाओं और सपनो की दुनिया से निकालकर सच और यथार्त मैं उसको स्पर्श करने उस पर पहुचने हेतु अपने साहसिक और महत्व्कांची कदम आगे बढाया है । इतने खर्चीले मिशन का उद्देश्य बताया जा रहा है की इससे प्राप्त होने वाली सूचनाएं का विश्लेषण कर इसका उपयोग मानवहित मैं करने की योजना है । कहा जा रहा है की चाँद मैं हीलियम ३ का अपार भण्डार है जिसका प्रयोग देश की उर्जा जरूरत मैं किया जा सकता है । इसी प्रकार चाँद मैं बहुत सारे क्रटर जिसमे भारी मात्रा मैं निकिल और प्लेटिनम जैसी धातुएं पाई जाती है जिसको भी भविष्य मैं प्रथ्वी परिवहन कर लाया जा सकता है । अतः इससे आने वाले भविष्य मैं ग्रहों पर पहुचने के इस प्रकार के मिशन से मानवहित के काम किए जा सकेंगे ।
दूसरी और देश जन्हा अरबों रुपयों खर्च करके चाँद पर कदम रखने जा रहा है वन्ही इस देश मैं आज भी एक गरीब इंसान के लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना दूर की कौडी साबित हो रहा है । देश मैं सभी को शिक्षा , स्वस्थ्य और सुरक्षा उपलब्ध कराने की स्थिती दिनों दिन बिगड़ती जा रही है । अभी भी देश के कई हिस्से और कई लोग ऐसे हैं जिन्हें अभी भी बिजली की सुबिधा , स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध नही है और ठीक से पहुच मार्ग भी नही है ।
ऐसे मैं देश का चंद्रमा की और कदम बढाना जन्हा एक और गौरान्वित होने और सुखद अहसास से मन को भर देता है वन्ही देश की यथार्त स्थिति और जमीनी हकीकत को देखकर मन मायुश और दुखित भी होता है । फ़िर भी आशा की जानी चाहिए की देश हर क्षेत्र मैं ऐसे ही नया नए कीर्तिमान स्थापित करे साथ ही देश सभी लोगों को भी मूलभूत आवश्यकताओं के साथ सभी के सुखद जीवन की व्यवस्था भी हो सके ।

रविवार, 19 अक्तूबर 2008

क्या चुने हुए जनप्रतिनिधि / सरकार सभी जनता / देश का प्रतिनिधित्व करती है !

भारत के सत्ता शासन मैं जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार बैठती है , जो की जनता की भावना और अकान्छाओं के अनुरूप कार्य करती है । इस सरकार मैं देश के प्रदेशों के विभिन्न क्षेत्रों से जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है । किंतु यक्ष प्रश्न है की आज की स्थिती मैं यह चुनी सरकार और चुने हुए प्रतिनिधियों को समस्त जनता की भावना और अकान्छाओं का प्रतिनिधित्व माना जा सकता है जन्हा की आज कल के चुनाव मैं देश की सभी जनता द्वारा मतदान मैं भाग नही लिया जा रहा है । आजकल के चुनावों का मत प्रतिशत बमुश्किल से ५० से ६० प्रतिशत होता है । ऐसी स्थिती मैं यह माना जा सकता है लगभग आधे जनता द्वारा अपना मत जनप्रतिनिधियों के प्रति नही दिया गया है । यदि चुनाव मैं कुल मत ५० से ६० फीसदी पड़ते है और यह माना जा सकता है की जीते हुए उम्मीदवार को इससे आधे मत यानि की २५ से ३० प्रतिशत प्राप्त होते होंगे एवं लगभग आधे से कम अर्थात २५ फीसदी से भी कम मत उसके बाद वाले उम्मीदवार को मिलते होंगे , और लगभग १० प्रतिशत से अधिक मत अन्य बाद वाले उम्मीदवार को मिलते होंगे । अर्थात यह कहा जा सकता है की विजयी अर्थात चुने हुए उम्मीदवार को मातृ २५ से ३० प्रतिशत मत प्राप्त होंगे । तो ऐसे मैं कैसे कहा जा सकता है की चुना हुआ उम्मीदवार उसके क्षेत्र की समस्त जनता की भावना और आकान्छाओं का प्रतिनिधिव करते हैं । इसी प्रकार यह भी कैसे कहा जा सकता है उसकी अभिव्यक्ति और प्रतिनिधित्व समस्त देश देश का है या वह देश की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करती है । यदि सरकार के बात करें तो उसमे तो देश के अलग अलग प्रान्तों , प्रदेशों और क्षेत्रों से जन प्रतिनिधि चुनकर आते हैं और वे अपने क्षेत्र के समस्यायों और लोगों की भावना के अनुरूप वादा निभाने की भावना से आते है और देश के अन्य क्षेत्रों की समस्यायों और भावना को समझ और जान पाना उनके लिए पूरी तरह सम्भव नही हो पाता होगा ।
अतः चुने जन प्रतिनिधियों को उसके समस्त क्षेत्र की जनता का पूरा मत नही मिलता है और सरकार को जब देश की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व नही मिलता है तो यह कहा जा सकता है की आधे से अधिक जनता के द्वारा नकारे गए ये जनता के प्रतिनिधि और सरकार समस्त जनता के जनभावना के अनुरूप काम करने मैं पूरी तरह सफल नही हो पाते है , और जो नीतियां और योजनायें बनती है वे भी सभी जनता की भावना , जन आकान्छाओं और आवश्यकताओं और समस्यायों के अनुरूप नही बन पाती होगी , जिससे सरकार की नीतियां अधिकतर मामले मैं पूर्णतः सफलता के चरम पर नही पहुच पाती है । अतः यह कहा जा सकता है की आधा अधूरा जनमत से सही जनप्रतिनिधि चुनकर नही आ पाते हैं और वे क्षेत्र और देश की समस्त जनता की जन भावनाओं की अनुरूप कार्य नही कर पाते है और इस आधार पर उनकी किसी अभिव्यक्ति को समस्त जनता की अभिव्यक्ति नही माना जा सकता है । ऐसी स्थिती प्रजातंत्र की सफलता पर भी प्रश्चिन्ह लगाती है जनता की तरफ़ से नो वोट के विकल्प की मांग उठाना और भी गंभीर स्थिती को प्रर्दशित करती है जो की अत्यन्त विचारणीय है ।।

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

वादा और वचन की तबियत बिगाड़ रखी है राजनेताओं ने .

जी हाँ वादा , वचन या आश्वाशन और इंग्लिश मैं कन्हे तो प्रोमिस । अब जीवन मैं इन शब्दों का उपयोग बेमानी सा लगने लगा है । अब लोग किए गया वादा , वचन और आश्वाशन पर विशवास नही कर रहे है । क्योंकि इन राजनेताओं ने इन शब्दों के साथ खेलकर और अपने राजनैतिक हितार्थ इनका मन माफिक प्रयोग कर इनकी तबियत ख़राब कर रखी है । वैसे ही जैसे भगवान् राम के नाम को किसी एक पार्टी से जोड़कर देखना , रंगों एवं प्रतीकों को किसी अन्य पार्टी से जोड़कर देखना वैसे ही अब इन शब्दों को राजनेताओं की भाषा से जोड़कर देखा जाना लगा है । अब वो दिने गए जब वादा और वचन का बड़ा महत्व होता था । दिया गया वादा और कही गई बात पत्थर की लकीर होती थी । भगवान् राम के युग मैं तो प्राण जाए पर वचन ना जाए के धर्मं का पालन किया जाता था । प्रेमी भी वादा और आश्वाषणों जैसे शब्दों का प्रयोग करने से कतराने लगे है । अब वे प्रेमी अथवा प्रेमिका द्वारा किए गए वादों विशवास करने मैं संकोच करने लगे हैं । अब कसमों और वादों पर बने हुए गाने भी बेमानी लगने लगे है , जैसे वादा रहा सनम होंगे न जुदा सनम , जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा , वादा करले साजना तेरे बिन मैं न रहू मेरे बिन तू न रहे इत्यादि इत्यादि ॥ वही कुछ दूरदर्शी गीतकार ने यह भांप लिए था की वादा और वचन शब्द का क्या हश्र होना है तो उन्होंने ने कुछ ऐसे गीत लिख डाले जैसे कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या , क्या हुआ तेरा वादा , मिलने की कोशिश करना वादा कभी न करना वादा तो टूट जाता है आदि आदि । इसी कारण आजकल की फिल्मों मैं तो प्रेमी और प्रेमिका के वादा और अश्वाशानो वाले द्रश्य भी कम ही देखने को मिलते हैं । इसी का ही प्रभाव है की आजकल की युवा पीढी बंधन और जीवन भर साथ निभाने वाली शादी और विवाह जैसे संस्था से परहेज करने लगे हैं और लाइव इन रिलेशन शिप को अपनाने को महत्त्व दे रहें है ।

इन शब्दों से विश्वास इतना उठ गया है की अब हर कही गई बात का लिखित प्रमाण मांगने लगे हैं । क्योंकि इन राजनेताओं के रोज बदलते बयानों और वादों ने इतनी छबि ख़राब कर रखी है । इनके चुनाव के समय किए वादों और आशावाशानो को पूरा होने की रास्ता देखते देखते लोगों की नजरें सूख जाती है और अगले पाँच साल बाद फिर नया वादों और अश्वशानो के साथ खड़े हो जाते है और उनसे यह भी नही पूछ पाते है की क्या हुआ तेरा वादा । जो ज्यादा पूछता है तो उसे कोई उपहार और सुख सुबिधायें दे दी जाती है ।

तो देश मैं अब चुनाव का समय आ गया है । और नए वादों और वचनों के साथ फिर हाज़िर है हमारे देश के कर्णधार और राजनेता । अब देखें जनता किसके वादों पर कितना विश्वाश करती है और अपना अमूल्य मत देती है ।

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

आर्थिक मंदी - दोषी सरकार या जनता !

वैसे तो काफ़ी दिनों से देश मैं आर्थिक मंदी का दौर चला आ रहा है जिसे की विश्व की अर्थव्यवस्था मैं हो रही मंदी का कारण बताया जाता रहा है । जिसके चलते आम उपभोक्ता और जनता मंहगाई की मार और परेशानी झेल रही है । किंतु अब यह विकराल रूप धारण करने लगी है । और इसका देश की अर्थव्यवस्था और देश के लोगों पर सीधे ही प्रहार करने लगी है । देश पहले से तो बढती हुई मंहगाई की मार झेल रहा था किंतु अब मंदी के चलते लोगों की रोजगार भी छिनने लगे है । जेट एयर वायस द्वारा एक ही दिन मैं १८०० से अधिक कमर्चारियों को कार्यमुक्त करना इसी आर्थिक मंदी का दुखद परिणाम है । आख़िर देश मैं आ रही आर्थिक मंदी और उसके प्रभाव से देश के लोगों मैं होने वाली परेशानी हेतु कौन जिम्मेदार है । क्या सरकार या फिर जनता ?
सबसे पहले सरकार की बात करते हैं की क्यों देश की आर्थिक व्यवस्था विदेशी अर्थव्यवस्था पर इतनी निर्भर हो गई की उसका अधिक से अधिक प्रभाव देश मैं पड़ने लगा । क्या देश की रीति नीति मैं खामियां थी की देश आत्म निर्भर न होकर देश की विदेशी अर्थव्यवस्था पर निर्भरता बढ़ने लगी । देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव उर्जा और इधन हेतु आवश्यक तेल की बढती हुई कीमत का भी पड़ा है , तो क्यों अब तक देश की निर्भरता इधन के मामले मैं विदेशों पर बनी रही , क्यों नही उचित नीति बनाकर एवं स्वदेशी एवं प्राकृतिक संसाधन का उपयोग कर इधन पर विदेशी निर्भरता कम की गई । यंहा तक की कृषि प्रधान देश होने के बाद भी क्या आज देश कृषि के मामले मैं भी पूरी तरह आत्म निर्भर बन पाया है । इस क्षेत्र की उपेक्षा का आलम यह है की कृषक परिवार भी अब कृषि कार्य से मुंह मोड़ने लगने है । देश की शिक्षा व्यवस्था भी देश को और देश की युवाओं को आत्म निर्भर न बनाकर दूसरों के अधीन नौकरी करने हेतु मजबूर होना पड़ रहा है । पूँजी निवेश के बहाने अर्थ व्यवस्था को विदेशी और बहु राष्ट्रीय कम्पनी के हाथ मैं सौपा जा रहा है बजाय स्वदेश कम्पनी और उद्योग को बढ़ावा देने के । सरकार भी वोट बैंक के चक्कर मैं तात्कालिक लाभ वाली ऐसी नीतियां तैयार करती है जिसके दूर गामी परिणाम अच्छे नही मिलते हैं ।
वही लोगों की बात करें तो स्वदेशी उत्पादों को छोड़कर बहु राष्ट्रीय कम्पनी और विदेशी सामानों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है । अब लोगों की जीवन शैली मैं परिवर्तन आने लगा है , अब लोग ब्रांडेड कंपनी और रेस्तरां कल्चर को बढ़ावा देने लगे हैं , हर छोटी बात के लिए बाजारों के उत्पादों पर निर्भरता बढ़ाने लगे है । यंहा तक की कर्ज लेकर सुख सुबिधाओं की वस्तुएं खरीदी जाने लगी है । वाहनों का भी बेतहासा इस्तेमाल किया जाने लगा है जिससे इधन की खपत बढ़ने लगी है जिसमे की देश की बहुमूल्य पूँजी खर्च होती है । साथ ही जनता ऐसी सरकार और जनप्रतिनिधि को चुनकर देश और क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने हेतु भेजती है जो देश हित और जनहित की दूरदर्शी और सार्थक सोच नही रखते हैं ।
इस बढती हुई मंहगाई और देश की आर्थिक मंदी के लिए सरकार तो ज्यादा जिम्मेदार है ही साथ ही इसके लिए जनता भी जिम्मेदार है । अतः जरूरी है की सरकार को ऐसी दूर गामी और सार्थक नीति बनानी चाहिए जो देश को आत्म निर्भर बनाने के साथ देश के लिए मील का पत्थर साबित हो । इसी प्रकार जनता को भी स्वदेशी चीजे अपनाकर हर छोटी बात के लिए बहु राष्ट्रीय कम्पनी और विदेशी सामानों पर निर्भरता कम करनी चाहिए । साथ ही सरकार बनाने हेतु देश हित और जनहित की समुचित सोच वाले जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजना चाहिए । ऐसा विश्वाश किया जाना चाहिए की देश मैं आर्थिक मंदी का चल रहा ख़राब दौर जल्द ही ख़त्म होगा ।

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

क्या संसकारों और मर्यादाओं को लांघना ही आधुनिकता का परिचायक है .

आज के समय आधुनिकता की बहुत बात हो रही है । देश मैं विद्दमान सदियों से चले आ रहे संस्कार अब बेमानी साबित किए जा रहे हैं । मर्यादाओं को अब दकियानूसी , रूढिवाद और संकीर्णता वादी सोच की संज्ञा देकर उससे बंधन मुक्त होने की छट पटा हट है । लोग अपने आप को अति आधुनिकता की चासनी मैं लपटे हुए दिखना चाहते है और ऐसे कार्यों और बातों का अनुसरण करने और अपनाने का ढोंग कर रहे हैं जो भले ही हमारे संस्कारों और आदर्शों से मेल नही खाते हो ।
भौतिकवादी आसान और बंधन रहित जीवन जीने की लालसा मैं अति आधुनिकता के आड़ मैं पाश्चात्य और विदेशी संस्कृति का समर्थन कर रहे हैं । आज की पीढी बंधन मुक्त स्वछन्द और उन्मुक्त जीवन जीना चाह रही है। अपने जीवन की खुशियों मैं वे किसी बात की दखलंदाजी और बंधन नही चाहते हैं । भले ही उनके इस तरह इस जीने से उनके पारिवारिक सदस्यों , वरिष्ठ और बुजर्गों को असुबिधा हो । अपनी स्वछन्द और उन्मुक्त जीवन की चाह मैं अब लोग अपने माता पिता और बड़े बुजुर्गों के साए मैं रहने से कतराने लगे है । परिणाम स्वरुप आज जीवन के संध्या काल मैं बुजुर्ग माता पिता वृद्ध आश्रम मैं रहने को मजबूर है । बिना शादी किए हुए युवा पुरुष और महिला एक साथ रहने के लिए लाइव इन रिलेशन शिप समर्थन करने लगे हैं । इसके पीछे यह तर्क की बिना जान पहचान और बिना विचारों के मेल मिलाप के शादी जैसे बंधन बंधकर लंबे समय तक एक साथ रहना नीरस जिन्दगी जीने के समान है । किंतु इसके पीछे तो सामाजिक मर्यादों और बन्धनों से मुक्त होने की छट पटा हट नजर आती है । जन्हा इस दौड़ती भागती जिन्दगी मैं जन्हा पैसा कमाने और अपनी महत्व्कान्छा पूरी करने मैं जीवन का अधिकतम समय निकाल दिया जाता है । क्या एक दूसरों को समझने का पर्याप्त अवसर मिल पाता होगा ।
क्या यही आधुनिकता वादी सोच है जिसमे वस्त्रों का उपयोग तन छुपाने मैं कम और दिखाने मैं ज्यादा तबज्जों दी जाती है । जिसमे लिव इन रिलेशन के नाम पर दो चार साल तक अपनी सहूलियत के हिसाब से साथ रहना और मन ऊब जाने पर अलग हो जाते हैं । बुजुर्गों को उनके जीवन के संध्याकाळ मैं अपनेपन से वंचित कर एकांत और नीरस जिन्दगी जीने हेतु छोड़ दिया जाए । एक बच्चे को ममता की छाव और मातृत्व प्यार से वंचित कर दिया जाता हो । बड़े बुजुर्गों के सारे जीवन के अनुभवों से उपजे सलाह और आदर्शों को नजरअंदाज किया जाए । इस प्रतिस्पर्धी युग मैं सिर्फ़ अपने को पद प्रतिष्ठित करने हेतु अच्छा या बुरा कोई भी रास्ता अख्तियार किया जाए । परिवार जैसे संस्था पर ही प्रश्नचिंह खड़ा किया जाए ।
एक बात जरूर है आज के परिप्रेक्ष्य मैं कुछ बातें साम्य नही बैठा पाती हो किंतु इससे उन बातों को ग़लत तो नही कहा जा सकता है । जरूरत है उनमे आज की परिस्थितियों के मुताबिक सुधार कर अपनाने की । ये संस्कार और बंधन ही है जिसने इस समाज को बाँध रखा है , पारिवारिक मूल्यों और नैतिक मूल्यों को जीवित रखा है । वरना विदेशी और पाश्चात्य संस्कृति की आंधी मैं यह समाज कब का बिखर गया होता । दूर ढोल सुहाने लगते है और अपनी कमीज के अपेक्षा दूसरों की कमीज ज्यादा सफ़ेद लगती है । किंतु ठीक तरह से देखा जाए अपने ही ढोल की आवाज ज्यादा सुरीली सुनाई देगी और और अपनी ही कमीज ज्यादा उजली नजर आएगी । अतः आधुनिकता इसी मैं है की संस्कारों और मर्यादाओं के दायरे मैं रहकर अपनी जड़ो को मजबूत करें , ना की विदेशी और मर्यादा विहीन जीवन शैली अपनाकर और अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से पलायन कर उन्हें खोखला करें ।

चुनाव के दो दृश्य - सकारात्मक और नकारात्मक !

देश के पाँच राज्यों मैं चुनाव की तारीख , निर्वाचन आयोग ने घोषित कर दी है । जिससे इन पाँच राज्यों मैं अब उत्सव का माहोल बनेगा तो वही दूसरी और किसी भी पल अशांति और तनाव का वातावरण भी बन सकता है । आपसी मेल मिलाप बढेगा , कई दिन से बिछुडे साथी , दोस्त , रिश्तेदार और बड़े बुजर्गों के रूप मैं चुनावी कार्यकर्ता और नेतागण मिलेंगे , जो पिछले पाँच सालों से न जाने कान्हा गम हो गए थे । अब जनता को वो समान और इज्जत मिलेगी जो उसने कभी सोची नही होगी , अचानक वो जनता से जनार्दन बन जायेगी । पता नही कैसे कैसे रिश्तेदारी और सम्बन्ध निकालकर नए नए लोग और नेतागण कही पैर छूकर आशीर्वाद लेंगे तो कही छोटों को शुभाशीर्वाद देंगे । कोई उपहार स्वरुप साड़ी भेंट करेगा तो कोई कम्बल , कोई रूपये पैसे देगा तो कोई अन्य उपहार । युवा लोगों और मौज मस्ती करने वालों लोगों के लिए बाकायदा इंतजाम किए जायेंगे । सारा माहोल उत्सव सा हो जायेगा , ऐसे लगेगा की मानो आज शहर भाईचारे की भावना से ओतप्रोत हो अमन, शान्ति और खुशियों का स्वर्ग बन गया है । सारा शहर रंग बिरंगे बेनरों और झंडो एवं घर की दीवारें रंगों से सज जायेगी ।
वही घर के कई बेकार बैठे नौजावानो और लोगों को नया काम मिलेगा । किसी को चुनाव प्रचार का तो किसी को पोस्टर , पुम्फ्लेट और नारे लेखन का काम । बहुत से लोगों को तो मुफ्त मैं गाड़ी से गाँव गाँव और शहर के चप्पे के सेर करने को मिलेगी , उनके लिए चाय नाश्ते का इंतजाम भी रहेगा और हो सके तो प्रतिदिन का मेहनताना भी मिल जायेगा । ऐसे समय मैं कई छुट भइया नेताओ की भी पूछ परख बढ़ जायेगी , और कई दिन से खाली बैठे को काम मिल जायेगा । ये तो था चुनाव का सुखद पक्ष ।
यही चुनाव अब लोगों को अपनी विचारधारा के आधार पर अलग अलग बाँट देगा । पास पड़ोस के लोग और यंहा तक की भाई भाई और एक ही घर के सदस्यों मैं पार्टी की विचारधारा पर फूट पड़ जायेगी । अमन चैन से पड़ोस मैं रहने वाले लोग और शान्ति से रहने वाले घर के सदस्यों के बीच मन मुटाव होने लगेगा । कोई अपने घर कोई और झंडा और बेन्नर लगा रखेगा तो कोई किसी और पार्टी का । नौजवान युवक अपने पार्टी के नेता और पार्टी के लिए मरने मारने को तैयार रहेंगे । कोई लोगों को अपनी पार्टी के पक्ष मैं करने मैं लगा रहेगा तो कोई अपनी पार्टी की और खीचने मैं , इसी खीचतान मैं आपसी रंजिश बढाते रहेंगे । हर पल माहोल तनाव और अशांति का बना रहने की आशंका बनी रहेगी ।
चुनावी परिद्रश्य का सकारात्मक और नकारात्मक रुख वाला रूप देश और प्रदेश मैं एक नए परिद्रश्य को उभारने का काम करेगा । इन चुनावों से निकलने वाले परिणाम देश और प्रदेश की नई दिशा और दशा तय करेंगे । फिर भी एक बात आशा की जानी चाहिए की मतदाता किसी प्रलोभन मैं ना आकर अपने स्वविवेक से अपना हित और अहित एवं देश और प्रदेश के अच्छे के बारे मैं सोचते हुए अपना अमूल्य मत डालेगा , जो की देश और प्रदेश और उनके क्षेत्र की उन्नति और प्रगति मैं एक नए युग का सूत्रपात करेगा ।

सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

जेंटल मेन गेम के खिलाडी ग्लेमर की चकाचोंध मैं धर्म को भूले !

क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल कहलाता है । किंतु इस सभ्य खेल के सभ्य खिलाडी ग्लेमर की चकाचोंध से अपने आप को नही बचा सके । फिल्मों और टीवी और फैशन के ग्लेमर की चमक के सामने क्रिकेट के ग्लेमर की चमक फीकी पड़ गई , और सभ्य खिलाडी इस ग्लेमर की चमक मैं फंस गए । आज के क्रिकेट खिलाडी ग्लेमर की अंधी दौड़ मैं शामिल होकर ख़ुद को और अधिक धन और शोहरत कमाने की हसरत से ख़ुद को रोक नही पाये , यंहा तक की अपने मूल खेल की जिम्मेदारी को भुलाकर । और इसमे इस खेल की प्रमुख संस्था बी सी सी आई भी अपने आप को दूर रख नही पायी । चाहे वह किसी उत्पाद के प्रमोशन हेतु विज्ञापन की बात हो । चाहे वह फैशन जगत मैं रैंप मैं चलने की बात हो , फिल्मों और टीवी धारावाहिकों मैं काम करने की बात हो या फिर अब कलर टीवी के एक खिलाडी एक हसीना के प्रोग्राम मैं टीवी अदाकारों के साथ नृत्य करने की बात हो ।

खिलाड़ियों द्वारा अपने मूल खेल को छोड़कर इस तरह ग्लेमर जगत की चकाचोंध वाली गतिविधियों मैं शामिल होने पर छुटपुट विवाद बनते और उठते रहे । किंतु कलर टीवी के एक खिलाडी एक हसीना प्रोग्राम मैं हरभजन का रावण का और उनकी सहभागी मोना सिंह का सीता का रूप धरकर विवादित नृत्य कर धार्मिक भावनाओं को आहात करने वाली घटना ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है । इस पर सिख संगठन और हिंदू संगठन ने आपति उठायी है , और ख़बरों के अनुसार उनके ख़िलाफ़ हिंदू देवी देवताओं का मजाक उडाकर धार्मिक भावनाओं को आहात करने पर कोर्ट मैं इसके ख़िलाफ़ केस भी दायर किया गया है ।

पहले भी मनोरंजन , कला प्रदर्शन और अभिव्यक्ति के नाम पर विवादस्पद होकर प्रसद्धि पाने के कुत्सित प्रयासों के चलते धार्मिक देवी देवताओं के सम्बन्ध मैं विवादस्पद बातों को अंजाम दिया गया है । क्या किसी धर्मं के आस्था और श्रद्धा के प्रतीक को निशाना बनाकर और उनका मजाक बनाकर सस्ती शोहरत हासिल किया जाना सही है । क्या ऐसी सस्ती लोकप्रियता की उमर लम्बी हो सकती है ? यदि इस प्रकार के विवादस्पद कार्यों जिसमे धार्मिक भावनाएं आहत हो के कारण यदि कोई देश और प्रदेश मैं अशांति का माहोल पैदा होता है तो क्या विवादों को जन्म देने वाले लोग इसकी जिम्मेदारी लेंगे ? हड़ताल , आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं होती है और उस पर जन और धन की कोई हानि होती है तो क्या ऐसे लोग इसकी जिम्मेदारी लेंगे ? यदि नही तो फिर बार इस तरह विवादास्पदों बातों को अंजाम देने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी करवाई क्यों नही की जाती , क्यों ऐसे लोगों को समाज मैं घूमने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है ?

अतः ऐसे लोग चाहे वे किसी खेल के राष्ट्रीय टीम के खिलाडी हो या फिर देश के व्ही आई पी ही क्यों न हो , के विरुद्ध कड़ी कारर्वाई की जानी चाहिए , ताकि दुबारा लोग इस तरह की विवादस्पद बातों को अंजाम देने से परहेज करें । और देश और प्रदेश मैं शान्ति और भाईचारे के वातावरण को दूषित और नुक्सान न पंहुचा सके । साथ ही खिलाड़ियों को भी अपनी वरिष्ट नागरिक की छबि और जिम्मेदारी को ध्यान मैं रखते हुए ऐसे विवादस्पद बातों को अंजाम देने से बचना चाहिए , क्योंकि इससे उनके लाखों प्रशसंकों और धर्मं से जुड़े करोरों लोगों की देवी देवताओं के प्रति आस्था और विशवास की भावना भी आहत नही होगी और सभ्य खेल की छबि भी बरकरार रहेगी .

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

ब्लॉग मैं धर्मं के प्रति उठे सवाल और संसय को सकारात्मक रूप मैं प्रस्तुत किया जाना चाहिए !

देश मैं चारों और धर्मं और भक्तिमय वातावरण बना हुआ है । नवरात्र और ईद के पवित्र अवसर पर सारा वातावरण आस्था और श्रद्धा के भक्तिमय वातावरण से सराबोर हैं । ऐसे अवसरों पर हिन्दी ब्लॉग जगत मैं भी इसका असर दिख रहा है । इन खुशी और आस्था के अवसर पर शुभकामनाएं और मंगल कामनाये दी जा रही है और इश्वर , परमात्मा , खुदा के इबादत और पूजा अर्चना की बात की जा रही है ।

किंतु वही इसके इतर ब्लॉग जगत मैं धर्मं और इश्वर , परमात्मा मैं खामियां और कमियां ढूंढकर उनपर उँगलियाँ उठायी जा रही है । हो सकता है की धर्मं और परमात्मा , इश्वर एवं धर्मं के पथ प्रदर्शक द्वारा बतायी गई बातें और मानव हित एवं कल्याण मैं उनके द्वारा किए कार्य की कुछ बातें आज के इस बदलते दौर मैं प्रासंगिक नही रही हो । हो सकता है धर्मं ग्रंथों मैं लिखी गई कुछ बातों मैं मत भिन्नता हो ,या फिर कुछ बातों को लेकर संसय और सवाल हो , किंतु कुछ बातों के संसय को लेकर पूरी बात की हकीकत को जाने बगैर , पूरे धर्मं और धर्मं के पथ प्रदर्शकों और उनके द्वारा दी गई सीखों पर उँगलियाँ उठाई नही जाना चाहिए । सदियों से ये धर्मं और उनके आदर्शों को इतनी श्रद्धा और आस्था और विश्वाश के साथ अपनाया जाना , निराधार और बेबुनियाद नही हो सकता है । धर्मं और इश्वर , परमात्मा एवं पथ प्रदर्शक के आदर्श और सीखें ही है जो इंसान को इंसानियत और मानवता की सीख देता है भाई का भाई के प्रति एवं भाई का बहन के प्रति , पुत्र / पुत्रियों का माता पिता के प्रति एवं माता पिता का अपने बच्चों के प्रति कर्तव्यों और जिम्मेदारियों , संबंधों की मर्यादा एवं समाज मैं नैतिक आचरण का निर्धारण कर पारिवारिक मूल्यों को कायम रख जीने की सीख देता है । आज देश को यही चीज जोड़े हुई है । ये बात अलग है की कुछ लोगों द्वारा इसकी आड़ मैं ग़लत आचरण और ग़लत रास्ते अपनाए जा रहे हैं । किंतु इससे पूरे धर्मं और उनके आदर्शों को दोष देना उचित नही है ।

यह देखने मैं आता है की ऐसे धर्मों मैं खामियां निकालकर उस आधार पर धर्मं को ग़लत कहने को कोशिश की जाती है जिनके अनुयायी कठोर रुख नही अख्तियार नही करते हैं । जो हमेशा ऐसी बातों से विचलित हुए बिना विवादों को नजरअंदाज कर अपनी आस्था और विश्वाश मैं अडिग रहते हैं ।

ऐसे अवसरों पर धर्मं और उनके पथ प्रदर्शकों के चरित्र और परमात्मा एवं इश्वर द्वारा बताये गए रास्तों और आदर्शों मैं खामियां निकालकर उसे विवादस्पद बनाकर एवं नकारात्मक रूप मैं अपने ब्लॉग मैं प्रस्तुत करना क्या अपने ब्लॉग को प्रसद्धि दिलाने का प्रयास नही लगता है । यदि धर्मं की किसी बात को लेकर कोई संसय और सवाल है तो उसे सकारात्मक रूप देते हुए उसका समाधान और हल ढूँढने का प्रयास नही किया जाना चाहिए । एक से अधिक धर्मं पुरुषों द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन कर संसय को दूर करने या फिर धर्मं के ज्ञाता और विद्धवान से इस बात का समाधान प्राप्त करने का प्रयास नही किया जा सकता है । बजाय अधूरे ज्ञान और अधूरे अध्ययन के और बिना किसी समुचित प्रमाण के उँगलियाँ उठाने के ।

अतः जरूरी है की ब्लॉग के माध्यम से यदि धर्मं की किसी बातों के बारे मैं संसय है तो उसे सकारात्मक रूप और शालीन तरीके से उठाया जाना चाहिए , बजाय उसे विवादस्पद और नकारात्मक रूप मैं प्रस्तुत करने के । इससे एक तो धर्मं के लोगों की आस्था और विश्वाश को ठेस नही पहुचेगी और हिन्दी ब्लॉग जगत की सादगी भी बनी रहेगी ।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2008

जवानों का मनोबल गिराकर, राजनेता स्वयम की सुरक्षा को दाव पर लगा रहे हैं !

देश मैं जिस तरह से अपने राजनैतिक हितों के मद्देनजर राजनेताओं और शासन मैं बैठे जनता के नुमाइंदे द्वारा देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा मैं लगे जवानों की शहादत की जिस तरह से मखोल उडाकर उपेक्षा की जा रही है । जिससे की देश के जवानों के मनोबल मैं विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । जिस प्रकार से बाटला हाउस की मुठभेड़ को फर्जी बताकर और शहीद हुए जवान एम् सी शर्मा की शहादत का वोट बैंक की राजनीति के चलते मखोल उडाया जा रहा है और संसद के हमले को नाकाम करने मैं अपनी जान का बलिदान देने वाले जवानो की शहादत को , कोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद भी अपराधी अफजल को फांसी न देकर को , मजाक बना दिया गया है । इससे ये नेता देश और देश के लोगों की सुरक्षा को खतरे मैं तो डाल रहे हैं साथ साथ ही ख़ुद की सुरक्षा को भी खतरे मैं डाल रहे हैं । ऐसे मैं क्यों कर देश देश का जवान अपनी जान को खतरे मैं डालेगा ? जब उसे पता है की उसके बलिदान और कर्तव्य परायणता को विवादास्पद बनाकर जिस प्रकार से राजनैतिक रोटी सेकने हेतु गन्दा खेल खेला जाता है ।
ऐसे मैं सुरक्षा मैं लगे जवान देश और देश के लोगों की सुरक्षा हेतु अपनी जिम्मेदारी निभाने मैं बेशक कोई कोताही नही बरतेंगे , किंतु अब राजनेताओं की सुरक्षा मैं लगे सुरक्षा जवान अपनी जान जोखिम मैं डालकर अपने कार्य को अंजाम देने हेतु दस बार सोचेंगे । क्योंकि राजनेताओ वोट बैंक हेतु किए जा रहे निंदनीय कृत्यों से उनके मनोबल और सम्मान को ठेस पहुच रही है । उनके द्वारा अपने जान पर खेल कर निभायी गई कर्तव्य परायणता को भी शक और संदेह के घेरे मैं खड़ा किया जाने लगा है ।
यदि ऐसे ही जवानों के कार्यों और बलिदान पर उँगलियाँ उठायी जाती रही और उनकी उपेक्षा की जाकर मनोबल गिराया जाता रहा तो वह दिन दूर नही जब राजनेताओं की सुरक्षा भी खतरे मैं पड़ सकती है ।
अतः अब राजनेताओ को ऐसी राजनीति से बाज आना चाहिए और वोट बैंक के निजी स्वार्थों के चलते जवानों की शहादत पर उँगलियाँ उठाना छोड़ना होगा , जिससे की उनकी देश और देश के लोगों की सुरक्षा तो खतरे मैं नही पड़े साथ ही ख़ुद की सुरक्षा भी दाव पर न लगे ।

रविवार, 5 अक्तूबर 2008

लोग उग्र और हिंसक क्यों होते जा रहें हैं !

अब आए दिन समाचार पत्रों , इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अथवा अन्य माध्यमों से जगह जगह चक्काजाम , आगजनी और हिंसक घटनाओं की ख़बर मिलती है । लोग जब देखो तब कभी छोटी छोटी बात को लेकर हिंसक और उग्र हो जाते हैं । कभी सरकार ख़िलाफ़ , कभी प्रशासन के ख़िलाफ़ , कभी एक समुदाय दूसरे समुदाय के ख़िलाफ़ तो कभी एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के ख़िलाफ़ उग्र और हिंसक होने लगते हैं । यंहा तक की छोटी छोटी बातों को लेकर भाई भाई के ख़िलाफ़ अथवा घर एक सदस्य दूसरे सदस्यों के ख़िलाफ़ हिंसक और उग्र हो जाता है । देश मैं जन्हा देखो वंहा हर रोज हिंसक और उग्र घटना को अंजाम दिया जा रहा है । चाहे वह दिल्ली , सूरत , बंगलोर और बम्बई मैं बम धमाके घटना हो , चाहे वह उडीसा के कंधमाल मैं हिंसक घटना हो , चाहे वह असम की हिंसक घटना हो , अथवा कश्मीर मैं हो रही हिंसक घटना हो अथवा नक्सल वादी द्वारा अंजाम दी जा रही घटना हो ।
ना जाने लोगों को क्या हो गया है की शान्ति पैगाम देने वाली राम , रहीम , इशु , बुद्ध और महावीर की इस धरती मैं लोग दिनों दिन उग्र और हिंसक होते जा रहे हैं । इतने सारे धर्मों की मिली जुली संस्कृति जिसमे कभी भी दूसरे को दुःख ना पहुचाने और मिलजुलकर शान्ति और सोहाद्र पूर्वक रहने की सीख मिलती हो , वंहा के लोग आज छोटी छोटी सी बातों को लेकर उग्र और हिंसक होकर एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू है । वर्तमान मैं भी हर धर्मं के धर्मगुरु अपने प्रवचन और धर्म उपदेशों के माध्यम से शान्ति और सहयोग की सीख देते रहते हैं ।
क्या अब लोगों ने अपने धर्मं की सीख को अपनाना और पालन करना छोड़ दिया है ? क्या लोगों ने अपने धर्मं के नाम पर भगवान् , परमात्मा एवं महापुरुषों के आदर्शों के पालन करने की बजाय , सिर्फ़ उत्सव मनाने की परम्परा का पालन करना शुरू दिया है ? या फिर आज का इंसान इस भागती दौड़ती भौतिकवादी जिन्दगी मैं एक पैसे कमाने वाली मशीन की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है जिसमे भावना , दया , करुणा और परस्पर सहयोग का कोई स्थान नही होता है ? क्या इंसान इंसानियत भूलता जा रहा है ? क्या देश अमन , शान्ति और भाईचारे के स्वरुप बरकार रख पायेगा ?
फिर भी कुछ लोगों के निजी और सत्ता स्वार्थों के चलते देश के लोगों के बीच वैमनस्यता फैलाई जा रही है । और अब लोग यह सब समझने भी लगे है । और आशा है की अब यह ज्यादा दिन तक नही चलेगा । लोग आपस मैं न लड़कर अपने उग्रता और हिंसक गतिविधियों को त्यागकर शान्ति और सोहार्द का मार्ग अपनाएंगे ।

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

अब हर फिक्र को धुँए मैं कैसे उडायेंगे .

ये सरकार ने भी क्या कर डाला । अब लोग अपनी फिक्र को धुँए मैं कैसे उड़ा पायेंगे । अब तो वो गाना भी बेमानी हो जायेगा की " मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया , हर फिक्र को धुएँ मैं उडाता चला गया " । तो अब जिन्दगी का साथ निभाने के लिए जो चिंता और फिक्र है उसको अब धुँए मैं नही उडाया जा सकेगा । ये सरकार भी जो हैं न , जिसे की जनता के सहूलियत को ख़याल रखना चाहिए , उसी को परेशान करने मैं लगी है । अरे जिस धुएँ के सहारे लोग बड़ी से बड़ी चिंता और फिक्र को दूर करते थे , बड़ी से बड़ी परेशानी का हल ढूँढ निकालते थे , ज्यादा नही तो कम से कम धुएँ के सहारे कुछ समय के लिए ही सही चिंता और फिक्र से राहत पाते थे । अब उनका यही राहत देने वाला साधन ही छीन लिया गया है । सरकार ने तो बड़ी मुश्किल कर दी है । सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगाकर । यंहा तक तो ठीक था , बार और मैखाना तक मैं भी धुएँ उडाने पर पाबंदी लगा दी गई है । लगता है अब गाना बदलना पड़ेगा और अब फिक्र को धुएँ उडाने की बजाय , मैखाने मैं शराब और मदिरा मैं बहा कर काम चलाना पड़ेगा ।
धुएँ उडाने वालों की बड़ी परेशानी बन गई है घर वाले भी आजकल घरों मैं धुआं उडाने से मना करते हैं जिसके कारण घर के बाहर धुआं उडाया करते थे , किंतु अब वह भी बंद कर दिया गया है ।

सरकार को आम जनता का धुएँ उडाना ही नजर आ रहा है , दूसरों का धुएँ उडाना नजर नही आ रहा है । वो रेलवे वाले इतना धुआं उडा रहा है उन्हें कोई नही बोल रहा है । बड़ी बड़ी कंपनी वाले धुएँ उड़ा कर पर्यावरण को ख़राब कर रहें है , उन पर पाबंदी लगाने की कोई फिक्र नही है । दिन रात सरकार की मंत्री और अफसर गाड़ी दौड़ा दौड़ा कर धुआं उडा रहे हैं जनता के पैसे को बेफिक्र होकर उड़ा रहें है वो सरकार को नजर नही आ रहा है ।

वैसे चुनाव का समय आ रहा है यदि धुआं उडाने वाले चाहते हैं की उनका यह प्रतिबन्ध सरकार वापस ले ले , तो जल्द से जल्द अपना एक धुआं उडाने वाला संघटन बनाए , और सरकार को संगठन की वोट बैंक की शक्ति को दिखाएँ , जगह जगह धरना , प्रदर्शन और जुलुश निकाले तब सरकार निश्चित रूप से यह पाबंदी हटा सकती है क्योंकि इतने सारे वोट जो उससे दूर चले जायेंगे । तो धुआं उडाने वालों देर किस बात की , शुरू हो जाओ और अपने धुएँ उडाने के अधिकार को मौलिक अधिकार मैं जुड़वाँ लो यही अच्छा समय है । और फिर से अपनी फिक्र को धुएँ मैं उड़ा कर मस्त और खुश रहो ।

यह तो रही धुएँ उडाने वालों की बात , जनता की बात करें तो सरकार लोगों के धुएँ उडाने को रोकना चाह रही है किंतु वह ख़ुद देश की सुरक्षा , विकास , गरीबी और भ्रष्ट्राचार जैसे जनहित मुद्दे को की फिक्र को धुएँ मैं उडाकर मस्त हैं ।
अजी हम तो चाहते हैं की जिस तरह से सरकार जनता का धुआं उडाना बंद कर पीने वालों और नही पीने वालों के स्वास्थय का की फिक्र कर रही है ठीक उसी तरह देश की सुरक्षा , विकास , गरीबी और भ्रष्ट्राचार एवं देश हित और जनहित की अन्य समस्यायों की फिक्र को यूँ ही धुएँ मैं न उडाये , वरन उनको भी इसी तरह रोकने की इक्छा शक्ति दिखाएँ ।