गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

आर्थिक मंदी - दोषी सरकार या जनता !

वैसे तो काफ़ी दिनों से देश मैं आर्थिक मंदी का दौर चला आ रहा है जिसे की विश्व की अर्थव्यवस्था मैं हो रही मंदी का कारण बताया जाता रहा है । जिसके चलते आम उपभोक्ता और जनता मंहगाई की मार और परेशानी झेल रही है । किंतु अब यह विकराल रूप धारण करने लगी है । और इसका देश की अर्थव्यवस्था और देश के लोगों पर सीधे ही प्रहार करने लगी है । देश पहले से तो बढती हुई मंहगाई की मार झेल रहा था किंतु अब मंदी के चलते लोगों की रोजगार भी छिनने लगे है । जेट एयर वायस द्वारा एक ही दिन मैं १८०० से अधिक कमर्चारियों को कार्यमुक्त करना इसी आर्थिक मंदी का दुखद परिणाम है । आख़िर देश मैं आ रही आर्थिक मंदी और उसके प्रभाव से देश के लोगों मैं होने वाली परेशानी हेतु कौन जिम्मेदार है । क्या सरकार या फिर जनता ?
सबसे पहले सरकार की बात करते हैं की क्यों देश की आर्थिक व्यवस्था विदेशी अर्थव्यवस्था पर इतनी निर्भर हो गई की उसका अधिक से अधिक प्रभाव देश मैं पड़ने लगा । क्या देश की रीति नीति मैं खामियां थी की देश आत्म निर्भर न होकर देश की विदेशी अर्थव्यवस्था पर निर्भरता बढ़ने लगी । देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव उर्जा और इधन हेतु आवश्यक तेल की बढती हुई कीमत का भी पड़ा है , तो क्यों अब तक देश की निर्भरता इधन के मामले मैं विदेशों पर बनी रही , क्यों नही उचित नीति बनाकर एवं स्वदेशी एवं प्राकृतिक संसाधन का उपयोग कर इधन पर विदेशी निर्भरता कम की गई । यंहा तक की कृषि प्रधान देश होने के बाद भी क्या आज देश कृषि के मामले मैं भी पूरी तरह आत्म निर्भर बन पाया है । इस क्षेत्र की उपेक्षा का आलम यह है की कृषक परिवार भी अब कृषि कार्य से मुंह मोड़ने लगने है । देश की शिक्षा व्यवस्था भी देश को और देश की युवाओं को आत्म निर्भर न बनाकर दूसरों के अधीन नौकरी करने हेतु मजबूर होना पड़ रहा है । पूँजी निवेश के बहाने अर्थ व्यवस्था को विदेशी और बहु राष्ट्रीय कम्पनी के हाथ मैं सौपा जा रहा है बजाय स्वदेश कम्पनी और उद्योग को बढ़ावा देने के । सरकार भी वोट बैंक के चक्कर मैं तात्कालिक लाभ वाली ऐसी नीतियां तैयार करती है जिसके दूर गामी परिणाम अच्छे नही मिलते हैं ।
वही लोगों की बात करें तो स्वदेशी उत्पादों को छोड़कर बहु राष्ट्रीय कम्पनी और विदेशी सामानों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है । अब लोगों की जीवन शैली मैं परिवर्तन आने लगा है , अब लोग ब्रांडेड कंपनी और रेस्तरां कल्चर को बढ़ावा देने लगे हैं , हर छोटी बात के लिए बाजारों के उत्पादों पर निर्भरता बढ़ाने लगे है । यंहा तक की कर्ज लेकर सुख सुबिधाओं की वस्तुएं खरीदी जाने लगी है । वाहनों का भी बेतहासा इस्तेमाल किया जाने लगा है जिससे इधन की खपत बढ़ने लगी है जिसमे की देश की बहुमूल्य पूँजी खर्च होती है । साथ ही जनता ऐसी सरकार और जनप्रतिनिधि को चुनकर देश और क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने हेतु भेजती है जो देश हित और जनहित की दूरदर्शी और सार्थक सोच नही रखते हैं ।
इस बढती हुई मंहगाई और देश की आर्थिक मंदी के लिए सरकार तो ज्यादा जिम्मेदार है ही साथ ही इसके लिए जनता भी जिम्मेदार है । अतः जरूरी है की सरकार को ऐसी दूर गामी और सार्थक नीति बनानी चाहिए जो देश को आत्म निर्भर बनाने के साथ देश के लिए मील का पत्थर साबित हो । इसी प्रकार जनता को भी स्वदेशी चीजे अपनाकर हर छोटी बात के लिए बहु राष्ट्रीय कम्पनी और विदेशी सामानों पर निर्भरता कम करनी चाहिए । साथ ही सरकार बनाने हेतु देश हित और जनहित की समुचित सोच वाले जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजना चाहिए । ऐसा विश्वाश किया जाना चाहिए की देश मैं आर्थिक मंदी का चल रहा ख़राब दौर जल्द ही ख़त्म होगा ।

4 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत ही प्रभाव शाली लेख लिखा है आप ने और जिन तथ्यों पर ध्यान खींचा है वे वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण हैं...इतनी जानकारी भरे लेख के लिए बधाई...
नीरज

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बेशक... इन हालत के लिए सरकार ही ज़्यादा कुसूरवार है...

रंजना ने कहा…

सत्य,सार्थक और अत्यन्त प्रभाव शाली आलेख है.आपसे पूर्ण सहमत हूँ.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बिलकुल सही बाते लिखी है आप ने, काश सभी इस बारे सोचते? जिसे हम तर्क्की तरक्की कह रहै है, क्या सच मै वो????
धन्यवाद एक सुंदर विचार के लिये