शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

स्लम डोग मिलेनियर- स्वदेशी माल पर विदेशी कलई चढ़ने पर श्रेष्ठ .

वही कहानी , वही परिवेश और वही पुराणी विषय वस्तु , और तो और कलाकार और संगीतकार भी भारतीय । बस अन्तर है तो इतना की इसे विदेशी लोगों ने विदेशी भाषा मैं बनाया है , और फ़िल्म का नाम अंग्रजी भाषा यानी की विदेशी भाषा मैं रखा गया है स्लम डोग मिलेनियर । और शायद और शायद यही कुछ बातें है है जो इस फ़िल्म को आस्कर पुरुष्कार के योग्य माना जा रहा है । और इसे बहुत सी श्रेणी मैं नामित किया जा रहा है , हम लोगों के लिए जरूर यह खुशी की बात हो सकती है । किंतु पहले भी ऐसी या यह कहें की इससे अच्छी विषय वस्तु लिए बहुत सी अच्छी फिल्म भारतीयों द्वारा बनायी गई किंतु उसे आस्कर के योग्य नही समझा जाता रहा । क्या इसका कारण यह माना जाए की ये फिल्में विशुद्ध भारतियों द्वारा विशुद्ध भारतीय परिवेश और विशुद्ध भारतियों संसाधनों से बनाई जाती रही है । या हम यह माने की एक अहम् है की गोरे लोगों या फिर यूरोपियन लोगों के अतिरिक्त कोई अच्छा फिल्मकार और कलाकार नही हो सकता है , शायद यही एक पक्षपात पूर्ण और ख़ुद को श्रेष्ठ समझने की सोच और झूठा अहम् दूसरों को ख़ुद से अच्छा मानने मैं बाधक है ।
वैसे भी वालीवुड की प्रख्यात हस्तियों द्वारा यह कहा जाता रहा है की हमें विदेशियों से श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र प्राप्त करने हेतु उनके पीछे नही दोड़ना चाहिए । और न ही उनके प्रमाणपत्रों की आवश्यकता है । जो की काफ़ी हद तक सही भी है । किंतु क्या करें मृगतृष्णा ही है की दूर के ढोल सुहावने लगने की कहावत के अनुरूप हमें दूसरों की ही चीज़ अच्छी लगती है चाहे उनके द्वारा की गई प्रशंशा ही क्यों न हो । विदेशियों द्वारा श्रेष्ठता का ठप्पा लगने पर ही हम अपने देश की महत्वपूर्ण चीज़ का महत्व स्वीकार कर पाते हैं क्योंकि घर की मुर्गी तो दाल बराबर लगती है चाहे वह कितनी ही अच्छी क्यों न हो ।
इन बातों का मतलब कतई यह नही है की विदेशों द्वारा दी जा रही सराहना और पुरुष्कार हमें गौरान्वित और खुशी नही देते हैं । यह तो हमारे लिए गौरव की बात है की अब दुनिया हमारी हर बात का हर क्षेत्र मैं अनुपम उपलब्धि का लोहा मानने लगी है और हमने उन्हें मजबूर किया है । जो आज हमारी जिस काबिलियत और कुशलता की दुनिया बात कर रही है वह तो हमारे देश मैं पहले से ही मोजूद है । किंतु आज अब लोग उसे जान रहे है । शायद हमने ही अपनी क्षमता और नैसर्गिक गुणों को ठीक से पहचानकर उसे उतना महत्त्व नही दिया है । शायद स्वदेशी माल पर विदेशी कलई चढ़ने पर ही हम किसी भी चीज़ की श्रेष्ठता स्वीकार करते हैं ।
अतः जरूरत है अपने देश की विरासत मैं मिले संसकृति , सद गुणों और क्षमताओं का पहचानकर उसे और निखारने की । बजाय इसके की उसे दूसरों द्वारा तबज्जो देने पर हम उसके महत्त्व और उपयोगिता को स्वीकारें , चाहे वह योग , अध्यात्म , कला अथवा विज्ञान के क्षेत्र की बात हो या फिर वह देश के लोगों की बौद्धिक , कलात्मक अथवा सृजनात्मक क्षमता की बात हो । २६ जनवरी को मनाये जाने वाले ५९ वे गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर ऐसी मंगल कामना है।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई । शुभ और सम्रद्ध गणतंत्र दिवस !