सोमवार, 24 जुलाई 2017

खुलकर मुस्कुराने दो हमें ।


खुलकर मुस्कुराने दो हमें ,
न दबे बचपन किताबों के बोझों  के  तले ।
फूलों की तरह खिलने दो हमें ,
न झुलसे  मासूमियत  बड़ों के अरमानों के तले ।
बातें करने दो  आसमानों से हमें ,
न गुजरे ये बचपन चाहरदीवारों के तले  ।
भीग जाने दो बारिश में हमें ,
न रोको लेने दो मौसम के खुलकर मजे ।
न डालो इतनी जिम्मेदारियां हमें ,
कहीँ  खो ना जाये बचपन वक्त से पहले ।
जी लेने दो जीभर बचपन हमें  ,
फिर तो बीतने ही है संघर्ष से जिंदगी के हर लम्हे ।

4 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

सहमत बचपन की मस्ती का अलग मजा होता है ... और बच्चों को वो सब करने देना चाहिए ...

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

नासवा जी आपकी सकारात्मक अमूल्यवान टिप्पणी के लिए बहुत सुक्रिया ।

M.MAsum Syed ने कहा…

बचपन जो अब कभी लौट के आने वाला नहीं

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

सईद जी आपकी सकारात्मक अमूल्यवान टिप्पणी के लिए बहुत सुक्रिया ।