रविवार, 25 जून 2017

डिअर व्हाटसअप/ फेसबुक के नाम एक पाती

डिअर व्हाटसअप/ फेसबुक ,
तुम हर दिन हर पल 24 घंटे मैसेज को बिना रुके एवं बिना थके भेजने और लेने का काम करते हो  । टेक्स्ट , चित्र और ऑडियो वीडियो ,यंहा तक की आजकल  तुम्हे  पीडीएफ और डॉक्यूमेंट फ़ाइल से भी परहेज नही है । सोते जागते आजकल तुम हमेशा हमारे साथ रहने लगे हो , यंहा तक की खाते पीते वक्त एवं कई गैर जरुरी कामों मेँ भी तुम्हारा साथ नही छूट रहा है ।
तुम्हारा और हमारा साथ अभी तक तो बहुत ही खुशनुमा चल रहा था । लेकिन ऑफिस के बॉस के आर्डर वाले मेसेज ने हमारी दोस्ती में दरार डालनी शुरू कर दी है । आजकल तुम्हारे साथ से डर लगने लगा है , जब भी कोई भी घंटी बजती है ना,  तो उलझन में पड़ जाते है की कही बॉस का मेसेज तो नही । सुकून वैसे भी छिनने लगा , अब न तुम्हारे साथ बोरियत भी होने लगी है । अरे क्या ! बार बार एक ही मेसेज लाते रहते हो । तुम इसे रोकते क्यों नही ।
तुम्हारे कारण ना कुछ् नया सोचने की आदत जाने लगी है , बस क्या अच्छा सा बधाई और शुभकामना सन्देश झट से कॉपी पेस्ट कर पोस्ट कर रिश्तों की जिम्मेदारी की इतिश्री करने लगे है । दोस्तों की लिस्ट भी ना , इतनी लम्बी हो गई है की सबके मेसेज देखते देखते गर्दन दर्द होने  लगती है । आँखों और दिमाग पर भी कुछ ज्यादा ही जोर पड़ने लगा है । है भगवान् ! कंही तुम्हारे चक्कर मेँ डॉक्टर के चक्कर न लगाने पड जाये । कुछ भाई लोग तो अपना काम धंदा और पढाई लिखाई छोड़कर बस तुम्हारे चक्कर में अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे है ।
फिर भी अब तो तुम हमारे जीवन का ख़ास हिस्सा बन गए हो । तुमसे दूर तो नही जा सकता , हाँ कोशिश जरूर करूँगा की तुमसे अब कम मिलु ।
तुम्हारा दोस्त : दीप ।

शनिवार, 17 जून 2017

वो उनकी डांट, और रूठना मेरा ।

#happyfathersday
वो बात बात पर उनकी डांट,  और बार बार रूठना मेरा ।
ऐसे ही कई बार शुरू होता , उनका और मेरा  सबेरा ।
कभी मैं गिरता और , उठता उनकी उंगली  पकड़ दुबारा ।
हो कोई बात मनवाना , लेता माँ का इमोशनल सहारा ।
ऐसे होती मेरी कई ख्वाइश पूरी , लगता मैं जीता वो हारा ।
कभी भी मेरा हार जाना , ना होता उनको भी बिलकुल गवारा ।
रात दिन मेहनत कर , करते अपने सुखों और आराम से किनारा ।
बस यही तमन्ना लिए कि , हर ख़ुशी सुख पाये उनका दीप  दुलारा ।
आदरणीय सभी पिताओं को सादर नमन के साथ समर्पित ।
हेप्पी फादर्श डे ।

रविवार, 12 मार्च 2017

पर रंगो की होली खेलें जम से ।

💦न कार धोये पानी के नल से , न पानी नहाये शावर के जल से ।
💥पर रंगो की होली खेलें जम से ।
💦न कुएं खत्म हो घर आँगन से , न तालाब घटे खेत खलिहान  से ।
💥पर रंगो की होली खेलें जम से ।
💦न बहे बारिश का पानी शहरों से , न शहर गांव पटे सीमेंट से ।
💥पर रंगो की होली खेलें जम से ।
💦न पानी बर्बाद हो कारखानो के दोहन से , न पानी प्रदूषित हो उधोगों के विषाक्त जल से ।
💥पर रंगो की होली खेलें जम से ।
💦न जंगल खत्म हो औधोगिकरण से , वन बचे माफियाराज के चुंगल से ।
💥पर लकड़ी की होली जले जम से ।
💦न ईर्ष्या न नशा न हुड़दंग से , मनाएं यह होली सुख शांति और उमंग से ।
💥पर रंगो की होली खेलें जम से ।
🎊शुभ ,समृद्ध , वैभवपूर्ण और अनिष्ट दहन होली की बहुत मंगलकामनाएं और बधाइयाँ ।
💐🙏दी. कु. भानरे एवं परिवार ।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

शुभ और मंगलमय हो दिवस ये गणतंत् ।


💥बड़ी सी आजादी थोडा सा बंधन ,
अधिकारों और कर्तव्यों का हो गठबंधन । 
💥थोड़ी सी मस्ती थोड़ी मनमानी ,
अपनों की खुशियों का न हो अतिक्रमण । 
💥हँसता खिलता रहे जन गण मन ,
अमर रहे मेरे देश का गणतंत्र । 
💥देश के सच्चे सपूतों को शत शत नमन ,
शुभ और मंगलमय हो दिवस ये गणतंत्र ।

🙏🌷जय हिन्द जय भारत । 🌷🙏

रविवार, 15 जनवरी 2017

अब न लगे त्योहारो और उत्सवों की खुशियों को ग्रहण


हमारे देश में धार्मिक स्थलों पर त्योहारों एवं उत्सवों के अवसर पर श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है । और हमेशा की तरह शासन और जनसमुदाय द्वारा बरती गई असावधानी और सजगता का आभाव  किसी बड़े हादसों का कारण बनती है । इन हादसों पर फोरी तौर पर कई सुरक्षात्मक कदम उठायें जाने की घोषणा की जाती है एवं जनसमुदाय द्वारा भी सावधानी बरते जाने की बातें की जाती है । और समय गुजरते गुजरते स्थिति वही "ढाक के तीन पात " हो जाती है । यही  मानवजति की समय के साथ पूर्व घटित घटना के सबक को भूलने की ही स्वभाविक प्रवृत्ति का ही परिणाम है की  एक बार पुनः मकर सक्रांति के अवसर पर  पश्चिम बंगाल में गंगासागर का हादसा एवं पटना में गंगा नदी में नाव पलटने पर डूबने से हुई मोतों की दुर्घटना हुई  है ।
निश्चय ही त्योहारों और उत्सवों के अवसरों पर ऐसी घटनाएं  ख़ुशी के माहोल को गमगीन कर जाती है और कंही न कंही श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास पर कुठाराघात कर जाती है साथ ही शासन प्रशासन के व्यवस्थाओं पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है ।
जरुरी है की ऐसी घटनाओ की पुनरावृत्ति को रोकने हेतु शासन द्वारा  कारगर और प्रभावी कदम उठायें जाएँ । आयोजन स्थल में उपस्थित होने वाले जनसमुदाय की निश्चित  संख्या की जानकारी जुटाई जाये , जिससे सुरक्षात्मक और आवश्यक व्यवस्थाएं हेतु प्रभावी कदम उठायें जा सके ।  उपस्थित होने वाले जनसमुदायों के पंजीकरण की व्यवस्था भी की सकती है  इससे सभी की उचित जानकारी का संधारण हो सकेगा । इसके लिए स्वयं सेवी संस्थाओं का सहयोग लिया जा सकता है । हो सके तो उपलब्ध संसाधनों और क्षमता के अनुसार श्रद्धालुओं की उपस्थिति संख्या को सीमित किया जावे । संभावित खतरों का आंकलन कर आवश्यक सुरक्षात्मक एवं उपचारात्मक व्यवस्थाएं बनायीं जावें । उपस्थित होने वाले श्रद्धालुओं को भी व्यवस्थाओं और संभावित खतरों के सम्बन्ध मेँ  आवश्यक परामर्श एवं निर्देश दिए जावें । खतरे वाली जगहों को चिन्हाकित कर आवाजाही प्रतिबंधित की जावे ।
शासन और जनसमुदाय के समुचित सहयोग से उचित प्रबंधन द्वारा अनिष्ट घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है और देश में त्याहारों एवं उत्सवों के अवसरों की खुशियों को दुःख और शोक के  ग्रहण से बचाया जा सकता है ।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

बेपरवाह बच्चे !















कचरों
के ढेरों मैं से प्लास्टिक व धातु के टुकड़े बीनते बच्चे
बेपरवाह गंदगी और सडन के दुष्प्रभाव से , सिर्फ कुछ रुपयों की आस मैं
इस बात से बेखबर से की उम्र का अगला पड़ाव हमें कंहा ले जायेगा ||

चाय की दुकानों व होटलों मैं ग्राहक की हर एक आवाज पर दौड़ते बच्चे
बेपरवाह लोगों की डांट डपट और तिरस्कार से , चंद रूपये से के चूल्हा जलने की आस मैं
इस बात से बेखबर की आने वाली जिन्दगी कैसी होगी ||

भवनों और सड़क निर्माण के कार्यों मैं इंट ढोते और पत्थर तोड़ते बच्चे
बेपरवाह चोटों और बारिश व धुप की तपन से, तुरंत के अच्छे कपडे और पेट भरने आस मैं
बेखबर इस बात से की कल फिर उन्हें जोखिम भरा काम करना होगा ||

स्कूल जाते , महँगी गाड़ियों मैं बैठे बच्चों को निहारते बच्चे
परवाह इस बात की क्या स्कूल जा पाएंगे , गाड़ियों मैं घूम पाएंगे
चंद रुपयों और मदद की आस मैं जिससे हमें यह सब मिल जायेगा
इस बात से खबरदार की हमारा आने वाला भविष्य अच्छा होगा ||

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

शिक्षा प्रणाली की खामियां - बेक़सूर मासूम बच्चे देते कुर्बानियां !

हाल ही मैं देश के कई हिस्सों से बच्चों द्वारा आत्महत्या जैसे अप्रिय और दुखद कदम उठाने की खबर आती रही है । इस तरह की घटनाओं मैं समय दर समय इजाफा होते जा रहा है । पढ़ाई मैं स्वयं की अथवा माता पिताओं की आशा अनुरूप परिणाम न आने अथवा थोपी गई शिक्षा या अधिक नंबर की होड़ वाली शिक्षा के बोझ से तनाव ग्रस्त होने के परिणाम स्वरुप बच्चों द्वारा खुद को नुक्सान पहुचाने वाले आत्महत्या जैसे अप्रिय और दुखद कदम उठाने हेतु बाध्य होना पद रहा है । ऐसी परिसथितियां देश मैं वर्तमान मैं लागू दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली की खामियां और असफलता की कहानी खुद ही बयां करती है ।
1). नैसर्गिक गुणों को अवरुद्ध करती थोपी हुई शिक्षा : - मातापिता अपने बच्चों पर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के मद्देनजर आशा एवं इक्च्छा को थोपकर अपने बच्चे का बचपन क्षीण कर छोटी उम्र मैं ही नम्बरों की होड़ वाली प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ मैं उतार देते हैं और उनकी स्वाभाविक अभिरुचि एवं मौलिक गुण अथवा कौशल एवं हुनर की अनदेखी कर नैसर्गिक गुणों के विकास को अवरुद्ध करते हैं ।
२)। शिक्षा का व्यवसाई करण :- दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था एवं शिक्षकों का एकमात्र उद्देश्य व्यावसाईक हितों के अनुरूप शिक्षा बाजारीकरण करना हो गया है वन्ही शिक्षा को ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य शिक्षा को ग्रहण कर अधिक अधिक से नंबर लाकर अधिक से अधिक ऊँचे वेतन वाले ऊँचे पदों को प्राप्त करना मात्र रह गया है । फलस्वरूप व्यावसाईक एवं स्वार्थपरक व्यक्तित्व युक्ता युवा पीढ़ी का निर्माण हो रहा है । जो अधिक से अधिक भौतिक सुखों और सुविधाओं को प्राप्त करने हेतु भ्रष्ट्राचार , अनैतिक एवं अवैधानिक तरीकों और रास्तों को अपनी जीवन शैली तरजीह दे रहे हैं ।
३)। देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के प्रतिकूल शिक्षा : - देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं व्यावसाईक व तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा कर बनायी गयी शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा ग्रहण करने के बाद आज के युवा अपनी संस्कृति और परम्परागत व्यवसाय से दूर होते जा रहें हैं । वन्ही किताबी ज्ञान आधारित शिक्षा के अनुरूप पर्याप्त रोजगार के अभाव के चलते बेरोजगारी का दंश झेलने हेतु मजबूर है ।
४)। प्राचीन ज्ञान की उपेक्षा करती शिक्षा प्रणाली : - शिक्षा पाठ्यक्रमो मैं न तो देश के पूर्वजों के ज्ञान और अनुभव को स्थान दिया गया है और न ही पुरातन शिक्षा ग्रंथों को शामिल किया गया है । प्राचीन खगोलशास्त्र , ज्योतिष विज्ञानं , आयुर्वेद ज्ञान , योग एवं अध्यात्म एवं अनेक ऐसे कई विषयों की उपेक्षा की गयी है जिससे की भारत को विश्वगुरु होने का दर्जा प्राप्त था । ऐसे विषयों के ज्ञान को परिष्कृत और परिमार्जित कर देश के सामने लाने का गंभीर प्रयास ही नहीं किया जा रहा है । जबकि विदेशी ज्ञान का अन्धानुकरण कर थोपने का प्रयास किया जा रहा है जो की देश की परिस्थिति के पूरी तरह अनुकूल नहीं है ।
५) । शिक्षा एवं ज्ञान के मूल्यांकन की दोषपूर्ण पद्धति : - आज की शिक्षा प्रणाली मैं ग्रहण किया गया ज्ञान का मूल्यांकन न तो व्यक्ति विशेष के कौशल और हुनर का प्रायोगिक परिक्षण से और न ही जीवन शैली और व्यक्तित्व व्यवहार मैं हुए सकारात्मक और रचनात्मक परिवर्तन के आकलन से होता है और न ही समाज और देश के प्रति अपने दायित्वों और कर्तव्यों की समझ और उनके के प्रति संवेदनशीलता से होता है । नंबरों होड़ युक्ता शिक्षा प्रणाली मैं तो बस ग्रहण किये गया ज्ञान के आंकलन हेतु , रटे गए ज्ञान का लिखित परीक्षायों के माध्यम से मूल्याङ्कन से होता है । और इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली बच्चों को तनावग्रस्त करती है और वांछित सफलता न मिलने पर खुद को नुक्सान पहुचाने वाले अप्रिय कदम उठाने हेतु बाध्य करती है ।
अतः आवश्यकता है देश मैं प्राचीन सम्रद्ध ज्ञान के साथ युक्तिसंगत आधुनिक ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था की जो देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप हो , जो बच्चों के मौलिक और नैसर्गिक गुणों को परिष्कृत और परिमार्जित करे एवं स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाए , साथ ही सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के साथ के साथ सामाज और देश के प्रति दायित्वों से जोड़े ।
इस प्रकार हम शिक्षा प्रणाली की खामियां को दूर कर बेकसूर और मासूम बच्चों की कुर्बानियों को रोक पाएंगे ।