शुक्रवार, 15 जून 2018

कहता# नहीं मुंह# पर ........!

कहता# नहीं मुंह# पर ........!

 कितने फरेब पाल रखे है इंसा ,
पर कोशिश होती है सच की तरह दिखाने की ।

कोई समझ न पायेगा सोचता है इंसा ,
खुश होता है सोचकर नादानियां जमाने की ।

खुद तो जिम्मेदारी से दूर भागता है  इंसा ,
दूसरों को तालीम देता है उसूलों को आजमाने की।

खुदा भी रखता हिसाब भूल जाता है इंसा ,
झोंकता रहता है ताउम्र धूल आँखों में जमाने की ।

छोड़ भी दे ऐसी नाकाम कोशिशें ऐ इंसा ,
भागकर अपनी जिम्मेदारी से खुद को भरमाने की ।

क्योंकि इतना नादान नासमझ नही है इंसा ,
कहता नहीं मुंह पर समझता सब चालाकियां जमाने की ।

बुधवार, 30 मई 2018

तुम आये पर दीदार# न हुआ तेरा# !

तुम आये पर दीदार# न हुआ तेरा# !

तप्ती धूप की जलन इस पर पसीने की चुभन ,
तुझसे मिलने का है मन , तेरे इंतज़ार में खड़े है हम ,
तुम आये पर दीदार न हुआ तेरा ,
क्योंकि चेहरे पर नकाब जो चढ़ा रखा था ।

सोचा था होगा मिलन कुछ तो कम होगी जलन,
तेरे झील से है जो लोचन डूबकर राहत पा लेंगे हम ,
पर नजरों पर नजरों का न हुआ बसेरा ,
क्योंकि आँखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा था ।

राहों में दरख्त है कम ठंडी छाँव के लिये तरसे हम ,
सोचा जुल्फों के छाँव में सनम राहत पा लेंगे हम,
पर जुल्फों का साया न मिल सका तेरा ,
क्योंकि सर पर दुपट्टा जो बाँध रखा था ।

उजड़ रहा प्यार का चमन गर्मी जो ढा रही सितम,
कर लें वो सारे जतन बचाएं पानी और लगाएं वन ,
हर मौसम में हो सके 'दीप' दीदार तेरा ,
क्योंकि कायनात खफा होकर न बने व्यथा ।

गुरुवार, 24 मई 2018

चाँद# तारे# तोड़ लाने का वादा# न कर सही !

चाँद# तारे# तोड़ लाने का वादा# न कर सही ।

चाँद तारे तोड़ लाने का वादा न कर सही ।
हर पल साथ चलने का इरादा तो कर सही ।
मिले खुशियों के चार पल ग़ुम न हो कहीं ।
इसमें ही तो छिपी है अपनी  दुनिया  कहीं ।
भले राहों में खुशियों के फूल बिछे हो नहीं ।
काँटों भरी राहों से जरा एतराज भी तो नहीं ।
बातों ही बातों में अब न हो कोई कहाकही ।
बात पर बात बनेगी न रहेगी कुछ अनकही।
इकरार की वो हंसी शाम पल पल गुजर रही ।
कबूले नजरें तमाम अब तुझ पर ही ठहर रही ।
अब दूरियां न रहें दरमियाँ हमसफर हमराही ।
खूबसूरत सफ़र के बन जायें हमतुम इक राही ।
चाँद तारे तोड़ लाने का वादा न कर सही ।
जीवनसाथी बन जाने का तकाजा तो कर सही ।

शुक्रवार, 18 मई 2018

हे सूर्य# देवता# ..............!!!

हे सूर्य# देवता# ..............!!!

हे सूर्य देवता! आपका इतना तपन भरा रोद्र रूप जायज है।
क्योंकि हम इंसानों ने भी प्रकृति के साथ खूब किया छल है ,
काट दिये जंगल है,नदी नाले तालाब के सुखा दिये जल है,
बूंद बूंद पानी पर मची दंगल है ,चारों तरफ बस अमंगल है,
अपनी अपनी जिंदगी बचाने की हो रही रस्में रवायत  है ।।
हे सूर्य देवता!हम इंसान भीषण गर्मी की सजा के ही लायक है।
सीमेंट कांक्रीट के फैले जंगल है,कहाँ रुके बारिश का जल है ,
खूब हो रहा पानी का दोहन है,कुएं-बोर का नीचे गया जल है ,
इस धरा के सरंक्षण से मुंह मोड़ने की हो रही कवायद है ।।
हे सूर्य देवता! हमने ही प्रकृति विनाश की लिखी इबारत है।
क्योंकि न तो उपायों पर कोई अमल है,न ही सहेज रहे जल है,
न ही सुरक्षित रहे वन है,पशु पक्षी भी घरों से हो रहे बेदखल है,
प्रकृति बर्बादी में सब शामिल है,मुश्किल में आने वाला कल है,
सब अपनी जिंदगी में मस्त है अब तो ईश्वर की ही इनायत है ।।

शनिवार, 12 मई 2018

सुख,समृद्धि व शान है माँ की संजिदिगियां ।


भरी गर्मी में भी सेकती है रोटियां ,
गर्म भाप और चूल्हे की लौ से उँगलियाँ जलाते हुये ।
सुबह चाय की प्याली से मिटाती है उबासियां ,
सर्द सुबहों में भी सबसे जल्दी उठकर ठिठुरते हुये ।
बच्चों को रोज रात सुनाती है लोरियाँ ,
अपनी दिनभर की थकान और नींद को भुलाते हुये।
घर आते ही परोसती है नास्ते की तश्तरियां,
ऑफिस या बाहर के बोझ व तनाव को परे रखते हुये ।
मुसीबत में साथ चलती है बन परछाइयाँ ,
हौसला और आत्मविश्वास से सबका संबल बढ़ाते हुये ।
हर वक्त अपनी खुशियों की देती कुर्बानियां ,
बिना किसी शोर शराबे और न नुकर कर मुस्कुराते हुये ।
उनसे ही तो बढ़ती है घर की खुशनसीबियां ,
सुख,समृद्धि व 'दीप' की शान है माँ  की संजिदिगियां ।

विश्व मातृ दिवस के शुभ अवसर पर सभी मातृशक्ति को समर्पित ।


शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

क्या मिलेगा #बेटियों को #खिलखिलाता और #सुरक्षित #जहान !


आज एक मासूम का सुरक्षित नहीं है मान सम्मान और जहान।
आखिर बेटियों को क्यों शिकार बना रहा है  हर उम्र का इंसान।
क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था का धवस्त हो रहा है तान बान।
या आज के माता पिता नहीं बना पा रहें बच्चों को संस्कारवान|
क्या नंबरों की होड़ वाली शिक्षा व्यवस्था का भी है कुछ योगदान।
या जिम्मेदार है परोसे जा रहे फूहड़ता और अश्लीलता के सामान।
या जिम्मेदार है कमजोर कानून ,देर से मिलता न्याय व दंड विधान।
या इन सब से उपजी विकृत सोच और मानसिकता का है परिणाम।
क्या मिलेगा इस भयावह और घृणित समस्या का समाधान।
क्या मिलेगा बेटियों को खिलखिलाता, सुरक्षित 'दीप' जहान।
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रविवार, 15 अप्रैल 2018

कब तक ज्यादिती# की बेदी# पर बेटी# चढ़ती रहेगी रोज!

कब तक ज्यादिती# की बेदी# पर बेटी# चढ़ती रहेगी रोज।

जन्म से पहले ही तो सुरक्षित नहीं थी माँ की कोख ।
दुनिया में आने से पहले अपने ही लगा रहे थे रोक ।
जैसे तैसे इस दुनिया में बेटी ने जन्म लिया एक रोज ।
क्या पता पहले से ही ताक पर बैठे मिलेंगे दरिंदे लोग ।
किस से बचाये अपने को न जाने किसके मन में खोट ।
न जाने  कब  कौन सा साथी कब खो दे अपने होश  ।
गलती नहीं होने पर भी अपनी  हर बार सहती चोट ।
न जाने कब तक लेना होगा अपने सर माथे सारा दोष ।
रोक सका न शोषण अब तक कानून व् केंडल विरोध ।
इतने पर ही  इतिश्री कर क्यों सिल जाते सब के होंठ ।
कब तक उपभोग की वस्तु समझने की न बदलेगी सोच ।
कब तक ज्यादिती की बेदी पर बेटी चढ़ती रहेगी रोज ।
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कहता# नहीं मुंह# पर ........!

कहता# नहीं मुंह# पर ........!  कितने फरेब पाल रखे है इंसा , पर कोशिश होती है सच की तरह दिखाने की । कोई समझ न पायेगा सोचता है इंसा , ...