बुधवार, 13 सितंबर 2017

प्रभाव या अभाव - मासूमों का बचपन कुचलने पर आमादा ।


यह इंसान की  पतित विकृत मानसिकता का प्रभाव है ,
या भौतिकवादी इंसान की नैतिक सोच का आभाव ?
यह धड़ल्ले से परोसी जा रही अश्लीलता का प्रभाव है ,
या इंसान के अच्छे बुरे में अंतर की सोच का आभाव ?
यह मन में सुलग रही हवस की चिंगारी का प्रभाव है ,
या मन की अनैतिक इक्च्छाओं पर नियंत्रण का आभाव ?
जो मौका पाते ही  इंसान को वहशी दरिंदा और हैवान बना कर ,
इस देश के नोनिहालों का शोषण और उत्पीड़न  करवा रही है |
असुरक्षित और भययुक्त वातावरण निर्मित कर ,
एक मासूम का खिलखिलाता बचपन कुचलने पर आमादा कर रही है ।

रविवार, 13 अगस्त 2017

आज़ादी के अपने मायनों का जहान !


आज़ादी के अपने मायनों का जहान,  मेरा प्यारा हिन्दुस्तान ।
कोई देश के लिए जी जी जान से लड़ता ,
कोई देश के खिलाफ जहर उगलता ।
कोई अपने कर्तव्यों पर खरा उतरता ,
कोई सिर्फ अपने हकों के लिए लड़ता ।
कोई अभावों में भी खुश रह जाता ,
किसी को सब कुछ मिलने पर भी डर सताता ।
फिर भी मेरा देश महान , सदा अमर है मेरा हिन्दुस्तान ।

सोमवार, 7 अगस्त 2017

🌹🌷शुभ एवं मंगलमय रक्षाबंधन । 🌺🙏


💐भाई- बहिन के अपार  स्नेह और अटूट बंधन के पावन पर्व की कोटिशः बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं । 💐

🌹🌷शुभ एवं मंगलमय रक्षाबंधन । 🌺🙏

सोमवार, 24 जुलाई 2017

खुलकर मुस्कुराने दो हमें ।


खुलकर मुस्कुराने दो हमें ,
न दबे बचपन किताबों के बोझों  के  तले ।
फूलों की तरह खिलने दो हमें ,
न झुलसे  मासूमियत  बड़ों के अरमानों के तले ।
बातें करने दो  आसमानों से हमें ,
न गुजरे ये बचपन चाहरदीवारों के तले  ।
भीग जाने दो बारिश में हमें ,
न रोको लेने दो मौसम के खुलकर मजे ।
न डालो इतनी जिम्मेदारियां हमें ,
कहीँ  खो ना जाये बचपन वक्त से पहले ।
जी लेने दो जीभर बचपन हमें  ,
फिर तो बीतने ही है संघर्ष से जिंदगी के हर लम्हे ।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

आदत सी हो गई है इस दिल को समझाने की ।


अब तो आदत सी हो गई है  इस दिल#dil को समझाने की ।
नहीं होती है मुकम्मिल मंजिल जिंदगी के हर फंसाने की ।
होती है बात पत्थर उछालकर आसमान में छेद कर जाने की।
बातें है बातों का क्या सब बातें है दिल को भरमाने की ।
चार किताब पढ़कर तमन्ना की उन बातों को आजमाने की ।
पर इन सबसे से इतर कुछ और ही दिखी रंगत जमाने की ।
होती रही हर कोशिश हर शख्स को खुश कर अपनाने की ।
मिली है ख़बरें सीधे लोग और सीधे पेड़ को काटे जाने की ।
जमाने में और भी गम है छोड़ दो दीप शिकायतें जिंदगानी की
अब तो आदत सी हो गयी इस दिल को यूँ ही समझाने की।
     

रविवार, 16 जुलाई 2017

बढ़ गयी है दूरियां मेरे ही अपनों से ।


कुछ यूँ ही बढ़ गयी है दूरियां मेरे ही अपनों से ।
जब से गढ़ ली है  दुनिया छोटे बड़े सपनों से ।
जिन रिश्तों ने संभाला था मुझे बड़े जतनों से ।
सब कुछ पाने की आपाधापी में हो गए अनजानों से ।
वक्त नहीं की कर सकूँ खुलकर बातें आसमानों से ।
बस उलझते रहता हूँ कल मिलने वाले परिणामों से ।
वापस लौट आ दीप अब न कर हरकतें नादानों से ।
अब रोक ले , बाहर निकल आ इन बढ़ते अरमानों से ।
काश रुक जाये  रिश्तों का दरकना ऐसे प्रयत्नों से ।
वही  मेरी छोटी सी दुनिया फिर मिल जाये मेरे अपनों से ।

रविवार, 9 जुलाई 2017

गुम है मेघा , रूठी है वर्षा !

ग़ुम हो गए हैं कहां  मेघा , कहां रूठ चली गयी है वर्षा ।
इंतज़ार मैं आँखे सूखी ,  कैसे मिटे तन मन की तृष्णा ।
है नीर बिना ताल सूखा , ना कल कल करे  सरिता ।
ताप्ती हुई है ये धरती,  बिन पानी है सब तरसना ।
है खेतों ने  खोई रौनक , बिलकुल भी चले बस ना ।
उदासी में गुम है प्रकृति , कैसे दुनिया में  गढ़े नई रचना ।
है सबकी यही तमन्ना , सब हिलमिल करे उपासना ।
ऐसा हो दीप करिश्मा,  आकर काले मेघा  लगे बरसना ।