मंगलवार, 7 फरवरी 2012

बेपरवाह बच्चे !















कचरों
के ढेरों मैं से प्लास्टिक व धातु के टुकड़े बीनते बच्चे
बेपरवाह गंदगी और सडन के दुष्प्रभाव से , सिर्फ कुछ रुपयों की आस मैं
इस बात से बेखबर से की उम्र का अगला पड़ाव हमें कंहा ले जायेगा ||

चाय की दुकानों व होटलों मैं ग्राहक की हर एक आवाज पर दौड़ते बच्चे
बेपरवाह लोगों की डांट डपट और तिरस्कार से , चंद रूपये से के चूल्हा जलने की आस मैं
इस बात से बेखबर की आने वाली जिन्दगी कैसी होगी ||

भवनों और सड़क निर्माण के कार्यों मैं इंट ढोते और पत्थर तोड़ते बच्चे
बेपरवाह चोटों और बारिश व धुप की तपन से, तुरंत के अच्छे कपडे और पेट भरने आस मैं
बेखबर इस बात से की कल फिर उन्हें जोखिम भरा काम करना होगा ||

स्कूल जाते , महँगी गाड़ियों मैं बैठे बच्चों को निहारते बच्चे
परवाह इस बात की क्या स्कूल जा पाएंगे , गाड़ियों मैं घूम पाएंगे
चंद रुपयों और मदद की आस मैं जिससे हमें यह सब मिल जायेगा
इस बात से खबरदार की हमारा आने वाला भविष्य अच्छा होगा ||

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

शिक्षा प्रणाली की खामियां - बेक़सूर मासूम बच्चे देते कुर्बानियां !

हाल ही मैं देश के कई हिस्सों से बच्चों द्वारा आत्महत्या जैसे अप्रिय और दुखद कदम उठाने की खबर आती रही है । इस तरह की घटनाओं मैं समय दर समय इजाफा होते जा रहा है । पढ़ाई मैं स्वयं की अथवा माता पिताओं की आशा अनुरूप परिणाम न आने अथवा थोपी गई शिक्षा या अधिक नंबर की होड़ वाली शिक्षा के बोझ से तनाव ग्रस्त होने के परिणाम स्वरुप बच्चों द्वारा खुद को नुक्सान पहुचाने वाले आत्महत्या जैसे अप्रिय और दुखद कदम उठाने हेतु बाध्य होना पद रहा है । ऐसी परिसथितियां देश मैं वर्तमान मैं लागू दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली की खामियां और असफलता की कहानी खुद ही बयां करती है ।
1). नैसर्गिक गुणों को अवरुद्ध करती थोपी हुई शिक्षा : - मातापिता अपने बच्चों पर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के मद्देनजर आशा एवं इक्च्छा को थोपकर अपने बच्चे का बचपन क्षीण कर छोटी उम्र मैं ही नम्बरों की होड़ वाली प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ मैं उतार देते हैं और उनकी स्वाभाविक अभिरुचि एवं मौलिक गुण अथवा कौशल एवं हुनर की अनदेखी कर नैसर्गिक गुणों के विकास को अवरुद्ध करते हैं ।
२)। शिक्षा का व्यवसाई करण :- दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था एवं शिक्षकों का एकमात्र उद्देश्य व्यावसाईक हितों के अनुरूप शिक्षा बाजारीकरण करना हो गया है वन्ही शिक्षा को ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य शिक्षा को ग्रहण कर अधिक अधिक से नंबर लाकर अधिक से अधिक ऊँचे वेतन वाले ऊँचे पदों को प्राप्त करना मात्र रह गया है । फलस्वरूप व्यावसाईक एवं स्वार्थपरक व्यक्तित्व युक्ता युवा पीढ़ी का निर्माण हो रहा है । जो अधिक से अधिक भौतिक सुखों और सुविधाओं को प्राप्त करने हेतु भ्रष्ट्राचार , अनैतिक एवं अवैधानिक तरीकों और रास्तों को अपनी जीवन शैली तरजीह दे रहे हैं ।
३)। देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के प्रतिकूल शिक्षा : - देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं व्यावसाईक व तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा कर बनायी गयी शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा ग्रहण करने के बाद आज के युवा अपनी संस्कृति और परम्परागत व्यवसाय से दूर होते जा रहें हैं । वन्ही किताबी ज्ञान आधारित शिक्षा के अनुरूप पर्याप्त रोजगार के अभाव के चलते बेरोजगारी का दंश झेलने हेतु मजबूर है ।
४)। प्राचीन ज्ञान की उपेक्षा करती शिक्षा प्रणाली : - शिक्षा पाठ्यक्रमो मैं न तो देश के पूर्वजों के ज्ञान और अनुभव को स्थान दिया गया है और न ही पुरातन शिक्षा ग्रंथों को शामिल किया गया है । प्राचीन खगोलशास्त्र , ज्योतिष विज्ञानं , आयुर्वेद ज्ञान , योग एवं अध्यात्म एवं अनेक ऐसे कई विषयों की उपेक्षा की गयी है जिससे की भारत को विश्वगुरु होने का दर्जा प्राप्त था । ऐसे विषयों के ज्ञान को परिष्कृत और परिमार्जित कर देश के सामने लाने का गंभीर प्रयास ही नहीं किया जा रहा है । जबकि विदेशी ज्ञान का अन्धानुकरण कर थोपने का प्रयास किया जा रहा है जो की देश की परिस्थिति के पूरी तरह अनुकूल नहीं है ।
५) । शिक्षा एवं ज्ञान के मूल्यांकन की दोषपूर्ण पद्धति : - आज की शिक्षा प्रणाली मैं ग्रहण किया गया ज्ञान का मूल्यांकन न तो व्यक्ति विशेष के कौशल और हुनर का प्रायोगिक परिक्षण से और न ही जीवन शैली और व्यक्तित्व व्यवहार मैं हुए सकारात्मक और रचनात्मक परिवर्तन के आकलन से होता है और न ही समाज और देश के प्रति अपने दायित्वों और कर्तव्यों की समझ और उनके के प्रति संवेदनशीलता से होता है । नंबरों होड़ युक्ता शिक्षा प्रणाली मैं तो बस ग्रहण किये गया ज्ञान के आंकलन हेतु , रटे गए ज्ञान का लिखित परीक्षायों के माध्यम से मूल्याङ्कन से होता है । और इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली बच्चों को तनावग्रस्त करती है और वांछित सफलता न मिलने पर खुद को नुक्सान पहुचाने वाले अप्रिय कदम उठाने हेतु बाध्य करती है ।
अतः आवश्यकता है देश मैं प्राचीन सम्रद्ध ज्ञान के साथ युक्तिसंगत आधुनिक ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था की जो देश की प्राकृतिक , भौगोलिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप हो , जो बच्चों के मौलिक और नैसर्गिक गुणों को परिष्कृत और परिमार्जित करे एवं स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाए , साथ ही सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के साथ के साथ सामाज और देश के प्रति दायित्वों से जोड़े ।
इस प्रकार हम शिक्षा प्रणाली की खामियां को दूर कर बेकसूर और मासूम बच्चों की कुर्बानियों को रोक पाएंगे ।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

न विपक्ष न सरकार- बढती हुई महंगाई से नहीं हे कोई सरोकार !

बढती मंहगाई पर मीडिया और समाचार पत्र लगातार ख़बरें पर ख़बरें दिखा रहें हैं और छाप रहें हैं । महंगाई है सुरसा की मुख की तरह दिन दूनी और रात चोगुनी कहावत को चरितार्थ करते हुए गुणात्मक वृद्धि करती जा रही है , आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहें है चाहे अनाज की बात करें या फिर शक्कर की या फिर सब्जी की , सभी के दाम एक एक कर आम जनता की क्रय शक्ति से दूर होते जा रहें है । किन्तु सरकार है की उसके कानो मैं जूँ तक नहीं रेंग रही है । कृषि मंत्री की बात करें तो असम्वेदन हीनता का परिचय देते हुए महंगाई को रोकने मैं असमर्थता जताते हुए खुद को और सरकार को असहाय बता रहे हैं । कई महीनो से महंगाई अपना प्रभाव महामारी की तरह बढ़ा रही है और सरकार है की किम कर्तव्य विमूढ़ होकर हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रही है । पहले मन्दी की मार का रोना गया और अब कोई बहाना नहीं मिला तो खुद को ज्योत्षी न कहकर बढती हुई मंहगाई को रोकने मैं असमर्थता जाहिर करते हुए जनता को बढती हुई महंगाई से लड़ने हेतु असहाय छोड़ रहे हैं । जब जनता खुद की चुनी हुई सरकार और मंत्रियों को महंगाई के मामले मैं असहाय पा रही है तो अब जनता किसके पास इस बढती महंगाई से निजात पाने हेतु गुहार लगाने जाए । वन्ही विपक्ष मैं बैठे हुए चुने हुए जनप्रतिनिधि भी बढती हुई मंहगाई पर चुप्पी साधे हुए बैठे हुए हैं । उससे तो ऐसा प्रतीत होता है की इन्हें भी जनता की इस समस्या से कोई सरोकार नहीं है । और वे भी सरकार के साथ मौन सहमती देते हुए असर्मथता प्रकट कर रहें हैं ।
सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया जिसकी की प्रभावस्वरूप मंहगाई मैं कोई कमी परिलक्षित हो , साथ ही देश के माननीय प्रधानमन्त्री की इस मामले पर चुप्पी अवं निष्क्रियता भी जनता के मन संशय और संदेह की स्थिती निर्मित कर रही है । और यह सभी गतिविधियाँ देश की लोकतान्त्रिक सरकार की लोकतंत्र की जनता के प्रति जनकल्याण अवं जनसेवा की भावना के प्रति प्रतिबधता और उत्तरदायित्व का दायित्व बोध से उपज रही विरक्ति को दर्शाती है । वन्ही विपक्ष द्वारा भी सरकार को बढती हुई महंगाई को रोकने हेतु आवश्यक कदम उठाने हेतु बाध्य न करने और सरकार के साथ मिलकर कोई रचनात्मक और सकारात्मक कदम न उठाने की अकर्मण्यता भी विपक्ष अथवा सरकार के बाहर बैठे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का देश हित और जनहित की भावना के प्रतिकूल व्यवहार और उत्तरदायित्व के प्रति विमुखता को दर्शाता है ।
देश मैं निर्मित हो रही ऐसी परिस्थितियां तो यही जाहिर कर रही है की न तो सरकार को और न ही विपक्ष बैठे जन प्रतिनिधियों को जनता के हितो से कोई सरोकार रह गया है बस सरोकार है तो सिर्फ व्यक्ति गत और राजनीतिक हितो से ।

रविवार, 20 दिसम्बर 2009

असंतोष और उपेक्षा से उपजी हताशा का परिणाम है - प्रथक राज्य की मांग !

असंतोष और उपेक्षा से उपजी हताशा का परिणाम है - प्रथक राज्य की मांग !
तेलंगाना राज्य को प्रथक राज्य बनाने की घोषणा के बाद , अब देश के हर कोने से प्रथक राज्य गठन की मांग उठने लगी है । कुछ लोग प्रभावशाली और कारगर प्रशासनिक व्यवस्था क्रियान्वयन और नियंत्रण के मद्देनजर प्रथक छोट छोटे राज्यों की मांग को जायज ठहराते हैं । तो वन्ही कुछ राजनैतिक लोग सत्ता अवं महत्वपूर्ण पदों की लालसा अवं राजनीतिक नफे नुकसान की द्रष्टि से प्रथक राज्य की मांग करते हैं । जबकि मुझे लगता है की क्षेत्र विशेष का असंतुलित विकास , असमान वित्तीय संसाधनों का आवंटन अवं उपेक्षित भाव से उपजे असंतोष और हताशा का परिणाम है प्रथक राज्य की मांग ।
जो भी हो इस तरह से देश के हर प्रदेशों से छोट छोटे टुकड़े कर प्रथक राज्यों की मांग को हवा देना देश की अखंडता और एकता की सीरत और सेहत के लिए अच्छा नहीं है । प्रथक राज्य की मांग का उठाना अथवा उठाया जाना , जनहित और प्र देशहित से वास्ता तो कम किन्तु तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ ज्यादा नजर आता है । अभी तक जितने प्रथक राज्यों का गठन हुआ है उनमे कुछ को छोड़कर कितनो का विकास पूर्व की तुलना मैं ज्यादा बेहतर हो पाया है यह संभवतः किसी से छुपा नहीं होगा । फिर भी इस बहाने देश को छोटे छोटे टुकड़ों मैं क्षेत्रवाद , भाषावाद अवं वर्ग विशेष वाद के आधार पर तोडना कंही अधिक घातक होगा ।
यदि राजनीतिक और प्रशासनिक इक्क्छा शक्ति हो तो देश को छोटे छोटे राज्यों मैं बिना तोड़े और प्रथक राज्य के गठन के बिना ही प्रदेश और प्रदेश वासियों का समुचित और पर्याप्त विकास उनकी अपेक्षा और आवशकताओं के अनुरूप किया जा सकता है । वित्तीय संसाधनों का सामान रूप से आबंटन , केंद्रीय और राज्य स्तरीय सत्तात्मक नेत्रत्व मैं आबादी के हिसाब से सभी क्षेत्रों की सामान भागीदारी , क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन से प्राप्त राजस्व का अधिकतम भाग क्षेत्र के विकास हेतु ही लगाया जाना , क्षेत्र विशेष के हितों और आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं का निर्माण और उनका कारगर और प्रभावी क्रियान्वयन , बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के सभी प्रदेशों को सामान विकास के अवसर उपलब्ध कराना इत्यादि ऐसे अनेक कार्य लोगों के असंतोष और निराशा को दूर कर वर्तमान राज्य और राष्ट्र व्यवस्था मैं ही लोगों का विश्वास कायम रखने मैं महती भूमिका निभा सकते हैं और देश को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों और भाषा , क्षेत्र और वर्ग विशेष के आधार पर छोटे छोटे टुकड़ों मैं बटने से रोका जा सकता है ।

रविवार, 13 दिसम्बर 2009

ग्लोबल वार्मिंग - एक सकारात्मक पहल आवश्यक !

कोपेनहेगन मैं ग्लोबल वार्मिंग्स पर चल रहे सम्मलेन मैं सभी विकसित , विकासशील और अविकसित देश ओधोगिक विकास की गति धीमी होने , सुख सुविधाओं के संसाधनों मैं कमी और देश का विकास अवरुद्ध होने अथवा धीमी होने की कीमत पर कार्बन उत्सर्जन की मात्रा मैं कमी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के उपायों को अपनाने मैं जो की प्रत्यक्ष रूप से देश और देश के लोगों को नुक्सान पहुचा सकते हैं आनाकानी कर रहे हैं और किसी भी इस प्रकार के किसी भी मसोदे पर एकमत और सहमत होते नही दिखाई दे रहे हैं । सभी देश अपने अपने हितो के अनुरूप विरोधाभासी मसोदे और सुझाब पेश कर रहे हैं । कोई भी देश स्वयं जिम्मेदारी न लेकर एक दूसरे पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं । ऐसी स्थिति मैं कोपेनहेगन मैं सर्व सहमति युक्त प्रभावी और कारगर समझोता अथवा संधि होने की स्थिति दिखायी नही दे रही है । और डर है की इतने तामझाम के साथ शुरू हुई बैठक कंही बेनतीजा समाप्त न हो जाए ।
अतः कुछ ऐसे छोटे छोटे और प्रभावी प्रयासों को अपनाने हेतु सहमती बनाने की कोशिश की जाए जिससे सभी देश की हितो की अनदेखी भी न हो और ग्लोबल प्रभाव को भी कम किया जा सके ।
१। सबसे पहले तो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को रोकने के उपायों की क्रियान्वयन , नियंत्रण और निगरानी हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था की गठन एवं एक साझा फंड का निर्माण किया जाए , जिसमे सभी देश अपनी आर्थिक क्षमता अनुसार आर्थिक सहायता देवें ।
२। ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव को कम करने हेतु सभी देशो को उनकी भुक्षेत्रो और आर्थिक क्षमता के आधार पर अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाना अनिवार्य किया जाए । आर्थिक रूप से कमजोर और अविकसित देशों को वृक्षारोपण , वनों के सरक्षण , संवर्धन और प्रकृति मैं अनावश्यक दखल को रोकने हेतु अवश्य वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ।
३। उर्जा के वैकल्पिक संसाधनों जैसे सोलर उर्जा , पवन उर्जा एवं समुद्रीय तापीय उर्जा और प्रथ्वी की ताप उर्जा को प्रयोग करने हेतु सरल एवं सस्ती युक्तियाँ विकसित करने एवं अन्य पर्यावरण हितेषी वैकपिक उर्जा संसाधनों को अपनाने पर अधिक से अधिक बल दिया जाए ।
४। इन उर्जा संसाधनों की सुलभ और कम लागत वाली तकनीकों और ज्ञान को एक दूसरों के साथ बांटा जाए । और अधिक सर्वसुलभ और सस्ती एवं विश्वसनीय तकनीको के विकास और अनुसंधान हेतु साझा प्रयासों को बल दिया जाए ।
५। विश्व समुदायों को कार्बोन उत्सर्जन को बढ़ाने और प्रथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाली वस्तुओ और संसाधनों के कम प्रयोग अथवा न अपनाने को प्रोत्साहित करने और पर्यावरण अनुकूल अधिक से अधिक उपायों को अपनाने हेतु प्रेरित करने के उद्दश्य से जागरूकता बढ़ाने वाले और शिक्षित करने वाले प्रसार प्रचार के अधिक से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम चलाये जावे .
6. कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने वाले उत्पादों की उत्पादकता को कम करने एवं उसके स्थान पर पर्यावरण हितेषी उत्पाद बनाने वाली कंपनी को हर तरह की सहायता देकर प्रोत्साहित किया जावे । बड़ी उद्योगों को ऐसे उत्पादों की उत्पादकता को कम करने एवं पर्यावरण हितेषी उत्पाद को बनाने हेतु राजी और प्रोत्साहित किया जावे ।
७। कम कार्बन उत्सर्जन एवं पर्यावरण को नुक्सान न पहुचाने वाले वाहनों और संसाधनों के उपयोग पर अधिक से अधिक बल दिया जावे । पर्यावरण हितेषी वाहनों और संसाधनों के अनुसन्धान और खोज पर जोर दिया जाए ।
विरोधाभासी बातों को करने एवं एक दूसरों के हितो की अनदेखी करने वाली बातों को छोड़कर कुछ इस तरह की बातों को शामिल कर कम से कम एक सर्व सहमती युक्ता मसोदा तैयार किया जाकर ग्लोबल वार्मिंग को रोकने एवं प्रथ्वी और प्रथ्वी वासी बचाने हेतु एक नेक और सकारात्मक शुरुआत तो की ही जा सकती है ।

सोमवार, 23 नवम्बर 2009

ऐसी ख़बरें अब हैरान नही करती - विचलित और दुखित जरूर करती है !

हाल ही मैं मधु कोड़ा द्वारा काली कमाई से अरबों रुपयों एकत्रित करने का समाचार अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया मैं छाया रहा । किंतु ऐसा लगता है की अब देश के लोग अब ऐसी ख़बरें सुनकर और पढ़कर हैरान नही होते होंगे , क्योंकि नेताओं और मंत्रियों के भ्रष्टाचार और काली कमाई से अकूत धन संपत्ति जमा करने की ख़बरें जितनी तेजी से सनसनी खेज ख़बरें बनकर सामने आती है उतनी तेजी से देश के खबरिया परिद्रश्य से गायब भी हो जाती है । कार्यवाही के नाम पर वाही बेनतीजा जांच पड़ताल और लीपा पोती होती है । चारा घोटाला , ताज कोरिडोर मामला , हवाला काण्ड और बोफोर्स दलाली मामला न जाने कितने मामले अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से देश के सामने आए , किंतु इन सबका क्या हस्र हुआ वह वह देश वासी से छुपा नही है । और अब मधु कोड़ा के मामले का भी हस्र को भी संभवतः सभी देश वासी जानते ही होंगे । दिन बीतते जाने पर अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से ख़बरें ओझल होती जायेगी और लोगों के दिमाग से भी । बाद मैं किसी को भी यह जाने की फिक्र नही होती है की मामले पर क्या कार्यवाही हो रही है और किस स्थिति तक पहुची है ।
ऐसे मामलों मैं एक बात और सामने आती है की हमेश आरोपी पक्ष इन आरोपों से इंकार करता है और कई बार ऐसे सदमे मैं अस्पताल की और रुख कर जाता है जो की इस तरह के लगभग सभी मामले मैं होता है । किंतु उनकी कथनी और करनी मैं तब संसय के बादल उठने लगते है जब आरोपी राजनेता अथवा मंत्री गण मातृ आरोपों से इनकार कर अपना पल्ला झाड लेते हैं , और यदि वाकई ये राजनेता बेदाग़ और पाक साफ़ है तो उनके विरुद्ध ऐसे आरोप लगाने और छापने वालों पर कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नही करते है ।
दूसरी बात यह की आख़िर अख़बार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले बिना किसी आधार और तथ्यों के अति विशिष्ट और जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्ति पर आरोप तो ऐसे ही नही लगाते होंगे । उनके पास भी तो कोई विश्वशनीय सूत्र अथवा श्रोत तो रहते होंगे तो फिर क्यों नही सरकार और जांच एजेंसी इस तरह अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया द्वारा जुटाए गए प्रमाणों को अपनी जांच कार्यवाही मैं शामिल करती । और यदि ऐसी ख़बरें आधार हीन और झूठी होती है तो ऐसे अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया वालों पर कार्यवाही क्यों नही करती है और क्यों नही उनसे इसके लिए जवाव मांगती है । किंतु दोनों ही परिष्ठितियाँ मैं ऐसी निष्क्रियता और नकारात्मक भाव दाल मैं काले होने की आशंका को बलबती करती है । और इन सबके बीच देश वासी ऐसी ख़बरें को सुनकर और पढ़कर और ऐसे मामलों के हस्र को सोचकर विचलित और दुखित जरूर होता है किंतु ऐसी ख़बरें आने पर हैरान नही होता है ।

शनिवार, 14 नवम्बर 2009

कितना जिम्मेदार विपक्ष है हमारे पास !

कितना जिम्मेदार विपक्ष है हमारे पास !
हमेशा से सत्ता आरूढ़ पार्टी अथवा जन प्रतिनिधि को ही देश मैं चल रही विभिन्न गतिविधियों हेतु जिम्मेदार माना जाता है एवं उसे ही जनता के आक्रोश और आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता है । क्या सत्ता से बाहर बैठे विपक्षी जन प्रतिनिधि और पार्टियाँ की भी जिम्मेदारी तय करने भी जहमत उठायी जाती है । क्या हमारे देश की सरकार के गुणदोष बत्ताने और विफलताओं की और ध्यान दिलाने और जनहित के मुद्दों शसक्त और जिम्मेदार तरीके से उठाने वाला विपक्ष मोजूद है ।
इस बात की अनदेखी की जाती है की जितनी जिम्मेदारी और विश्वाश के साथ जनता राजनीतिक पार्टी और जन प्रतिनिधियों को बहुमत से चुनकर सरकार चलाने हेतु भेजती है उतनी जिम्मेदारी और सक्रिय भूमिका की अपेक्षा विपक्ष मैं बैठने वाली पार्टी अथवा जनप्रतिनिधियों से भी की जाती है ।
आमतौर पर विपक्ष हमेशा सत्तापक्ष की किसी भी गतिविधियाँ अथवा नीतियों की आलोचनाओ अवं विरोध कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझता है । फ़िर वह चाहे वह सही हो या ग़लत । संसद मैं हंगामा खड़ा कर संसद की कार्यवाहियों की को बाधित करते हैं और संसद के संचालन मैं होने वाले करोडो रूपये की व्यय को जाया होने देते हैं । देश के राजनीतिक गलियारे मैं मची हलचले और गतिविधियों से तो ऐसा ही जाहिर होता है की सत्ता हासिल किए बिना अथवा मलाईदार और रुतबेदार पदों के अभाव मैं जन सेवा और देश सेवा हो ही नही सकती है । और ऐसी लालसा मैं जनप्रतिनिधि और पार्टियाँ जोड़तोड़ की राजनीति कर जनादेश की उपेक्षा करती नजर आती है ।
वैसे भी सत्ता से दूर और विपक्ष मैं बैठी पार्टी अथवा जनप्रतिनिधि जनसेवा और देश सेवा के नाम पर कार्य करते तो शिफर ही नजर आते है सिवाये खोखले भाषण और आलोचनाओं के । अपने किसी बड़े नेता आगमन पर स्वागत सत्कार हेतु बेनरो , पोस्टरों और प्रचार प्रसारों की सामग्रियों मैं करोड़ों रूपये करते जरूर नजर आयेंगे बजाय यही पैसा जनहित मैं खर्च करने के । कितनी राजनीतिक पार्टी प्राकृतिक आपदाओं अथवा किसी दुर्घट नाओं मैं हताहतों लोगों की आर्थिक सहायता करते नजर आती हैं ।
जन्हा सरकार और सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक पार्टियों की प्राथ मिक्ताओं मैं भूख , भ्रष्टाचार और बेरोजगारी , बढती मंहगाई , जमाखोरी , कालाबाजारी अवं जनसुरक्षा और सुशासन जैसे मुद्दे ओझल नजर आते हैं वन्ही भी चुप्पी साधकर इन मुद्दों से जी चुराकर किनारा करते नजर आते हैं । और यह परिद्रश्य यह संसय पैदा करता है की कंही न कंही पक्ष अवं विपक्ष मैं मौन सहमती और स्वीकृति तो नही है ।
क्या हम एक जनहित और देशहित के प्रति रचनात्मक और सकारात्मक जिम्मेदार विपक्ष की उम्मीद कर सकते हैं । क्या इनके कार्यों के आकलन और निगरानी हेतु कोई युक्ति और व्यवस्था बनायी जा सकती है । क्योंकि इनके चुनाव और सुख सुबिधाओं पर भी तो जनता की खून पसीने की कमाई का पैसा खर्चा किया जाता है ।