बुधवार, 11 मार्च 2009

सारी रोक टोक आम लोगों के उत्सव और त्योहारों पर क्यों ?

दिवाली पर फटाके न फोडे , रंगों की होली न खेले सिर्फ़ तिलक होली खेलें , लकडियों की होली न जलाएं , मूर्तियों का विसर्जन तालाबों और नदियों मैं न करें , उत्सवों पर ज्यादा बिजली का प्रयोग न करें इत्यादि इत्यादि ।
कंही पर्यावरण के नाम पर , कंही जल सरक्षण के नाम पर तो कंही उर्जा सरंक्षण के नाम पर कंही न कंही आम लोगों के उत्सवों और त्योहारों पर रोकटोक लगाने के प्रयास किए जाते रहे हैं । जो की वर्ष भर मैं एक दिन की ही होते हैं और इन त्योहारों और उत्सवों को आम आदमी बड़ी खुशी और बड़े उत्साह पूर्वक मनाती है । और ये त्योहारों और उत्सवों के ही कुछ खास दिन होते है जब आम आदमी मिल बैठकर परिवार और पड़ोसियों के साथ मिल बैठकर खुशियों बांटते हुए सोहार्द पूर्ण वातावरण मैं खुशियों मनाते हैं । बाकी के दिन तो लगा रहता है रोटी , कपड़ा और मकान की जुगत मैं । और अब किसी न किसी बहाने इन खुशियों पर भी रोकटोक लगाने और उसे सीमांकित करने की कोशिश की जा रही है । वन्ही आज भारतीय परिवेश और संस्कृति को प्रदूषित करने वाले वैलेंटाइन जैसे उत्सवों और पब और पाश्चात्य संस्कृति को आधुनिकता और रुदिवाद को दरकिनार करने के नाम पर बढ़ावा और सरक्षण दिया जा रहा है । किंतु आम लोगों के भारतीय त्योहारों पर रोकटोक लगाकर उनके स्वरुप बदलने और सीमांकित करने की कोशिश हो रही है ।
इसमे कोई दो राय नही की पर्यावरण सरक्षण होना चाहिए , जल सरक्षण और उर्जा सरक्षण आज की महती आवश्यकता है और इस हेतु प्रयास होने चाहिए किंतु आम लोगों की खुशियों पर आघात के नाम पर नही । इन एक दिनों के त्योहारों मैं उपयोग होने वाला पानी , पर्यावरण और उर्जा की हानि बौनी साबित होती है जो रोज रोज चल रहे उद्योगों से जल , उर्जा और पर्यावरण की बर्बादी होती है , रोजाना व्ही आई पि और बड़े लोगों की धुलने वाली गाड़ियों और बिना टोंटी के नल से जल की बर्बादी , उनके द्वारा अपनी सुख सुविधाओं हेतु उपयोग की जा रही बेतहाशा बिजली जिसमे कई लोगों की लाखों रूपये के बिजली के बिल भी बकाया भी रहते हैं , शहरीकरण और विकास के नाम पर कांटे जा रहे जंगल , बड़े बड़े और आलिशान भवनों के निर्माण मैं उपयोग हो रही उर्जा और जल और अन्य संसाधनों अवं अन्य सुख सुविधाओं के उपयोग से प्रदूषित होता पर्यावरण से होती है ।
क्या ऐसी ही रोकटोक इन पर लगाई जा सकेगी ? क्या ऐसा कोई आन्दोलन इन लोगों के लिए भी चलाया जाएगा ? अथवा इस प्रकार की रोकटोक और आन्दोलन आम लोगों के लिए और आम लोगों तक ही सीमित होकर रह जायेंगे ?

आप सभी को होली के पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं

9 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

विचारणीय है लेख आपका ..रोक टोक लगे न लगे त्योहारों का वह उत्साह अब दिखता नहीं है

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा मुद्दा उठाया है..

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

विचारणीय लेख है...होली पर्व की ढेरो शुभकामना और बधाई.

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

यह मुद्दा बारबार दिल में आता रहा है, आज आपने उठा ही दिया। चैन मिला। जब बड़ी-बड़ी आतिश्‍ाबाजी की जाती है तब पर्यावरण प्रदूष्‍ाण नहीं होता लेकिन दीवाली पर हो जाता है। व्‍यापारियों को बाध्‍य नहीं किया जाता कि रंगों में मिलावट नहीं करे पर कहा जा रहा है कि होली ही नहीं खेले। कल अमेरिका रह रहे बेटे ने कहा कि अब तो लगता है कि हम ही त्‍योहार मनाएंगे आप तो तिलक होली ही खेलना। आपको शुभकामनाएं

neeshoo ने कहा…

हमारे लिये ही ये रोक लगती है जिससे हम स्वस्थ्य रहें बस इसी लिये पर मानता कौन है ?

संगीता पुरी ने कहा…

सहमत हूं आपसे ... बहुत सुदर लिखा है।

Anil Pusadkar ने कहा…

बहुत सही सवाल उठाया आपने।बधाई आपको होली की।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बेहद विचारणीय मुद्दा उठाया आपने.......सचमुच बहुत बार मन में यही प्रश्न कौधता है कि आखिर हम लोग ही क्यूं ?

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सही मुद्दा उठाया आप ने मै Dr. Smt. ajit gupta जी की बात से पुर्णत्या सहमत हुं
धन्यवाद