बुधवार, 10 जून 2009

यह भेद का भाव कब मिटेगा !

एक इंसान का दूसरे इंसान मैं भेद अर्थात अन्तर करने का यह भावः प्राचीन काल से चला आ रहा है । कभी ऊंची और नीची जाती के रूप मैं तो कभी उच्च कुल और निम्न कुल के रूप मैं तो कभी आमिर और गरीब के रूप मैं । किंतु यह इंसानी समाज ज्यों ज्यों जितना आधुनिक , पढालिखा और सभ्य कहलाने लगा है उतना ही यह इंसान से इंसान मैं भेद करने का भाव नए नए रूप मैं सामने आ रहा है । जैसे हाल ही की रंग भेद की घटना जो की आस्ट्रेलिया मैं भारतीय छात्रों के साथ हुई है नस्लभेद और रंगभेद का दंश पहले भी कई बार भारतीय झेल चुके हैं , बिहार मैं ट्रेन जलाने की घटना जिसमे क्षेत्रवाद के भेद की बू आती है ( इसमे इस बात की दुबिधा जरूर हो सकती है की इसमे पहले देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों के साथ भेदभाव हुआ है फिर अब बिहार के लोगों के साथ हो रहा है ) । यह भेद भावः कई रूपों मैं विद्यमान है । रंगभेद , लिंगभेद , क्षेत्रवाद , जातिवाद , सम्प्रदायवाद , गरीब अमीर का भेद , पढ़े लिखे और अनपढ़ का भेद , एलिट और नॉन एलिट का भेद इत्यादि , इत्यादि ।
इस प्रकार भेदभाव के चलते उपेक्षित और प्रताडित लोगों मैं असंतोष और आक्रोश का भावः पनपता है और फ़िर शुरू होता है व्यवस्था के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर उठने का सिलसिला । परिणाम स्वरुप कंही सामूहिक प्रदर्शन , तो कंही सामूहिक जुलुश । इस तरह की सुलगती हुई आग मैं निजी अथवा राजनीतिक स्वार्थी और अपने उल्लू सीधा करने वाले लोग घी डालने का काम करते है और लोगों को सामाजिक और शासकीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ हिंसक होने हेतु प्रेरित करते हैं । कंही आगजनी , कंही तोड़फोड़ तो कंही मारपीट और यंहा तक नरसंहार जैसी घटना विकराल रूप लेने लगती है । विश्व और देश मैं फैली आतंकवाद , नक्सलवाद और नस्लवाद जैसी घटनाओं के पीछे इसी प्रकार के भेदभाव पूर्ण नीतियों और व्यवहार के योगदान से इनकार नही किया जा सकता है ।
प्रायः यह देखा जाता है की भेदभाव पूर्ण वयवहार के प्रतिरोध मैं विरोध के स्वर उठने पर तात्कालिक व्यवस्था के अर्न्तगत फोरी तौर पर आवश्यक कदम उठाये जाते हैं किंतु इस घटना के पीछे मूल कारण को जानकर उसे दूर करने की कोशिश मैं दृढ इक्छा शक्ति की कमी नजर आती है । व्यवस्था मैं वाँछित सुधार करने और लोगों की मूलभूत आवश्यकता अनुरूप पहल होने के प्रयास कम ही नजर आते हैं ।
जरूरी है की आज के बदलते परिवेश और लोगों की आवश्यकता और व्यवहार के अनुरूप व्यवस्था मैं सुधार करने की जरूरत है । सबसे जरूरी है की सभी को समान रूप से स्थानीय स्तर पर भेदभाव रहित शिक्षा , स्वास्थय , रोजगार और खाद्य सुरक्षा के साथ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं मैं सहायक बिजली , पानी और आवास जैसी सुबिधा उपलब्ध कराई जाए । जिससे लोगों को अपने क्षेत्र से पलायन करने हेतु मजबूर होना ना पड़े । इस बात का भी भरोसा स्थानीय लोगों को दिलाना चाहिए की , उन्हें ऐसा प्रतीत न हो की बहार से आए लोग उनके रोजगार के अवसर को कम नही करेंगे , उनके हिस्से और हक़ के संसाधनों का उपभोग कर उनकी सुख सुबिधाओं मैं खलल पैदा नही करेंगे । इन सब बातों का ध्यान रखकर और सभी लोगों की शासन , प्रशासन और विश्व , देश और समाज की सभी गतिविधियों मैं बिना किसी भेदभाव के समान भागीदारी सुनिश्चित कर एक सद भाव पूर्ण एवं भेदभाव रहित समाज , देश और विश्व की मंगल कामना कर वसुधेव कुटुम्बकम की अवधारणा को मूर्तरूप दिया जा सकता है ।

4 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

Bilkul sahi kaha aapne...

राज भाटिय़ा ने कहा…

अगर इंसान इस बात को समझ जाये तो , फ़िर सारी दुनिया मै शांति ना हो जाये.

ओम आर्य ने कहा…

गर समाज मे रहने वाले हर व्यक्ति इस बात समझ जाये तो शांति कायम की जा सकती है.

BK Chowla ने कहा…

Theek kaha.lakin yehee sachai hai