बड़ा ही विशेष था शुभ मुहूर्त
कि जुड़ा था ये मन
उनसे अटूट ।
धरा में थी हल्की
भोर की धूप
और बयार थे शीतलता
से अभिभूत ।
करती निनाद मंदिर
की घंटियाँ
ईश्वर कृपा के मन
से हो वशीभूत
अर्चना और प्रार्थना
के उच्चारण से
बने थे होंठ ईश्वर के देवदूत ।
श्रद्धा और सुकून
की दौलत
समेटने को बिखरी थी
अकूत ।
बागों में छेड़ रही
थी तान
मधुर कोयल की कूक
और मची हुयी थी मधुमाखियाँ में
पराग कण को पीने की
लूट ।
भँवरे और तितलियाँ
के दल
मंडरा रहे थे फूलों
पर खूब ।
जब रात से मिलने सूरज
आसमां में रहा था
डूब
अपने अपने घरों की
और
पंछी भी कर रहे थे
कूच ।
पाकर चाँद तारों का
सानिध्य
आसमां भी पा लिये
थे नये रूप ।
बड़ा ही विशेष था शुभ
मुहूर्त
कि जुड़ा था ये मन उनसे अटूट ।
*** "दीप"क कुमार भानरे ***