शुक्रवार, 18 मई 2018

हे सूर्य# देवता# ..............!!!

हे सूर्य# देवता# ..............!!!

हे सूर्य देवता! आपका इतना तपन भरा रोद्र रूप जायज है।
क्योंकि हम इंसानों ने भी प्रकृति के साथ खूब किया छल है ,
काट दिये जंगल है,नदी नाले तालाब के सुखा दिये जल है,
बूंद बूंद पानी पर मची दंगल है ,चारों तरफ बस अमंगल है,
अपनी अपनी जिंदगी बचाने की हो रही रस्में रवायत  है ।।
हे सूर्य देवता!हम इंसान भीषण गर्मी की सजा के ही लायक है।
सीमेंट कांक्रीट के फैले जंगल है,कहाँ रुके बारिश का जल है ,
खूब हो रहा पानी का दोहन है,कुएं-बोर का नीचे गया जल है ,
इस धरा के सरंक्षण से मुंह मोड़ने की हो रही कवायद है ।।
हे सूर्य देवता! हमने ही प्रकृति विनाश की लिखी इबारत है।
क्योंकि न तो उपायों पर कोई अमल है,न ही सहेज रहे जल है,
न ही सुरक्षित रहे वन है,पशु पक्षी भी घरों से हो रहे बेदखल है,
प्रकृति बर्बादी में सब शामिल है,मुश्किल में आने वाला कल है,
सब अपनी जिंदगी में मस्त है अब तो ईश्वर की ही इनायत है ।।

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