मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

जब #पल पल बढ़ती है #रात #घनेरी सी !


जब पल पल बढ़ती है रात घनेरी सी ,
तब बिछती है बिसात अंधेरों की ।
लौट आते है सब अपने आशियाने को,
पथिक ढूंढ़ते है ठिकाने रात बिताने को,
लिये मन में आस नये सबेरे की ,
बस गुजर जाएगी रात ये घनेरी सी ।

पल पल बढ़ती रात घनेरी सी ,
तब होती है दुनिया आबाद बेजारों  की ।
सजते  है  मयखाने दिल  बहलाने को,
छलकते  है जाम गम भुलाने को ,
हसरतें भरती  है उड़ान तूफानी प्याली की,
सहला रही है दिलों के जज्बात रात घनेरी सी ।

जब पल पल बढ़ती रात घनेरी सी ,
तब होती  है आबाद दुनिया लुटेरों की ।
दुबक जाते है लोग घरों में महफूज हो जाने को ,
निकलते है जुल्म के  शैतान उत्पात मचाने को ,
लो बढ़ने लगी है हलचल पुरानी हवेली की ,
गहरा रही है कितने राज ये रात घनेरी सी  ।

जब पल पल बढ़ती रात घनेरी सी ,
सड़क किनारे लगती सेज मजदूरों की ।
बन जाती है सराय एक रात सो जाने को ,
थमते है कदम दिनभर की थकान मिटाने को ,
यूं ही कटती  है रात जैसे दुल्हन नवेली की,
मिलती है चांदनी से बिंदास रात घनेरी सी l

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