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मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

#वक्त का नया #घर !

#वक्त का नया #घर

राह तक रहा है इधर
ले #उम्मीदों का #असर

#पधारो हे #मित्रवर ।


#संभावनाओं से
भरी #आलमारियां
#अवसरों की
नई #क्यारियां
मिलने को है #तत्पर ।

दीवारों के नये रंग
भर #उत्सव और #उमंग
फर्श पर बिछी दरी
बन कदमों की प्रहरी
ताके तुम्हारी डगर ।

#सीख और सबक को
सब्र से सहलाना
#हताशा और #हार के
हस्तक्षेप को हराना
बांध बिछड़ों की यादों का भंवर ।

सहूलियतों की
सर पर छत
सीढ़ियां दे रही
अपना अभिमत
बढ़ मंजिल पग पग धर ।

#वक्त का नया #घर
राह तक रहा है इधर
कस #मजबूती से कमर
#पधारो हे #श्रीमित्रवर ।

#नवीन #वर्ष की अनेकानेक
बधाइयां और शुभकामनाएं ।
                **दीपक कुमार भानरे***

रविवार, 29 दिसंबर 2024

#बादल है #बारिश है !


#बादल है
#बारिश है
एक #चाय और
#पकोड़े की #गुजारिश है ।

कौन  कहेगा
किससे यार
कहीं हो न जाये
#तकरार
कौन किससे करे
#सिफारिश है ।

#सुकून से अपने
किसको नहीं है प्यार
पकाने को कौन
उठायेगा #हथियार
मन में ऐसी एक #दुविधा
#लावारिश है ।

चलो निकाले
बीच  का रास्ता
एक बनाये चाय
तो एक बनाये नाश्ता
कुछ ऐसी #सुलह से
हुई पूरी गुजारिश है ।

बादल है
बारिश है
एक चाय और
पकोड़े की गुजारिश है ।

यूट्यूब वीडियो हेतु क्लिक करें


शनिवार, 21 दिसंबर 2024

#फुर्सत मिली न मुझे !

#फुर्सत मिली न मुझे

अपने ही काम से

लो बीत  गया एक और #साल

फिर मेरे #मकान से ।

 

सोचा था इस साल

अरमानों की गलेगी दाल ,

जीवन के ग्रह  #नक्षत्रों की

हो जायेगी  अच्छी  चाल

पर चलती रही जिदंगी इस साल भी

पुराने ही #इंतजाम से ।

 

बहलाता रहा मन को

कुछ #सपनों की शाम से

लो बीत गया एक और साल

फिर मेरे मकान से ।

 

कुछ #तालमेल कुछ #जुगाड़

कभी उत्साह तो कभी थक हार

गर न बना काम तो

ज़िम्मेदारी भाग्य पर डाल

मन में न रख कुछ #मलाल

खेल ली ज़िंदगी

कुछ ऐसी ही सामान से ।

 

फुर्सत मिली न मुझे

अपने ही काम से

लो बीत  गया एक और साल

फिर मेरे मकान से । 
                   **दीपक कुमार भानरे**

सोमवार, 9 दिसंबर 2024

उफ्फ ये #ठंड की सौगात ।

#किटकिटाते दांत है
कपकपाते हाथ
भाप निकलती मुख से
जब करते है बात

उफ्फ ये #ठंड की सौगात ।
हथेलियों को रगड़
कभी गालों में स्पर्श
तो कभी कानों को पकड़
कोशिश है तोड़ने की
ठंड की अकड़
उफ्फ ये ठंड की जकड़ ।


मोटे गरम कपड़े
पहन बिछौना पर पसरे
गरम काफी और चाय
कई दफा हलक से उतरे
घर में जला अलाव
ठंड ज्यादा न अखरे
उफ्फ ये ठंड के नखरे ।

थोड़ी सर्दी थोड़ा जुकाम
थोड़ा गला नाक जाम
कभी विक्स कभी बाम
तो गुड का काढ़ा का जाम
पीकर जल्दी करते आराम
उफ्फ ये ठंड पर लगे लगाम ।


सुबह देर जल्दी शाम
देर से आता है घाम
ठिठुरते ठिठुरते लोग यहां
अब करते है अपना काम
और न जाने कब
दिन हो जाता तमाम
उफ्फ ये ठंड का तामझाम ।

बड़ा ही #विशेष था #शुभ #मुहूर्त (#muhurt) ।

बड़ा ही विशेष था शुभ मुहूर्त कि जुड़ा था ये मन उनसे अटूट ।   धरा में थी हल्की भोर की धूप और बयार थे शीतलता से अभिभूत ।   करती निना...