#मदहोशी की मस्ती है ,
वो बाहों की कश्ती है ,
सोचा न था यूं पूरी होगी ख्वाइश ,
चाहत के समंदर में लो डूबते हैं हम आज ।
कुछ इस तरह से खाया तरस ,
मखमली हाथों का मिला स्पर्श ,
तपती रेत में बारिश गई बरस ,
लो बन गया दिन बड़ा ही खास ।
कहीं न जाओ अब जनाब ,
यूं ही बैठो रहो पास ,
कितना सुकून है जनाब ,
तुमसे मिलकर यूं आज ।
***दीपक कुमार भानरे ***
