शुक्रवार, 16 मई 2008

क्या जनप्रतिनिधि नियम और कानून से परे है ?

दिनों दिन जनप्रतिनिधियों का आचार और और व्यवहार मैं गिरावट आ रही है . कभी पैसे लेकर संसद मैं प्रश्न पूछना , कभी आय से अधिक धन संपत्ति का पाया जाना , तो कभी भ्रष्टाचार के मामले उजागर होना और मारपीट व हत्या जैसे संगीन आरोप लगना . संसद सत्र के दौरान हंगामा करना और झूमा झाट्की से लेकर मारा पीटी और तोड़फोड़ कर संसद की कार्यवाही को बाधित करना . आये दिन जुलूस और धरना कर आम जीवन को अस्तव्यस्त करना और अशांति का माहोल पैदा करना । किंतु यह जगजाहिर है की अभी तक इनमे से कितने लोगों को सजा या दंड मिला है । संसद की गलियों से लेकर संसद के बाहर तक देश हित और जन हित को भुलाकर , स्व हित और राजनैतिक हितों के मद्देनजर और सिर्फ़ विरोध के लिए एक दूसरे का विरोध करना इनकी नियति बनती जा रही है , बजाय इसके की मिल बैठकर समस्या का हल निकालने का प्रयास करना । यंहा तो समरथ को नही दोष गोसाई की कहावत चरितार्थ होती है ।
इनके अचार और व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयास कई बार माननीय न्यायलय द्वारा किया गया तो जनप्रतिनिधियों द्वारा यह कहकर की यह तो न्याय पालिका का हमारे विधायिका के कार्य क्षेत्र का अतिक्रमण कहकर विरोध किया गया । हाल ही मैं लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही को बाधित करने वाले सांसदों को दण्डित करने का प्रयास किया गया किंतु राजनैतिक मजबूरी या कुछ और के चलते यह भी नही किया जा सका । अतः ऐसी स्थिति मैं इनके अचार और व्यवहार मैं दिनों दिन जो गिरावट आ रही है उसे नियंत्रित और रोकने वाला कौन है ? यह कहा जाता है की जनता ही उनको रोक व नियंत्रित कर सकती है , किंतु बेचारी जनता के मात्र वोट के अधिकार जिसमे चुनने का अधिकार तो है किंतु जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का नही । वह एक बार इन जनप्रतिनिधियों को चुनने के बाद आगामी पांच साल तक इनके नखरे और अनियंत्रित और अमर्यादित व्यवहार को सहने और झेलने को मजबूर होती है । यह बात किसी छुपी नही है की अधिकतर जनता किस प्रकार और कितना स्व विवेक का प्रयोग कर अपने वोट का प्रयोग करती है ।
जिन्हें जनता की भावना का प्रतिनिधित्व , समस्या के निराकरण और दुःख दर्द मैं सहारे हेतु चुना जाता है , वे अब जनता के समस्या और दुःख का कारण बन रहे है ।
अतः यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है की आख़िर इन जनप्रतिनिधियों के अचार और व्यवहार को नियंत्रित करे तो करे कौन ? क्या जनप्रतिनिधि नियम और कानून से परे है ?

1 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

उन्हों ने कानून को पंगु कर दिया है् अपने लिए।