रविवार, 20 दिसंबर 2009

असंतोष और उपेक्षा से उपजी हताशा का परिणाम है - प्रथक राज्य की मांग !

असंतोष और उपेक्षा से उपजी हताशा का परिणाम है - प्रथक राज्य की मांग !
तेलंगाना राज्य को प्रथक राज्य बनाने की घोषणा के बाद , अब देश के हर कोने से प्रथक राज्य गठन की मांग उठने लगी है । कुछ लोग प्रभावशाली और कारगर प्रशासनिक व्यवस्था क्रियान्वयन और नियंत्रण के मद्देनजर प्रथक छोट छोटे राज्यों की मांग को जायज ठहराते हैं । तो वन्ही कुछ राजनैतिक लोग सत्ता अवं महत्वपूर्ण पदों की लालसा अवं राजनीतिक नफे नुकसान की द्रष्टि से प्रथक राज्य की मांग करते हैं । जबकि मुझे लगता है की क्षेत्र विशेष का असंतुलित विकास , असमान वित्तीय संसाधनों का आवंटन अवं उपेक्षित भाव से उपजे असंतोष और हताशा का परिणाम है प्रथक राज्य की मांग ।
जो भी हो इस तरह से देश के हर प्रदेशों से छोट छोटे टुकड़े कर प्रथक राज्यों की मांग को हवा देना देश की अखंडता और एकता की सीरत और सेहत के लिए अच्छा नहीं है । प्रथक राज्य की मांग का उठाना अथवा उठाया जाना , जनहित और प्र देशहित से वास्ता तो कम किन्तु तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ ज्यादा नजर आता है । अभी तक जितने प्रथक राज्यों का गठन हुआ है उनमे कुछ को छोड़कर कितनो का विकास पूर्व की तुलना मैं ज्यादा बेहतर हो पाया है यह संभवतः किसी से छुपा नहीं होगा । फिर भी इस बहाने देश को छोटे छोटे टुकड़ों मैं क्षेत्रवाद , भाषावाद अवं वर्ग विशेष वाद के आधार पर तोडना कंही अधिक घातक होगा ।
यदि राजनीतिक और प्रशासनिक इक्क्छा शक्ति हो तो देश को छोटे छोटे राज्यों मैं बिना तोड़े और प्रथक राज्य के गठन के बिना ही प्रदेश और प्रदेश वासियों का समुचित और पर्याप्त विकास उनकी अपेक्षा और आवशकताओं के अनुरूप किया जा सकता है । वित्तीय संसाधनों का सामान रूप से आबंटन , केंद्रीय और राज्य स्तरीय सत्तात्मक नेत्रत्व मैं आबादी के हिसाब से सभी क्षेत्रों की सामान भागीदारी , क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन से प्राप्त राजस्व का अधिकतम भाग क्षेत्र के विकास हेतु ही लगाया जाना , क्षेत्र विशेष के हितों और आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं का निर्माण और उनका कारगर और प्रभावी क्रियान्वयन , बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के सभी प्रदेशों को सामान विकास के अवसर उपलब्ध कराना इत्यादि ऐसे अनेक कार्य लोगों के असंतोष और निराशा को दूर कर वर्तमान राज्य और राष्ट्र व्यवस्था मैं ही लोगों का विश्वास कायम रखने मैं महती भूमिका निभा सकते हैं और देश को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों और भाषा , क्षेत्र और वर्ग विशेष के आधार पर छोटे छोटे टुकड़ों मैं बटने से रोका जा सकता है ।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

ग्लोबल वार्मिंग - एक सकारात्मक पहल आवश्यक !

कोपेनहेगन मैं ग्लोबल वार्मिंग्स पर चल रहे सम्मलेन मैं सभी विकसित , विकासशील और अविकसित देश ओधोगिक विकास की गति धीमी होने , सुख सुविधाओं के संसाधनों मैं कमी और देश का विकास अवरुद्ध होने अथवा धीमी होने की कीमत पर कार्बन उत्सर्जन की मात्रा मैं कमी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के उपायों को अपनाने मैं जो की प्रत्यक्ष रूप से देश और देश के लोगों को नुक्सान पहुचा सकते हैं आनाकानी कर रहे हैं और किसी भी इस प्रकार के किसी भी मसोदे पर एकमत और सहमत होते नही दिखाई दे रहे हैं । सभी देश अपने अपने हितो के अनुरूप विरोधाभासी मसोदे और सुझाब पेश कर रहे हैं । कोई भी देश स्वयं जिम्मेदारी न लेकर एक दूसरे पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं । ऐसी स्थिति मैं कोपेनहेगन मैं सर्व सहमति युक्त प्रभावी और कारगर समझोता अथवा संधि होने की स्थिति दिखायी नही दे रही है । और डर है की इतने तामझाम के साथ शुरू हुई बैठक कंही बेनतीजा समाप्त न हो जाए ।
अतः कुछ ऐसे छोटे छोटे और प्रभावी प्रयासों को अपनाने हेतु सहमती बनाने की कोशिश की जाए जिससे सभी देश की हितो की अनदेखी भी न हो और ग्लोबल प्रभाव को भी कम किया जा सके ।
१। सबसे पहले तो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को रोकने के उपायों की क्रियान्वयन , नियंत्रण और निगरानी हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था की गठन एवं एक साझा फंड का निर्माण किया जाए , जिसमे सभी देश अपनी आर्थिक क्षमता अनुसार आर्थिक सहायता देवें ।
२। ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव को कम करने हेतु सभी देशो को उनकी भुक्षेत्रो और आर्थिक क्षमता के आधार पर अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाना अनिवार्य किया जाए । आर्थिक रूप से कमजोर और अविकसित देशों को वृक्षारोपण , वनों के सरक्षण , संवर्धन और प्रकृति मैं अनावश्यक दखल को रोकने हेतु अवश्य वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ।
३। उर्जा के वैकल्पिक संसाधनों जैसे सोलर उर्जा , पवन उर्जा एवं समुद्रीय तापीय उर्जा और प्रथ्वी की ताप उर्जा को प्रयोग करने हेतु सरल एवं सस्ती युक्तियाँ विकसित करने एवं अन्य पर्यावरण हितेषी वैकपिक उर्जा संसाधनों को अपनाने पर अधिक से अधिक बल दिया जाए ।
४। इन उर्जा संसाधनों की सुलभ और कम लागत वाली तकनीकों और ज्ञान को एक दूसरों के साथ बांटा जाए । और अधिक सर्वसुलभ और सस्ती एवं विश्वसनीय तकनीको के विकास और अनुसंधान हेतु साझा प्रयासों को बल दिया जाए ।
५। विश्व समुदायों को कार्बोन उत्सर्जन को बढ़ाने और प्रथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाली वस्तुओ और संसाधनों के कम प्रयोग अथवा न अपनाने को प्रोत्साहित करने और पर्यावरण अनुकूल अधिक से अधिक उपायों को अपनाने हेतु प्रेरित करने के उद्दश्य से जागरूकता बढ़ाने वाले और शिक्षित करने वाले प्रसार प्रचार के अधिक से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम चलाये जावे .
6. कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने वाले उत्पादों की उत्पादकता को कम करने एवं उसके स्थान पर पर्यावरण हितेषी उत्पाद बनाने वाली कंपनी को हर तरह की सहायता देकर प्रोत्साहित किया जावे । बड़ी उद्योगों को ऐसे उत्पादों की उत्पादकता को कम करने एवं पर्यावरण हितेषी उत्पाद को बनाने हेतु राजी और प्रोत्साहित किया जावे ।
७। कम कार्बन उत्सर्जन एवं पर्यावरण को नुक्सान न पहुचाने वाले वाहनों और संसाधनों के उपयोग पर अधिक से अधिक बल दिया जावे । पर्यावरण हितेषी वाहनों और संसाधनों के अनुसन्धान और खोज पर जोर दिया जाए ।
विरोधाभासी बातों को करने एवं एक दूसरों के हितो की अनदेखी करने वाली बातों को छोड़कर कुछ इस तरह की बातों को शामिल कर कम से कम एक सर्व सहमती युक्ता मसोदा तैयार किया जाकर ग्लोबल वार्मिंग को रोकने एवं प्रथ्वी और प्रथ्वी वासी बचाने हेतु एक नेक और सकारात्मक शुरुआत तो की ही जा सकती है ।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

ऐसी ख़बरें अब हैरान नही करती - विचलित और दुखित जरूर करती है !

हाल ही मैं मधु कोड़ा द्वारा काली कमाई से अरबों रुपयों एकत्रित करने का समाचार अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया मैं छाया रहा । किंतु ऐसा लगता है की अब देश के लोग अब ऐसी ख़बरें सुनकर और पढ़कर हैरान नही होते होंगे , क्योंकि नेताओं और मंत्रियों के भ्रष्टाचार और काली कमाई से अकूत धन संपत्ति जमा करने की ख़बरें जितनी तेजी से सनसनी खेज ख़बरें बनकर सामने आती है उतनी तेजी से देश के खबरिया परिद्रश्य से गायब भी हो जाती है । कार्यवाही के नाम पर वाही बेनतीजा जांच पड़ताल और लीपा पोती होती है । चारा घोटाला , ताज कोरिडोर मामला , हवाला काण्ड और बोफोर्स दलाली मामला न जाने कितने मामले अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से देश के सामने आए , किंतु इन सबका क्या हस्र हुआ वह वह देश वासी से छुपा नही है । और अब मधु कोड़ा के मामले का भी हस्र को भी संभवतः सभी देश वासी जानते ही होंगे । दिन बीतते जाने पर अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से ख़बरें ओझल होती जायेगी और लोगों के दिमाग से भी । बाद मैं किसी को भी यह जाने की फिक्र नही होती है की मामले पर क्या कार्यवाही हो रही है और किस स्थिति तक पहुची है ।
ऐसे मामलों मैं एक बात और सामने आती है की हमेश आरोपी पक्ष इन आरोपों से इंकार करता है और कई बार ऐसे सदमे मैं अस्पताल की और रुख कर जाता है जो की इस तरह के लगभग सभी मामले मैं होता है । किंतु उनकी कथनी और करनी मैं तब संसय के बादल उठने लगते है जब आरोपी राजनेता अथवा मंत्री गण मातृ आरोपों से इनकार कर अपना पल्ला झाड लेते हैं , और यदि वाकई ये राजनेता बेदाग़ और पाक साफ़ है तो उनके विरुद्ध ऐसे आरोप लगाने और छापने वालों पर कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नही करते है ।
दूसरी बात यह की आख़िर अख़बार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले बिना किसी आधार और तथ्यों के अति विशिष्ट और जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्ति पर आरोप तो ऐसे ही नही लगाते होंगे । उनके पास भी तो कोई विश्वशनीय सूत्र अथवा श्रोत तो रहते होंगे तो फिर क्यों नही सरकार और जांच एजेंसी इस तरह अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया द्वारा जुटाए गए प्रमाणों को अपनी जांच कार्यवाही मैं शामिल करती । और यदि ऐसी ख़बरें आधार हीन और झूठी होती है तो ऐसे अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया वालों पर कार्यवाही क्यों नही करती है और क्यों नही उनसे इसके लिए जवाव मांगती है । किंतु दोनों ही परिष्ठितियाँ मैं ऐसी निष्क्रियता और नकारात्मक भाव दाल मैं काले होने की आशंका को बलबती करती है । और इन सबके बीच देश वासी ऐसी ख़बरें को सुनकर और पढ़कर और ऐसे मामलों के हस्र को सोचकर विचलित और दुखित जरूर होता है किंतु ऐसी ख़बरें आने पर हैरान नही होता है ।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

कितना जिम्मेदार विपक्ष है हमारे पास !

कितना जिम्मेदार विपक्ष है हमारे पास !
हमेशा से सत्ता आरूढ़ पार्टी अथवा जन प्रतिनिधि को ही देश मैं चल रही विभिन्न गतिविधियों हेतु जिम्मेदार माना जाता है एवं उसे ही जनता के आक्रोश और आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता है । क्या सत्ता से बाहर बैठे विपक्षी जन प्रतिनिधि और पार्टियाँ की भी जिम्मेदारी तय करने भी जहमत उठायी जाती है । क्या हमारे देश की सरकार के गुणदोष बत्ताने और विफलताओं की और ध्यान दिलाने और जनहित के मुद्दों शसक्त और जिम्मेदार तरीके से उठाने वाला विपक्ष मोजूद है ।
इस बात की अनदेखी की जाती है की जितनी जिम्मेदारी और विश्वाश के साथ जनता राजनीतिक पार्टी और जन प्रतिनिधियों को बहुमत से चुनकर सरकार चलाने हेतु भेजती है उतनी जिम्मेदारी और सक्रिय भूमिका की अपेक्षा विपक्ष मैं बैठने वाली पार्टी अथवा जनप्रतिनिधियों से भी की जाती है ।
आमतौर पर विपक्ष हमेशा सत्तापक्ष की किसी भी गतिविधियाँ अथवा नीतियों की आलोचनाओ अवं विरोध कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझता है । फ़िर वह चाहे वह सही हो या ग़लत । संसद मैं हंगामा खड़ा कर संसद की कार्यवाहियों की को बाधित करते हैं और संसद के संचालन मैं होने वाले करोडो रूपये की व्यय को जाया होने देते हैं । देश के राजनीतिक गलियारे मैं मची हलचले और गतिविधियों से तो ऐसा ही जाहिर होता है की सत्ता हासिल किए बिना अथवा मलाईदार और रुतबेदार पदों के अभाव मैं जन सेवा और देश सेवा हो ही नही सकती है । और ऐसी लालसा मैं जनप्रतिनिधि और पार्टियाँ जोड़तोड़ की राजनीति कर जनादेश की उपेक्षा करती नजर आती है ।
वैसे भी सत्ता से दूर और विपक्ष मैं बैठी पार्टी अथवा जनप्रतिनिधि जनसेवा और देश सेवा के नाम पर कार्य करते तो शिफर ही नजर आते है सिवाये खोखले भाषण और आलोचनाओं के । अपने किसी बड़े नेता आगमन पर स्वागत सत्कार हेतु बेनरो , पोस्टरों और प्रचार प्रसारों की सामग्रियों मैं करोड़ों रूपये करते जरूर नजर आयेंगे बजाय यही पैसा जनहित मैं खर्च करने के । कितनी राजनीतिक पार्टी प्राकृतिक आपदाओं अथवा किसी दुर्घट नाओं मैं हताहतों लोगों की आर्थिक सहायता करते नजर आती हैं ।
जन्हा सरकार और सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक पार्टियों की प्राथ मिक्ताओं मैं भूख , भ्रष्टाचार और बेरोजगारी , बढती मंहगाई , जमाखोरी , कालाबाजारी अवं जनसुरक्षा और सुशासन जैसे मुद्दे ओझल नजर आते हैं वन्ही भी चुप्पी साधकर इन मुद्दों से जी चुराकर किनारा करते नजर आते हैं । और यह परिद्रश्य यह संसय पैदा करता है की कंही न कंही पक्ष अवं विपक्ष मैं मौन सहमती और स्वीकृति तो नही है ।
क्या हम एक जनहित और देशहित के प्रति रचनात्मक और सकारात्मक जिम्मेदार विपक्ष की उम्मीद कर सकते हैं । क्या इनके कार्यों के आकलन और निगरानी हेतु कोई युक्ति और व्यवस्था बनायी जा सकती है । क्योंकि इनके चुनाव और सुख सुबिधाओं पर भी तो जनता की खून पसीने की कमाई का पैसा खर्चा किया जाता है ।

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

विश्वसनीयता किसने खोई - इ वि ऍम मशीन ने , जनता ने या फिर राजनेताओं ने !

हाल ही मैं तीन राज्यों के चुनाव परिणाम आने पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खड़ा किया गया । जन्हा कोई इ वी एम् मशीन की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर रहा है तो कोई जनता की विश्वसनीयता पर तो , वन्ही जनता राजनेताओं की विश्वसनीयता पर पहले से ही प्रश्नचिंह खड़ा कर रही है । अब किस बात पर कितनी सच्चाई है यह गौर करने वाली बात है ।
जन्हा इ वी एम् मशीन की विश्वसनीयता पर बात करें तो पहले भी इस बात पर सवाल खड़े किया जा चुके हैं और इ वी एम् मशीन पूरी तरह छेड़ छाड रहित और त्रुटी रहित है ऐसा कोई प्रमाण अभी तक सार्वजानिक अवं प्रमाणिक रूप से नही दिया गया है जिससे यह साबित हो सके की इ वी एम् मशीन को पूर्णतः त्रुटिरहित और अविश्वसनीय न माना जा सके । जब इस तरह की कोई वस्तु जो देश के निष्पक्ष जनमत संग्रह का माध्यम हो और लोकतंत्र क्रियान्वयन मैं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हो की विश्वसनीयता पर उंगली उठने लगे तो जरूरी है की ऐसी बातों की अनसुनी करने की बजाय उठने वाली आशंकाओं एवं भ्रमों को विराम देने एवं अविश्वसनीयता को निराधार साबित करने हेतु प्रयास तो अवश्य ही किए जाने चाहिए ।
इस चुनाव मैं नई बात यह सामने आई की पक्ष मैं आशा अनुरूप और वांछित परिणाम न मिलने पर राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं द्वारा जनता को अविश्वसनीय कहा गया । जबकि जनता के निर्णय को सही और जायज मानते हुए उसे सिरोधार्य करने की परम्परा देश के लोकतंत्र मैं रही है । एवं भविष्य मैं अपनी गतिविधियाँ और क्रियाकलापों पर आत्म अवलोकन करने और भूल सुधार करने की बात होती रही है । किंतु अपनी असफलताओं का दोष जनता के सर मढ़ने का यह पहला बाकया है ।
इन दोनों बातों से इतर अब जनता की बात करें तो उनके लिए राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियाँ दिन प्रतिदिन अपने विश्वसनीयता खोती जा रही है । जिस विशवास एवं आशा से जन प्रतिनिधि चुने जाते हैं उस अनुरूप ये अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन मैं पूर्णतः खरे नही उतर रहे हैं । एक बार चुने जाने के बाद अपने क्षेत्र मैं दुबारा मुड़कर नही देखना नही चाहते हैं , अपनी आय श्रोतो से अधिक उतरोत्तर वृद्धि करते हैं । गरीबी , भ्रष्टाचार , एवं अशिक्षा , बेरोजगारी जैसे आम जनता से जुड़े मुद्दे पर बात करने की बजाय स्वयं एवं अपने पूर्वज नेताओं की मूर्तियों बनाने मैं , शहरों के नाम बदलवाने मैं , क्षेत्रियाँ वैमनष्य फैलाने मैं और छोटी छोटी बातों मैं धरना , जुलुश और हिंसक प्रदर्शन करने मैं आगे रहते हैं ।
यह उन सुलझा प्रश्न है की विश्वसनीयता किसने खोई - इ वि ऍम मशीन ने , जनता ने या फिर राजनेताओं ने । किंतु इन प्रश्नों का सर्वमान्य हल खोजना देश के लोकतंत्र के हित मैं अति आवश्यक है ।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

दिवाली पर मिलावट खोरी , कालाबाजारी और मंहगाई की धूम !

दिवाली पर मिलावट खोरी , कालाबाजारी और मंहगाई की धूम !
जी हाँ इस दिवाली पर आप कुछ खरीदने जा रहें है । आकर्षक पैकिंग मैं मिलावटी मिठाई और खाद्य सामग्रियां , विशेष छूट के साथ महेंगे कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक समान और कालाबाजारी के कारण महेंगे होते अनाज और डाले सभी की धूम मची हुई है । व्यापारी कपडों और भोग विलास की चीज़ों के दाम बढाकर और उसी पर छूट का लालच देकर उपभोक्ताओं को लूटने का प्रयास कर रहें है । मिलावट खोर मिठाई और खाद्य सामग्रियों मैं हानिकारक सामग्री और रसायन मिलकर आम जनता के स्वस्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं । कालाबाजारी और जमाखोरी कर कृत्रिम अभाव पैदा कर मंहगे दामों मैं अनाज और दैनिक उपयोग की सामग्रियों मनमाने दामों मैं बेच रहे हैं । न तो कीमत मैं नियंत्रण की कोई नीति और न ही मिलावट अवं कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने की कारगर पहल । और न ही खतरनाक मिलावट के काले कारनामे को रोकने हेतु पर्याप्त प्रशसनिक अमला और न ही पर्याप इंतज़ाम हैं ।
ऐसे मैं आम जनता कान्हा जाएँ और क्या करें ? जब भी बड़े त्यौहार और उत्सव का माहोल देश मैं होता है यह सब बड़े पैमाने पर धड़ल्ले से चलता है । और यह सब हर बार की तरह मातृ सनसनी खेज़ ख़बर बनकर रह जाती है । न तो सरका चेतती है और न ही जनता । इस दिवाली मैं भी ऐसे ही हो रहा है ।
अतः इस हेतु एक स्पश्ष्ट और कारगर नीति बनाकर उसके प्रभावी क्रियान्वयन करने की , इस हेतु कुछ सुझाव इस प्रकार हैं -
१। अभी तक ऐसी कोई नीति बनायी गई है की जिससे बाजार मैं सामग्रियों की कीमतें निर्धारित और नियंत्रित किया जा सके । उत्पादक कंपनी और व्यापारी अपनी सहूलियत से कीमतें तय करते रहते हैं । अतः जरूरी है की सरकार को उपभोक्ता सामग्रियां की गुणवत्ता और परिमाण के आधार पर एक मानक तय किया जाकर अधिकतम दाम तय किए जाना चाहिए ।
२। चुकी देश और बाज़ार की आकार के हिसाब से उपभोक्ता सामग्री और खाद्य सामग्रियों की गुणवत्ता जाँच हेतु पर्याप्त मात्रा मैं मैदानी अमला की कमी है । अतः इस हेतु एक शसक्त और प्रभावी विभाग के गठन की आवश्यकता है जो प्रत्येक पंचायत स्तर तक कार्य करे ।
३। हो सके तो खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग को पुलिस विभाग अथवा सीधे जिला कलेक्टर के अधीन रखा जाना चाहिए । जिससे शीग्रहता पूर्वक सख्ती से कार्यवाही कर कानूनी कार्याही की जा सके ।
४। सभी जिला स्तर एवं ब्लाक स्तर पर खाद्य सामग्रियों की मिलावट की जांच हेतु परिक्षण लैब की स्थापना की जानी चाहिए । जिससे शीग्रह और समय पर जांच परिणाम मिल सके और दोषियों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाही की जा सके ।
५। मिलावटी सामग्रियों की जांच और परिक्षण को आम उपभोक्ता आसानी से कर सके , इस हेतु फर्स्ट एड बॉक्स की अवधारणा अपनाकर फर्स्ट टेस्ट कित का विकास किया जाना चाहिए । जो सभी उपभोक्ता को आसानी से उपलब्ध हो सके , और मिलावट की जांच की जा सके । साथ इस बाबत प्रचार प्रसार कर आम उपभोक्ता को जागरूक करने की आवश्यकता है ।
६। कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने हेतु सभी व्यापारी को लाईसेन्स लिया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए । यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए की व्यापारी अपनी दूकान के सामने सूचना पटल पर प्रतिदिन भण्डारण किए जाने वाले अनाज और सामग्रियों की जानकारी प्रर्दशित करें । उनके द्वारा प्रर्दशित सूचना सही है या ग़लत इसकी आकस्मिक जांच आम उपभोक्ता को शामिल कर की जानी चाहिए ।
७। मिलावट खोरी और कालाबाजारी एवं जमाखोरी पर दोषी पाये जाने पर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए एवं ऐसे मामलों के निराकरण हेतु स्पेशल कोर्ट की स्थापना की जाकर दोषियों को कड़ी सजा दिलवाई जानी चाहिए ।
ऐसी मंगल कामना है की दिवाली के पावन पर्व सभी के लिए मंगल may और सुखमय हो । प्रज्जवलित होने वाले दीपो के पवित्र और अलोकिक प्रकाश की रौशनी से जीवन खुशियों मैं अन्धकार फैलाने वाली मिलावात्खोरी , कालाबाजारी , जमाखोरी और मंहगाई जैसी विकृतियों का नाश होगा और देश मैं शान्ति और सुख माय वातावरण का निर्माण होगा । ऐसी मंगल कामना के साथ सभी को दीपावली पर्व की कोटि कोटि बधाईयाँ और सुभ कामनाएं ।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

विनम्र अपील धार्मिक उत्सव आयोजन कर्ताओं के नाम !

देश मैं ईद और नवरात्र के पर्व के अवसरों पर भक्तिमय उल्लाश और खुशियों का सुखद वातावरण बना हुआ है । जगह जगह गाँव और शहर मैं पंडाल , स्वागत द्वार अवं तोरण द्वार सजे हुए हैं । कंही ईद के दावतों का आयोजन हो रहा है तो कंही मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है । इन उल्लासपूर्ण और खुशनुमा माहोल मैं छोटी छोटी बातों को ध्यान रखा जावे , जिससे लोगों को एवं समाज को कोई असुबिधा न हो , पर्यावरण को नुकसान न हो , उर्जा का सरक्षण हो एवं देश मैं सुखमय , सुखमय एवं शांतिपूर्ण वातावरण बना रहे । अतः आयोजनकर्ताओं से विनम्र अपील है की
१। भीड़ भाड़ वाले एवं व्यस्तम चोराहे वाले स्थान मैं सार्वजानिक आयोजन से बचे , हो सके तो खुले एवं मैदानी स्थानों का चयन किया जाए , आना जाने का मार्ग अवरुद्ध न हो । सकरे एवं तंग गलियों वाले स्थानों मैं एक से अधिक वैकल्पिक रस्ते बनाए जाएँ ।
२। आयोजन हेतु एकत्रित की जाने वाली सहयोग राशिः / चंदे की राशिः हेतु लोगों को मजबूर न करे । एकत्रित धनराशी का किफायती एवं समाज की भलाई मैं उपयोग कर उसके आय एवं व्यय का ब्यौरा पूर्ण पारदर्शिता के साथ लोगों के सामने रखें ।
३। लोउड स्पीकर के स्थान पर बॉक्स का प्रयोग करें । आवाज की तीव्रता एवं समय का ध्यान रखे की बच्चों , बुजुर्ग और बीमारों को अ सुबिधा न हो ।
४। बिजली की कमी को देखते हुए विद्युत उर्जा आधारित साज सज्जा मैं किफायत के साथ कम बिजली खपत वाले उपकरण एवं लाइटिंग का प्रयोग करें । दिन मैं बिजली का प्रयोग न के बराबर करें , नियमानुसार अस्थायी बिजली कनेक्शन अवश्य लें ।
५। पर्यावरण को नुक्सान न पहुचाने वाली इको फ्रेंडली साज सज्जा एवं मूर्तियों को चुने । मूर्तियों का विसर्जन इस प्रकार करें की पेयजल श्रोतों और जल श्रोतों का जल प्रदूषित न हो ।
६। झांकियां की अवधारणा ऐसी हो की जिससे धार्मिक भावना एवं आस्था को ठेश न पहुचे एवं देवी देवताओं का सम्मान बना रहे ।
७। धार्मिक आयोजन स्थलों पर धार्मिक एवं सादगी पूर्ण गाने बजाये जाएँ । आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम फूहड़ एवं अमर्यादित न हो ।
८। प्रसाद वितरण , भोज एवं दावतों के आयोजन मैं खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं साफ़ सफाई का पर्याप्त ध्यान रखा जावे । वितरण के पर्याप्त इंतज़ाम किए जावें जिससे भीड़ भाड़ , अव्यवस्था और भगदड़ जैसी अप्रिय स्थिति न बने ।
९। कोई अप्रिय स्थिति होने पर तुंरत पुलिस एवं प्रशासन को सूचित करें । आवश्यक तात्कालिक व्यवस्था बनाने का पूरा प्रयास एवं सहयोग करें ।

बुधवार, 23 सितंबर 2009

स्वास्थय सेवाओ मैं सुधार हेतु सुझाव !

देश मैं स्वास्थय सुबिधायें दिन प्रतिदिन महँगी और आम लोगों की पहुच से दूर होते जा रही है । न तो योग्य और प्रक्षिशित चिकित्षों की पर्याप्त उपलब्धता है , और न ही पर्याप्त मात्रा मैं दवाएं की उपलब्धता है । चिकित्षकों की कमी और उनका ग्रामीण क्षेत्रों मैं सेवाओ देने मैं आना कानी करना । महँगी और आम लोगों की पहुच से दूर होती चिकित्षा शिक्षा के परिणाम स्वरुप स्वस्थ्य सेवाओ मैं सेवा भावः का लोप होकर व्यवसायीकरण की और उन्मुख होना , चिकित्षा शिक्षा संस्थाओं का सीमित और बड़े शहरों तक सीमित होने से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की पहुच से दूर होना , बाजारवाद के प्रभाव के चलते अन्य चिकित्षा पद्धति की उपेक्षा कर एक ही चिकित्षा पद्धति एलोपेथी को बढ़ावा दिया जाना इत्यादि इत्यादि कारण ने देश की स्वास्थय सेवाओ का स्वास्थय बिगाड़ रखा है । अतः देश की स्वास्थय सुबिधाओं का स्वास्थय सुधारने और आम लोगो तक इसकी आसान और सुलभ पहुच बनाने हेतु देश की स्वास्थ्य नीति मैं परिवर्तन आवश्यक है इस हेतु कुछ सुझाव निम्नानुसार है :

१.पर्याप्त मात्रा मैं चिकित्सकों की उपलब्धता : - सुनिश्चित करने हेतु सबसे पहले तो चिकित्षा शिक्षा के केन्द्र प्रत्येक जिला स्तर पर खोले जावें , कम आय वाले युवाओं को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जावे , चिकित्षा शिक्षा के पाठ्यक्रमो मैं बदलाव कर सस्ते और शोर्ट टर्म कोर्स शुरू किए जावे , दो वर्षीय डिग्री कोर्स एवं एक वर्षीया डिप्लोमा कोर्स शुरू किया जावे जिससे ग्रामीण और छोटे शहरों के कम आय वाले भी शिक्षा ग्रहण कर स्वास्थय सेवाओ के क्षेत्र मैं पदार्पण कर सके ।
२.समानान्तर रूप से सभी चिकित्षा पद्धति को बढ़ावा : - एलोपेथी के साथ आयुर्वेदी ,होमो पेथी एवं अन्य चिकित्षा पद्धति को समान रूप से बढ़ावा जावे जिससे परंपरागत और सस्ती चिकित्षा को बढावा मिलेगा और महँगी एलोपेथी दवायों पर निर्भरता कम होगी ।
३.आई ऐ एस , आई पी एस जैसी समकक्ष चिकित्षा सेवा संस्था आई एम् एस ( इंडियन मेडिकल सर्विसेस ) और एस एम् एस ( स्टेट मेडिकल सर्विसेस ) की अवधारणा को अपनाना और उसके माध्यम से चिकित्षा क्षेत्र की प्रसाशनिक व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करना । इससे चिकित्षा विशेषज्ञों की अधिकतम उर्जा और ज्ञान का उपयोग प्रसाशनिक व्यवस्था मैं सर खपाने की जगह अधिकतम समय इलाज़ और उपचार मैं कर सकेंगे ।
४. स्वास्थय सेवाओ मैं स्थानीय लोगों स्थान देना : - प्रायः यह देखने मैं आता है की चिकित्षक पहुच विहीन ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों मैं स्वास्थय सेवाओ देने मैं कतराते हैं । स्वास्थय कर्मी भी परिवार से दूर रहकर एवं नए क्षेत्रों मैं पूरी तन्मयता से सेवायें देने मैं कठिनाई महसूस करता है और अपने सेवा क्षेत्र मैं सतत रूप से सेवा देने मैं असमर्थ रहता है । अतः स्वास्थय सेवाओ मैं स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । जन्हा तक हो सके स्वास्थय कर्मी का सेवा क्षेत्र उसके गृह ग्राम अथवा गृह जिले के पास ही होना चाहिए ।
५. स्कूली पाठ्यक्रमों मैं योग और चिकित्षा पाठ्यक्रम : - स्कूली पाठ्यक्रमो मैं योग विषय अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए , चिकित्षा शिक्षा को भी प्रत्येक स्तर की शिक्षा मैं शामिल किया जावे , संतुलित भोजन और प्रत्येक मौसम के हिसाब से खान पान मैं बदलाव के साथ किस समय और कौन सा खाद्य किस खाद्य पदार्थ के साथ खाना और न खाना इत्यादि की शिक्षा , सर्दी खांसी और बुखार जैसी छोटी बीमारयों के घरेलु और प्राथमिक उपचार की शिक्षा भी दी जावे । इससे बच्चों मैं स्वास्थय जीवन जीने के प्रति सोच और समझ विकसित होगी साथ ही स्वास्थय सेवा के क्षेत्र मैं सेवा देने हेतु भी प्रेरित होंगे ।
६. दवाओं के मूल्य मैं नियंत्रण और उपलब्धता :- यह सुनने मैं आता है की दवा निर्माता कंपनी १०० से १००० प्रतिशत तक मुनाफा कमाती है निर्माता कंपनी के ऊपर कोई मूल्य नियंत्रण का दवाव नही होता फलस्वरूप जनता को दवाएं कई गुना महँगी मिलती है । अतः निर्धारित मापदंडो के तहत दवाओं के मूल्य मैं नियंत्रण आवश्यक है । साथ ही जीवन रक्षक दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए । जिस प्रकार से आज बड़ी बड़ी ब्रांडेड कंपनी अपने उत्पादों को छोटे से छोटे आम उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता मैं आ जाने वाले पैक मैं प्रस्तुत कर रही है ठीक उसी तरह से आवश्यक दवाओं की भी छोटे साइज़ मैं पैकिंग उपलब्ध कराई जानी चाहिए , जिससे क्रय क्षमता मैं होने से दवाओं को खरीदा जा सकेगा साथ ही बड़ा पैक पूर्णतः उपयोग न होने की सूरत मैं बेकार भी नही जाएगा । आवश्यकता अनुसार ही पैसे आम जनता के खर्चा होंगे ।
7 भौतिक अधो सरच्नाओं और उन्नत भौतिक उपकरण के साथ प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता : - स्वास्थय सेवाओ को पूर्ण दक्षता के साथ उपलब्ध कराया जा सके इसके लिए जरूरी है की आवश्यक भौतिक सरच्नाओ जैसे भवन , फर्नीचर एवं उन्नत उपकरणों के साथ साथ प्रसिक्षित स्वास्थय कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए ।
८. निगरानी / समीक्षा समित्ति - प्रत्येक स्वास्थय संस्थाओं के स्तर पर निगरानी / समीक्षा समित्ति बनायी जानी चाहिए . जो प्रत्येक माह स्वास्थय संस्थाओं / कर्मचारियों द्वारा किये जाने कार्यों की निगरानी / समीक्षा करेगी . समिति मैं निर्वाचित जनप्रतिनिधि , समाजसेवी के साथ अनु जाती , अनु जनजाति एवं बी पि एल परिवार के ऐसे सदस्यों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जावे , जो इन संस्थाओं से चिकित्शिया लाभ ले रहा है या लिया हो . समित्ति के एक तिहाई सदस्यों को प्रति तीन माह मैं बदला जाना चाहिए .
९.कर्मचारी क्लब अवं सहकारी समिति का गठन - प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर एक कर्मचारी क्लब का गठन किया जाना चाहिए । जन्हा सुखद परिवेश एवं अपने जैसे पढ़े लिखे लोगों का सानिध्य मिल सके , जन्हा सभी कर्मचारी मिलकर सांस्कृतिक अवं सामाजिक उत्सव की गतिविधियों मैं शामिल हो सके और मनोरंजन के साथ अपने विचारों और सुख दुःख को बाँट सके । साथ ही एक सहकारी समिति का भी गठन किया जाना चाहिए जिसके अर्न्तगत दैनिक उपयोग की आने वाली सभी जरूरी साजो सामान की उपलब्धता से पारी पूर्ण दुकाने हो। जिससे कर्मचारियों को जरूरत के सामान हेतु बार बार शहर की और ना भागना पड़े । इसी प्रकार अच्छे स्कूल , अस्पताल और शासकीय सुबिधाओं की भी उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए . आवागमन हेतु पक्की सड़क , स्वच्छ पानी की उपलब्धता और पर्याप्त बिजली की उलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए . इस प्रकार यदि सभी आवश्यक मूलभूत सुबिधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जायेगी तो कोई भी शासकीय कर्मचारी गाँव मैं सेवा देने से नहीं कतरायेगा और देश की कोने कोने तक सरकार की जनकल्याण कारी योजनाओं का लाभ पहुच पायेगा .

१०. सरकारी नुमाइंदे / निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को शासकीय स्वास्थय संस्थाओं से चिकित्शिया सेवा लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए । निजी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से सेवा लेना पूर्णतः प्रतिबंधित हो . कुछ विशेष परिस्थितियों मैं ही इसकी अनुमति हो . इससे वरिष्ठ शासकीय नुमाइंदे और जनप्रतिनिधियों का आना जाना बना रहेगा , जिससे इन संस्थाओं की स्वमेव निगरानी बनी रहेगी और चिकित्शिया सेवा और संस्थाओं की गुणवत्ता बनी रहेगी .

११. निजी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से , मोजूद शासकीय स्वास्थय संस्थाओं के माध्यम से ही चिकित्शिया सेवा प्रदाय किये जाने हेतु सहयोग लिया जाना चाहिए । इनसे कुछ शर्तों और नियमो के तहत ही यह सहयोग लिया जाना चाहिए .

१२.स्वास्थय कर्मचारियों / अधिकारियों का प्रशिक्षण क्षेत्र विशेष मैं - प्रायः यह देखने मैं आता है की प्रशिक्षण कार्यक्रम बंद कमरे मैं आयोजित किए जाते हैं जन्हा सिर्फ़ थेओरी ज्ञान दिया जाता है । इसके बजाय प्रशिक्षण कार्यक्रम किसी बिमारी से प्रभावित क्षेत्र अथवा पहुच / सुबिधा विहीन क्षेत्र मैं अस्थायी शिविर लगाकर आयोजित किए जाना चाहिए । इस तरह मैदानी प्रशिक्षण कार्यक्रम से प्रशिक्षु को पीडितों से सीधे संपर्क कर प्रायोगिक रूप मैं सीखने वन्ही प्रभावित क्षेत्र के लोगों को चिकित्षा सुबिधा का लाभ भी मिल पायेगा ।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

जनता - जानवर या जनार्दन ?

जनता - जानवर या जनार्दन ?
जनता जानवर है या जनार्दन या भगवान । यह तो हमारे देश के नेता तय करते हैं । वक़्त वक़्त के हिसाब से नजरिया बदलता है । चुनाव के समय जब वोट की आवश्यकता होती है तब तो जनता जनार्दन अथवा भगवान् होती है बाकी समय तो जानवर होती है और यही सोच को हमारे विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने जग जाहिर कर ही दी है की देश की इकोनोमी क्लास जिसमे जनता सफर करती है को केटल क्लास ( अर्थात जानवर के स्तर की श्रेणी ) कहकर । और यह सही भी तो है जो दिल मैं जनता के प्रति भाव है वह तो वाही तो मंत्री जी के श्रीमुख से बाहर निकला है की जनता जानवर के समान है । जिस पर क़र्ज़ का जितना बोझ डालों और ख़ुद उस क़र्ज़ के पैसे से खर्चीली जीवन शैली अपनाओं , अपने मन मुताबिक कानून को अपनी मुट्ठी मैं रख जनता को जैसा चाहे हांको , अव्यवस्था , मंहगाई और असुरक्षा के ख़राब माहोल मैं जनता को जानवर जिंदगी जीने हेतु छोड़ दो और ख़ुद पाँच सितारा और आराम जिन्दगी जियो । बस दो वक़्त की रोजी रोटी जुटाने हेतु उसकी जिन्दगी को खपा दो ताकि उसके पास न तो उनकी करतूत देखना का वक़्त हो और न ही देश के बारे मैं कुछ सोचने और पूछने का समय मिले ।
तो जनता के प्रति इस तरह की सोच रखने वाले नेताओं और जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों से जन हित और जन कल्याण की अपेक्षा की जा सकती है । क्या इस तरह से पाँच सितारा होटलों मैं रहने वाले और वातानुकूलित खर्चीली यात्रा करने वाले , ऐशो आराम वाली जिन्दगी जीने वाले मंत्रियों से आम जनता के हितों के अनुरूप नीतियों के निर्धारण और क्रियान्वयन की उम्मीद की जा सकती है । जो आम लोगों के बीच न रहकर और जाकर उनके जीवन और जीवन शैली मैं झाँकने का प्रयास न करे और उन्हें और उनकी जिन्दगी की तुलना जानवर से करके देखे , क्या ऐसा व्यक्ति आम लोगों की समस्या और आवश्यकता से अच्छी तरह से रूबरू और वाकिफ हो सकता है । क्या ऐसे नेता आम जनता के सच्चे प्रतिनिधि हो सकते हैं ।
जरूरत है ऐसे जनप्रतिनिधि को पहचानकर इन्हे संसद , विधानसभा अथवा सरकार मैं जाने से रोका जाए और ऐसे जनप्रतिनिधि को चुना जाए जो जनता को जानवर नही अपितु जनार्दन समझे , जो जनता के हमदर्द हो और जनता के दुःख दर्द और मुसीबत मैं काम आए , लोगों की भावना और आवश्यकता के अनुरूप काम करें ।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

भ्रष्ट्राचार को देश की कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनने से रोकना होगा !

क्या भ्रष्टाचार देश के लोगों की कार्यसंस्कृति बन गया है और कंही न कंही भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप मैं स्वीकार करने की मौन स्वीकृति दी जा चुकी है । क्योंकि अवसरवादिता के इस युग मैं जरूरत पड़ने पर अधिकाँश लोग अपना काम निकलवाने हेतु किसी न किसी रूप मैं चाहे उपहार के रूप मैं हो अथवा नकद राशिः के रूप मैं , घूंस देने मैं परहेज नहीं करता है । नतीजतन देश के हर बड़े और छोटे कार्य बिना किसी लेनदेन के नहीं हो रहे हैं । भ्रष्टाचार की यह नदी चाहे ऊपर से नीचे की बात करें या फिर नीचे से ऊपर की बात करें , दोनों दिशाओं मैं बह रही है । या यह कहें की यह दो दिषीय और दो धारिया होकर विकराल और बड़ा रूप धारण कर चुकी है । और इससे अब न्यापालिका संस्था भी अछूती नहीं रह गयी है जिसे की माननीय मुख्या न्यायधीश भी स्वीकारने मैं गुरेज़ नहीं कर रहे हैं । हमारे प्रधानमन्त्री भी इस पर अपनी चिंता जता चुके हैं ।
कंही न कंही हमारे समाज और पूर्वज ने भी इस भ्रष्टाचार के पौधे को सीचने का काम किया है । जन्हा हम घर के बच्चों को अपने अनुरूप कार्य करवाने हेतु उसके मनपसंद चीज़ का प्रलोभन देते हैं वन्ही अपने पक्ष मैं कार्य करवाने हेतु बड़े लोगों द्वारा भी उपहार का आदान प्रदान भी किया जाता है । यंहा तक की भगवान् को मनाने हेतु एवं कार्य सफल हो जाने पर बड़ी से बड़ी एवं कीमती चीजों का चढाव देने से भी नहीं चूकते हैं । संभवतः यही आदान प्रदान का रूप आज विकृत एवं विकराल भ्रष्टाचार का रूप ले चूका है जो इस समाज और देश को खोखला कर रहा है ।
तो क्या भ्रष्टाचार एक कभी न सुलझने वाली एवं चिरस्थायी समस्या बन चुकी है । क्या इस पर अंकुश लगाना और इसे जड़ से खत्म करना नामुमकिन हो गया है । मुझे लगता है बिलकुल नहीं । जरूरत है तो राजनीतिक एवं प्राशासनिक स्तर पर दृढ इक्च्छा शक्ति से इस पर अंकुश लगाने एवं ठोस कदम उठाने की । लोगों को अपने अधिकार के प्रति जागरूक होने और जागरूक करने की । शिक्षा के व्यापक प्रसार प्रचार करने की । प्रशासनिक कार्यप्रणाली को पूर्णतः चुस्त दुरुस्त , जवावदेह एवं पारदर्शी बनाते हुए कुछ इस तरह के सकत कदम उठाने की ।
१। देश के लोगों का पैसा विदेशी बैंकों मैं जमा करने पर रोक लगाना ।
२। १०० से बड़े नोटों का चलन बंद करना ( स्वामी राम देव बाबा के अनुसार ) ।
३। लघु अवधि मैं त्वरित एवं निष्पक्ष रूप से कार्यवाही पूर्ण कर भ्रस्ताचारियों एवं दोषियों को कड़ी सजा दिलवाना ।
४। प्रतिवर्ष शासन द्वारा क्षेत्र के विकास और जनकल्याण हेतु जारी की जाने वाली राशिः का जिलेवार , विभागवार और कार्यवार जानकारी एवं उसके अनुसार कार्यों की समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक प्रस्तुत करना ।
५। प्रतिवर्ष सरकारी कर्मचारियों / अधिकारियों से लेकर विधायक , सांसद एवं मंत्रियों को अपनी संपत्ति का व्योरा सार्वजानिक करना एवं उनके द्वारा अपने कर्तव्यों के पालन मैं किये कार्यों का व्योरा प्रस्तुत करना ।
६। सूचना के अधिकार का दायरा और व्यापक कर सभी को इस दायरे मैं लाना । यंहा तक की निजी एवं गैर सरकारी संस्थाओं को भी इसके दायरे मैं लाना ।
७। विभिन्न महत्वूर्ण देश हित और जनहित से जुड़े न्यायालीन प्रकरण एवं विभिन्न महत्वपूर्ण जनहित और देश हित से जुड़े जांच एवं तफ्तीश प्रकरण की प्रगति रिपोर्ट प्रत्येक तीन माह मैं सार्वजनिक करना.
८। राज्य एवं देश की सरकारों द्वारा किये गया कार्यों का व्योरा , मंत्री , सांसदों और विधायकों एवं अधिकारियों के कार्यों का व्योरा प्रति तीन माह मैं सार्वजानिक करना एवं इनका जनता के सामने जनता की निगरानी मैं रखना ।
इस तरह के जवादेह और पारदर्शी पूर्ण ठोस कदम देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने मैं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

लोकतंत्र - जनता के ऊपर शासन और जनता के पैसों पर सुखासन करने का नाम है !

लोकतंत्र जनता का , जनता के लिए और जनता द्वारा शाशित शाशन कहलाता है । क्या आज के बदलते दौर के साथ इसके मायने नही बदल गया हैं , और इसे नए सिरे से परिभाषित किए जाने की जरूरत नही है । तो क्या आज की जननायक के चाल चलन और चरित्र को देखकर नही लगता है । वो पाँच सितारा होटलों का रहन सहन , वो भरी भरकम सुरक्षा का ताम झाम , वो बड़े बड़े बुतों और स्मारकों का जंगल क्या ये सब काफी नही आज के लोकतंत्र की परिभाषा बदलने के लिए ।
जन्हा जनता का शासन कहकर लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है उसी के नाम पर मंत्री जी आलिशान पाँच सितारा होटल मैं लाख रुपयों प्रतिदिन किराए के खर्च पर ना जाने कौन सी विदेश नीति बना रहे हैं और पड़ोसी देश देश की सीमाओं को लांघकर कुत्षित कारनामे को अंजाम दे रहें है । चुनाव के समय जो जनता भगवान् होती है उसी से डर कर करोड़ों रुपयों वाली भरी भरकम ताम झाम वाली सुरक्षा का लबादा ओढ़कर विशिष्ट होने का स्वांग रच रहे हैं और दूसरी और जनता आतंकवाद , नक्सल वाद , तोड़फोड़ और आगजनी के भय और असुरक्षा के साए मैं जीने को मजबूर है । एक और तो करोड़ों रुपयों खर्च करके बड़ी बड़ी मूर्तियों और बुत बनाए जा रहे हैं वन्ही जनता रोटी , बिजली , स्वास्थय , शिक्षा और सुरक्षा के आभाव मैं बुत बनी जा रही है । मंच पर से नेता जी और मंत्रीजी द्वारा बड़े बड़े वादे , आश्वाशन और घोषणाएं हो रही है वन्ही दूसरी और नकली नोटों से चरमराती अर्थव्यवस्था , भ्रष्टाचार और अव्यवस्था इनकी पोल खोल खोलकर सरकार और प्रशासन को मुंह चिढा रही है । एक और जन्हा मंत्री और नेताओ द्वारा पाँच सितारा होटलों मैं दावतें और पार्टियाँ उडाई जा रही है वन्ही देश के लोगों की कमर तोड़ मंहगाई , कालाबाजारी और जमा खोरी जनता के चेहरे की रंगत और हवाइयां उड़ा रही है । जनता किम कर्तव्य विमूढ़ होकर अपने खून पसीने कमाई से भरे गए सरकारी खजाने को इस तरह से लुटते देख रही है और लोकतंत्र के नाम पर मातृ वोट का झुनझुना पाकर शासन करने और शाशित होने की भ्रम मैं जी रही है ।
तो क्या लोकतंत्र को कुछ इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है की लोकतंत्र जननेता और जनसेवकों का जनता के ऊपर शासन करने और जनता के पैसों पर सुखासन करने का नाम है ।

रविवार, 30 अगस्त 2009

क्या महिलाओं की नेत्रत्व क्षमता - स्थानीय निकायों के चुनाव तक सीमित है !

जिस देश मैं राष्ट्रपति के पद पर एक महिला आसीन है , सत्ता मैं काबिज़ गठबंधन की सर्बोच्चा एवं सर्वमान्य नेता एक महिला है , जन्हा आज महिला सभी क्षेत्रों मैं पुरुषों के साथ बराबरी से कंधे से कंधे मिलकर कार्य कर रही है क्या उस देश की महिलाओं की नेत्रत्व क्षमता मैं अभी भी शक और सुबह की गुंजाइश बचती है । चाहे केन्द्र सरकार की बात करें या फिर राज्य सरकार की पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव मैं ५० फीसदी आरक्षण का लाली पाप देकर महिला समानता और हितों के हिमायती होने दंभ भरते हैं । क्यों नही अभी तक संसद मैं महिला आरक्षण का बिल पास हो पाया है , ३३ फीसदी ही क्यों ५० फीसदी यानि बराबरी के हक़ की बात क्यों नही की जाती है ।
जन्हा आधी आबादी महिलाओं की हो किंतु सत्ता मैं भागीदारी उनकी आबादी के अनुपात मैं न हो तो कैसे कहेंगे देश की सरकार पूर्णतः लोकतान्त्रिक है जो देश की सभी आबादी का प्रतिनिधितव करती है । उनकी समान भागीदारी के अभाव मैं क्या उनके हितों और हकों के अनुरूप नीतियां और योजनायें बन पाती होगी - अभी तक महिला आरक्षण का बिल का संसद मैं पास न होना इस बात का घोतक है संसद मैं महिलायें संख्या के मामले मैं पुरुषों से कमजोर पड़ रही है । जब महिला आरक्षण बिल का वर्षों से यह हाल है तो महिला के कल्याण और हितों के अनुरूप बनने वाले कानून अथवा योजनाये पूर्वाग्रहों से कितने मुक्त होते होंगे इस बात अंदाज़ लगाना मुश्किल नही होगा । आजादी के ६२ वर्षों बाद भी महिलायें अपनी आबादी के अनुपात मैं संसद मैं अपनी हिस्सेदारी नही बना पायी ।
यदि सरकार और संसद वास्तव मैं महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कृत संकल्प है तो उसे कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए । जैसे हो सके तो महिलाओं को पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव मैं प्रत्याशी के रूप मैं खड़े होने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से नामांकन फार्म भरने से लेकर चुनाव लड़ने तक का आर्थिक खर्च का वहां सरकार द्वारा किया जाना चाहिए । दूसरा यह की सत्ता खिसकने एवं संसदीय सीट छीन जाने के डर से कोई न कोई अड़ंगा लगाकर महिला बिल को पास होने से रोका जाता है । अतः इसे अब नेताओं के हाथ से निकलकर सीधे जनता के बीच ले जाकर जनता द्वारा वोटिंग के माध्यम से इस पर फ़ैसला कराया जाना चाहिए । फ़िर देखें कैसे न पास होगा महिला आरक्षण का बिल । क्योंकि आधी आबादी और उससे अधिक का समर्थन मिलना तो निश्चित ही है ।
आशा है की इस तरह के गंभीर प्रयास यदि किए जायेंगे तो महिलाओं की सभी क्षेत्रों मैं उनकी आबादी की हिसाब से समान भागीदारी और हिस्सेदारी निश्चित रूप से सुनिश्चित हो पाएगी ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

प्रतिभाओं को अवसर - इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सराहनीय प्रयास !

इस देश मैं प्रतिभाओं को कमी नही है बस जरूरत है तो बस एक अदद अवसर और उचित मंच की जिसके माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सके । न जाने ऐसी कितनी ही प्रतिभाएं है जो एक उचित अवसर के अभाव मैं गुमनामी के अंधेरे मैं दम तोड़ देती है । एक टीवी चॅनल के रियलिटी शो के माध्यम से सुदूर ग्रामीण अंचल बहराम पुर ( उडीसा ) के शारीरिक कमियों से ग्रस्त युवाओं के प्रिंस डांस ग्रुप ने शानदार नृत्य प्रस्तुत कर देश भर के दर्शकों का दिल जीतकर अपने अटूट जज्बे और अड़ भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा प्रतिभाओं को सामने लाने और उन्हें उचित अवसर प्रदान करने का यह बहुत ही सराहनीय प्रयास किया जा रहा है ।
पहले पहल दूरदर्शन मैं यह बात देखने को देखने को मिलती थी जिसमे शास्त्रीय नृत्य , संगीत और बाद्य यंत्रों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन हुआ करता था । निजी चनेलों के आ जाने से देश की प्रतिभाओं को उचित अवसर और मंच मिलने की सम्भावना बढ़ने लगी । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया धीरे धीरे मनोरंजन , ख़बरों अवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों के दायरे से निकलकर अब देश की प्रतिभाओं हेतु प्रतिभा प्रदर्शन का उचित मंच साबित होने लगा । प्रारम्भ मैं केवल फिल्मी क्षेत्रों से जुड़े गीत , संगीत और नृत्य से जुड़ी प्रतिभाओं के प्रदर्शन का माध्यम बना एवं लंबे समय तक बना रहा , इससे ऐसा लगने लगा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सिर्फ़ फिल्मी कला क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिभाओं के प्रदर्शन का मंच बनकर सिमटकर रह गया है जिसमे नैसर्गिक और स्वाभाविक प्रतिभा प्रदर्शन के अपेक्षा नक़ल को ज्यादा तबज्जो दी जाती रही है । यंहा तक की छोटे बच्चों तक भी फिल्मी गाने की नक़ल कर प्रेम और प्यार के नगमे गाते नजर आते रहे । ऐसा देखने को मुश्किल ही मिला हो की प्रतियोगी स्वयं द्वारा रचित गीत संगीत अथवा निर्मित नृत्य शैली का प्रदर्शन कर रहा हो ।
किंतु रियलिटी शो के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा लोगों को नैसर्गिक और स्वाभाविक प्रतिभा और हुनर के प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया जा रहा है और वह भी फिल्मी क्षेत्रों के आलावा अन्य कला क्षेत्रों मैं ।
कुछ अपवादों को छोड़ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यह नई भूमिका अत्यन्त प्रशंसनीय और सराहनीय है जो देश की प्रतिभाओं को प्रसिद्धि पाने और कला और हुनर के प्रदर्शन हेतु उचित मंच और अवसर प्रदान करने का कार्य कर रही है । युवा पीदियों के साथ सभी उम्र के कलाकारों अथवा प्रतिभाओं को रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों की और प्रेरित कर रही है । इससे देश के सुदूर अंचलों अवं कोने कोने मैं विद्यमान उभरती प्रतिभाओं की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से आशा अवं उम्मीद कुछ ज्यादा बढ़ गई है । अतः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कंधे पर भारी जिम्मेदारी आन पड़ी है की स्वस्थ्य मनोरंजन के साथ साथ देश की छुपी हुई प्रतिभाओं को प्रदर्सन का उचित अवसर बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रदान कर सके । आशा है मीडिया अपने जिम्मेदारी पर खरा उतरेगा और देश और समाज के लोगों की खुशहाली और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेगा ।

रविवार, 26 जुलाई 2009

ऐसा सच सामने लाया जाए जो देश और समाज हित मैं हो !

एक टीवी चॅनल मैं इन दिनों प्रसारित हो रहे एक करोड़ इनाम वाले - सच का सामना कार्यक्रम पर सच अथवा हकीकत के सार्वजानिक किए जाने पर व्यापक बहस का मुद्दा बना हुआ है । एक और जन्हा यह कार्यक्रम सेलिब्रिटी / पर्तिभागी के निजी जीवन के बिविन्ना पहलुओं की सच्चाई को परत दर परत खोलने की दिशा मैं आगे बढ़ता है । वन्ही स्टेज दर स्टेज यह कार्यक्रम बेहद निजता के करीब पहुंचता जाता है और इतने करीब की जो मर्यादाओं और सीमओं को लांघते हुए बेहद निजी जीवन की और झाँकने का प्रयास होता है वह भी परिवार के बहुत निजी सहयोगी पत्नी , सम्मानीय माता पिता अवं भाई बहनों के साथ आम जनता के सामने । जन्हा साड़ी सीमाओं को लांघते हुए जीवन मूल्य और सामाजिक रिश्तों की मर्यादा धाराशाही होने लगती है ।
कुछ ऐसी बातें जिनका परदे मैं रहना ही परिवार अवं समाज के लिए हितकर होता है उन्हें उभारकर परिवार मैं बिखराव , संबंधों मैं मर्यादाओं , आपसी विश्वाश और सम्मान की भावना का ध्वस्था होना अवं सामाजिक प्रतिष्ठा को दों पर लगने की संभावनाओं की और अग्रसर होने से इनकार नही किया जा सकता है । क्योंकि इसी अवधारणा पर आधारित कार्यक्रम अमेरिका , ग्रीस और कोलंबिया मैं भी प्रसारित हो चुके हैं और इसी प्रकार की परिणिति के चलते इन्हे बंद करना पड़ा है ।
इसमे प्रतिभागी का भाग लेने का आधार अलग अलग हो सकता है । जनः एक और इसमे एक करोड़ का लालच , विवादस्पद होकर प्रसिद्धि पाने की चाह और डूबते कैरियर को सहारा देने की चाह अथवा अन अभिव्यक्त हुई या अपूर्ण हुई चाहत के चलते दीवानगी माना जा सकता है । वन्ही दूसरी और कार्यक्रम को ज्यादा लोकप्रिय बनाने हेतु कार्यक्रम ज्यादा रोचक अवं स्टेज दर स्टेज ज्यादा निजता की परत उघाड़ कर उत्सुकता पैदा करने का प्रयास कहा जा सकता है । साथ ही विवादस्पद रूप देकर टी आर पि बढ़ाने की चाह से भी इनकार नही किया जा सकता है ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्र का नाम देकर इसके पूरे स्वरुप को पूरी तरह उचित नही कहा जा सकता है । ऐसी अभिव्यक्ति जो परिवार और समाज के हित मैं नही हो उसे उचित नही कहा जा सकता है । पारिवारिक रिश्ते को बिघटन की और ले जाने और और असामाजिक अवं अमर्यादित गतिविधियों के सार्वजनिक प्रदर्शन पारिवारिक संस्था और समाज की सेहत के लिए ठीक नही माने जा सकते हैं ।
इस तरह के कार्यक्रम को सही रूप मैं प्रस्तुत किया जाए एवं अबैध संबंधों और निजता से जुड़े अमर्यादित सीमा रहित प्रश्नों को दरकिनार किया जाए तो ऐसे कार्यक्रम देश और समाज के हित मैं एक नई क्रांति का आगाज और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मैं एक नए युग का सूत्रपात कर सकते हैं । झूठ पकड़ने की मशीन के प्रयोग से सच को सामने लाने की अवधारणा को अपनाते हुए कथित रूप से आरोपित व्यक्ति और देश मैं छुपे बहरूपियों द्वारा दिए जाने वाले सक्क्षत्कार की हकीकत को सामने लाकर बेनकाब किया जा सकता है
आशा है भारतीय परिवेश के अनुरूप इस तरह के कार्यक्रम को सुसंस्कारित रूप मैं परिमार्जित एवं संसोधित कर नए रूप मैं प्रस्तुत किया जावेगा जो देश और समाज के हित के अनुरूप सर्वग्राह्य होगा ।

बुधवार, 15 जुलाई 2009

देश और जनता के हितों से जुड़े अपराधिक मामलों की प्रगति की जानकारी देना - अनिवार्य हो !

देश मैं आए दिन समाचारपत्रों और न्यूज़ चनलों के माध्यम से देश और जनता के हितों से जुड़े अपराधिक मामलों की ख़बरों को जोर शोर से प्रस्तुत किया जाता है और धीरे धीरे दिन बीतने पर ये मामले ओझल होने लगते हैं और उनकी जगह कोई नई ब्रेकिंग न्यूज़ स्थान बना लेती है । किंतु समाचार पत्रों और न्यूज़ चनलों द्वारा बहुत कम इस बात की जहमत उठायी जाती होगी की उन मामलों पर क्या कार्यवाही चल रही है और चल रही है तो किस गति से और किस स्तर से । क्या उन मामलों को ठंडे बस्ते मैं डाल कर शासन प्रशासन अथवा सत्तासीन पार्टी राजनीतिक लाभों के लिए, अपराधियों को बचाने की कोशिश कर रही है या फिर पर मामलों को उलझाने की कोशिश की

जा रही है या फिर जबरन दोषी साबित करने की कोशिश कर रही है । अभी तक की बात करें तो यह देखने मैं आया है की देश और जनता के हितों से जुड़े बड़े बड़े मामले राजनीतिक खीचा तानी के चलते या तो उलझ कर रह गए है या फिर उन्हें ठंडे बस्ते मैं डाल दिया गया है । चाहे वह चारा घोटाला की बात हो , बोफोर्स तोप खरीद प्रकरण की बात हो , ताज कोरिडोर मामला हो , नकली और मिलाबती खाद्य पदार्थों का बड़े पैमाने पर धंदा हो या फिर अन्य कोई देश और जनता के हितों के सरोकारों के मामले हो । कई मामलों मैं देश और जनता को इन सब बातों से अनजान और अनभिज्ञ रख कर उस पर लीपा पोती करने की कोशिश की जाती है । अतः सुस्त और ताल मटोल रवैया के कारण अपराधिक मामलों के किसी अंजाम तक न पहुचने के फलस्वरूप देश मैं ऐसे मामलों मैं उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है और देश और जनता पीड़ित और छले जाने हेतु मजबूर है ।

अतः जरूरी है की देश और जनता के हितों से जुड़े इस तरह मामलों पर हो रही कार्यवाही की प्रगति रिपोर्ट प्रतिमाह रखी जानी चाहिए और इसे जनता के सूचना के अधिकार मैं शामिल करते हुए शासन द्वारा स्वतः ही जनता को दिया जाना चाहिए । इससे देश और जनता यह जान सकेगी की अपने हितों से जुड़े अपराधिक मामलों पर कितनी और क्या कार्यवाही हो रही है । इससे ऐसे मामलों मैं जनता की निगरानी स्वतः ही बढ़ जायेगी और वह समीक्षा कर पाएगी और आवश्यक एवं समुचित कार्यवाही न होने पर उचित कार्यवाही हेतु दवाब भी बना सकेगी ताकि अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुचाया जा सके । प्रशासन को भी इस अनिवार्यता के चलते इन मामलों मैं तत्परता से उचित और इमानदार कार्यवाही करने हेतु बाध्य होना पड़ेगा

ऐसा कदम जरूर ही देश मैं होने वाली अपराधिक गतिविधियों मैं रोक लगाने , शासन प्रशासन को अपराधिक मामलों मैं त्वरित गति से और पूर्णतः जवावदेही से कार्यवाही करने और जनता का न्याय और क़ानून व्यवस्था मैं विशवास बढ़ाने हेतु मील का पत्थर साबित होगा ।

गुरुवार, 18 जून 2009

लोकतंत्र का यह कैसा एकतरफा समझोता !

जब भी कोई संस्था अथवा संगठन अथवा व्यक्ति किसी संस्था अथवा व्यक्ति को अपने कार्यों को संपादित करने एवं व्यवस्थाओं को बनाए रखने की जिम्मेदारी सौपती है तो उनके बीच दो पक्षीय समझोता होता है और तय मापदंड और शर्तों के आधार पर कार्य करने को राजी होते हैं । समझोता के तय मापदंड और शर्तों के अनुरूप किसी एक भी पक्ष द्वारा कार्य नही किया जाता है तो यह करार तोड़कर जिम्मेदारी एवं जबाबदेही से मुक्त कर दिया जाता है ।

किंतु लगता है की हमारे लोकतंत्र मैं एकपक्षीय व्यवहार अथवा एकपक्षीय करार की परम्परा चली आ रही है । लोकतंत्र कहलाता तो जनता का शासन किंतु यंहा जनता शासन करते हुए कंही नजर नही आती है इसके उलट जनता ख़ुद शासित होती नजर आती है । लोकतंत्र के उत्सव चुनाव के माध्यम से चुने हुए जनप्रतिनिधि अथवा सरकार जनता पर एकतरफा शासन करते हुए नजर आते है । एक बार जनप्रतिनिधि चयनित होने के पश्चात अपने मनमाफिक कार्य करते हैं , यंहा तक की चुनाव के समय जनता से किए गए बड़े बड़े वादों से मुकर कर जनता और क्षेत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं । अगले आने वाले चुनाव के पहले तक ना तो उन्हें कोई टोक सकता है और ना ही रोक सकता है और न ही संतोष जनक कार्य न करने की स्थिती मैं हटा सकती है ।।

तो हुआ न यह एकतरफा व्यवहार अथवा करार । चयनित होने के बाद आगामी पाँच वर्षों तक वे क्या करेंगे या फिर क्या कर रहे हैं इसका हिसाब किताब जनता के सामने रखने का कोई रिवाज नजर नही आता है और न ही उन्हें कोई मजबूर कर सकता है । ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे की एक बार चयनित होने के बाद जनप्रतिनिधि वर्षों तक अपने क्षेत्र मैं जाने की जहमत नही उठाते हैं और न ही संसद अथवा विधानसभा पटल पर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए नजर आते है । जनता इस उम्मीद मैं राह देखते रहती है की कभी तो उनका प्रतिनिधि उनके दुःख दर्द और समस्यों के बारे मैं पूछने आएगा किंतु अगले चुनाव के पहले तक दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं । और जनता है की दूसरे चुनाव के पहले तक चाह कर भी कुछ नही कर सकती है । यंहा तो यह समझना मुश्किल है की जनप्रतिनिधि किसके प्रति जबाबदेह है , अपने राजनीति आका अथवा पार्टी , सरकार अथवा जनता के प्रति ।

क्या जनता और जनप्रतिनिधि के बीच लोकतंत्र के ऐसे आदर्श समझोता की आशा की जा सकती है की जिसमे दोनों पक्ष बराबरी से एक दूसरे के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वहन करें । जनता जब चाहे अपने प्रतिनिधि को अपने क्षेत्र मैं बुला सके , उससे उसके क्षेत्र की जनता समय समय पर अथवा हर छः माह मैं क्षेत्र और क्षेत्र के लोगों के विकास और कल्याण हेतु किया गया कार्यों का लेखा जोखा ले सकें , उसके कार्यों का आकलन और समीक्षा कर सके और कार्य आशानुरूप और संतोषजनक न होने पर उसे अपना जनप्रतिनिधि होने की जिम्मेदारी से वंचित कर सके । एक स्वस्थ्य और सच्चे लोकतंत्र के लिए ऐसी मंगलकामना तो की ही जा सकती है ।

मंगलवार, 16 जून 2009

शासकीय लोगों द्वारा ही - शासकीय संस्थाओं की उपेक्षा / बेजा उपयोग !

देश अथवा प्रदेश के मंत्री हो अथवा बड़े अधिकारी हो अथवा अधिक वेतन और ऊँचे ओहेद वाले कर्मचारी है प्रायः यह देखने मैं आता है की वे स्वयं अथवा उनके परिजन शासकीय संस्थाओं जैसे स्कूल , अस्पताल अथवा अन्य शासकीय संस्थाओं से सेवा प्राप्त करने हेतु जाने से कतराते हैं । क्या कभी ये लोग सरकारी स्कूलों मैं अपने बच्चे को पढाते हुए पाये जाते हैं , क्या सरकारी अस्पतालों से स्वास्थय सुविधा प्राप्त करते हुए पाये जाते हैं क्या इन लोगों को शासकीय राशन की दुकानों से राशन प्राप्त करते हुए देखा गया है या फिर राज्य परिवहन अथवा सड़क परिवहन की बसों एवं वाहनों से सफर करते हुए देखा गया है या कभी रसोई गैस के लिए कतार मैं लगते हुए अथवा चक्कर लगाते हुए देखा गया है । हाँ इसमे अपवाद जरूर हो सकते हैं । आख़िर ऐसा क्यों ? जिन लोगों के हाथ मैं ही जनता के हित और विकास हेतु नीतियां बनाने और उसके प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है वे ही इस तरह की सेवा प्रदान करने वाली शासकीय संस्थाओं की उपेक्षा करते हुए नजर आते है । इस उपेक्षा पूर्ण रवैया का ही परिणाम है की आज इस तरह की संस्थाओं मैं व्यवस्थाओं का आलम वाद से बत्तर होते जा रहा है । आम जनता को इन बत्तर व्यवस्थाओं के साथ जीने हेतु छोड़ दिया जाता है । प्रश्न यह उठता है की जब एलिट वर्ग के लिए इन संस्थाओं की सेवा गुणवत्ता युक्ता और बेहतर नही है तो फिर ये बिना ऊँचे ओहदा , प्रभाव और निम्न आय वाली आम जनता के लिए कैसी बेहतर हो सकती है ।
इसके विपरीत जन्हा तय मापदंड और नियम विरुद्ध बेजा लाभ प्राप्त करने की बात हो तो ये लोग वंहा भी पीछे नही रहते हैं । जैसे सम्बन्धियों को सरकारी लाभों , कामों अथवा नौकरियों मैं निय्क्तियों हेतु सिफारिश करना , स्वयं अथवा स्वयं के जान पहचान वालों को तय मापदंडो अथवा नियम विरुद्ध कार्यों हेतु दबाब डालना , सरकारी वाहनों एवं अन्य सुबिधायों का बेजा इस्तेमाल करना , इत्यादि इत्यादि ।

अतः जरूरी है की शासकीय संस्थाओं जैसे स्कूल , अस्पताल अथवा अन्य शासकीय संस्थाओं से सेवा प्राप्त करना देश के प्रत्येक नागरिक (चाहे वह छोटा अथवा बड़ा हो ) हेतु अनिवार्य किया जाए । किसी विशेष परिस्थितियों मैं ही निजी अथवा प्राइवेट संस्थाओं से सेवा लेने हेतु अनुमति दे जाए । तभी शासकीय संस्थाओं की व्यवस्थाओं मैं सुधार हो सकेगा । जब देश अथवा प्रदेश के मंत्री अथवा बड़े अधिकारी अथवा अधिक वेतन और ऊँचे ओहेद वाले कर्मचारी इन संस्थाओं मैं सेवा प्राप्त करने हेतु जायेंगे तभी ये नीति निर्माता और क्रियान्वन करने वाले लोगों के सामने सही और व्यवहारिक कठिनाई और समस्या सामने आ पाएगी और बेहतर ढंग से इनका निराकरण कर सकेंगे । एकाध दिन अथवा कुछ घंटों के आकस्मिक निरिक्षण से पुर्णतः व्यवस्थाओं को समझने और उसमे सुधार किया जाना सम्भव नही है । क्योंकि कुछ समय के लिए तो कमियों को छुपाया जा सकता है और बनाबटी और दिखावटी व्यवस्था को कुछ समय के लिए बनाए रखा जा सकता है । अतः एक बेहतर व्यवस्था को बनाये रखने और सफल क्रियान्वयन हेतु नीति निर्माता और क्रियान्वन करने वाले लोगों का इस व्यवस्था का अंग बनने और उसके भागीदार होना जरूरी है ।

बुधवार, 10 जून 2009

यह भेद का भाव कब मिटेगा !

एक इंसान का दूसरे इंसान मैं भेद अर्थात अन्तर करने का यह भावः प्राचीन काल से चला आ रहा है । कभी ऊंची और नीची जाती के रूप मैं तो कभी उच्च कुल और निम्न कुल के रूप मैं तो कभी आमिर और गरीब के रूप मैं । किंतु यह इंसानी समाज ज्यों ज्यों जितना आधुनिक , पढालिखा और सभ्य कहलाने लगा है उतना ही यह इंसान से इंसान मैं भेद करने का भाव नए नए रूप मैं सामने आ रहा है । जैसे हाल ही की रंग भेद की घटना जो की आस्ट्रेलिया मैं भारतीय छात्रों के साथ हुई है नस्लभेद और रंगभेद का दंश पहले भी कई बार भारतीय झेल चुके हैं , बिहार मैं ट्रेन जलाने की घटना जिसमे क्षेत्रवाद के भेद की बू आती है ( इसमे इस बात की दुबिधा जरूर हो सकती है की इसमे पहले देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों के साथ भेदभाव हुआ है फिर अब बिहार के लोगों के साथ हो रहा है ) । यह भेद भावः कई रूपों मैं विद्यमान है । रंगभेद , लिंगभेद , क्षेत्रवाद , जातिवाद , सम्प्रदायवाद , गरीब अमीर का भेद , पढ़े लिखे और अनपढ़ का भेद , एलिट और नॉन एलिट का भेद इत्यादि , इत्यादि ।
इस प्रकार भेदभाव के चलते उपेक्षित और प्रताडित लोगों मैं असंतोष और आक्रोश का भावः पनपता है और फ़िर शुरू होता है व्यवस्था के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर उठने का सिलसिला । परिणाम स्वरुप कंही सामूहिक प्रदर्शन , तो कंही सामूहिक जुलुश । इस तरह की सुलगती हुई आग मैं निजी अथवा राजनीतिक स्वार्थी और अपने उल्लू सीधा करने वाले लोग घी डालने का काम करते है और लोगों को सामाजिक और शासकीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ हिंसक होने हेतु प्रेरित करते हैं । कंही आगजनी , कंही तोड़फोड़ तो कंही मारपीट और यंहा तक नरसंहार जैसी घटना विकराल रूप लेने लगती है । विश्व और देश मैं फैली आतंकवाद , नक्सलवाद और नस्लवाद जैसी घटनाओं के पीछे इसी प्रकार के भेदभाव पूर्ण नीतियों और व्यवहार के योगदान से इनकार नही किया जा सकता है ।
प्रायः यह देखा जाता है की भेदभाव पूर्ण वयवहार के प्रतिरोध मैं विरोध के स्वर उठने पर तात्कालिक व्यवस्था के अर्न्तगत फोरी तौर पर आवश्यक कदम उठाये जाते हैं किंतु इस घटना के पीछे मूल कारण को जानकर उसे दूर करने की कोशिश मैं दृढ इक्छा शक्ति की कमी नजर आती है । व्यवस्था मैं वाँछित सुधार करने और लोगों की मूलभूत आवश्यकता अनुरूप पहल होने के प्रयास कम ही नजर आते हैं ।
जरूरी है की आज के बदलते परिवेश और लोगों की आवश्यकता और व्यवहार के अनुरूप व्यवस्था मैं सुधार करने की जरूरत है । सबसे जरूरी है की सभी को समान रूप से स्थानीय स्तर पर भेदभाव रहित शिक्षा , स्वास्थय , रोजगार और खाद्य सुरक्षा के साथ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं मैं सहायक बिजली , पानी और आवास जैसी सुबिधा उपलब्ध कराई जाए । जिससे लोगों को अपने क्षेत्र से पलायन करने हेतु मजबूर होना ना पड़े । इस बात का भी भरोसा स्थानीय लोगों को दिलाना चाहिए की , उन्हें ऐसा प्रतीत न हो की बहार से आए लोग उनके रोजगार के अवसर को कम नही करेंगे , उनके हिस्से और हक़ के संसाधनों का उपभोग कर उनकी सुख सुबिधाओं मैं खलल पैदा नही करेंगे । इन सब बातों का ध्यान रखकर और सभी लोगों की शासन , प्रशासन और विश्व , देश और समाज की सभी गतिविधियों मैं बिना किसी भेदभाव के समान भागीदारी सुनिश्चित कर एक सद भाव पूर्ण एवं भेदभाव रहित समाज , देश और विश्व की मंगल कामना कर वसुधेव कुटुम्बकम की अवधारणा को मूर्तरूप दिया जा सकता है ।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

चुनाव आचार संहिता के साथ ही भाषण, रैली , सभाएँ और चुनावी प्रचार प्रसार बंद हो .

जब भी देश अथवा प्रदेश मैं चुनाव की तिथियों की घोषणा होती है वैसे ही देश मैं आचार संहिता लागू कर दी जाती है और सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था द्वारा जनहित अथवा जनता को प्रभावित करने वाले नए किए जाने वाले कार्यों को बंद करा दिया जाता है और नए वादे अथवा घोषणाओं पर पाबंदी लगा दी जाती है । इस प्रकार चुनाव संपन्न हो जाने तक ये प्रतिबन्ध जारी रहते हैं किंतु इसके इतर राजनीतिक पार्टियाँ , राजनेताओं के लुभावने वादे और घोषणाओं पर रोक नही लगाई जाती है और न ही उनके सभाएँ , रेलियाँ और मतदाताओं को प्रलोभित और बरगलाने वाले चुनावी प्रचार प्रसार पर रोक लगाई जाती है । जबकि निष्पक्ष और शांतिपूर्वक मतदान के लिए यह भी जरूरी है की चुनाव आचार संहिता के साथ ही भाषण, रैली , सभाएँ और चुनावी प्रचार प्रसार पर रोक हो जाना चाहिए साथ ही इसके लिए ऐसे कदम उठाये जावे जिससे मतदाताओं को प्रभावित और प्रलोभित कर बरगलाए न जा सके ।

उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार प्रसार और अपनी छबियों को निखारने का समय तो चुनाव के पहले का होना चाहिए जिसमे उम्मीदवार क्षेत्र की जनता के साथ हमेशा हर सुख दुःख मैं उसके साथ खड़ा रहा हो और क्षेत्र के विकास और कल्याण के लड़ने वाली लड़ाई मैं हमेशा तत्परता से आगे रहा हो , उनके वर्षों के समाज कल्याण और समाज सेवा के कार्य उनकी पहचान होनी चाहिए , समाज और देश के प्रति उनके आदर्श और नैतिक आचरण उनकी छबि होनी चाहिए , न की तुंरत के झूठे और लुभावने वादे और आकर्षक और मंहगे प्रचार प्रसार ।
चुनाव आयोग के द्वारा ही हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए । पंचायत , नगरपालिका और कलेक्टर कार्यालय और सार्वजनिक स्थानों जैसे बाज़ार , हट , मेलो अथवा चोराहों पर चुनाव हेतु खड़े उम्मीदवारों की जानकारी उनके संक्षित परिचय के साथ पम्फलेट , फोल्डर , लीफ्रेड्स एवं हेंडी बुक आदि के माध्यम से किया जाना चाहिए । साथ ही आकाशवाणी और टीवी प्रसारण के माध्यम से ऐसे ही प्रचार और प्रसार किए जाने चाहिए ।
इससे इन रैलियों , सभायों और प्रचार प्रसार से जनता को होने वाली असुविधाओं और परेशानियों से निजात मिलेगी , क्षेत्र मैं अनावश्यक होने वाले तनाव और असुरक्षा के माहोल से बचा जा सकेगा । व्यवस्था मैं लगाएं जाने वाले भारी भरकम सरकारी महकमा और सरकारी खर्च से मुक्ति मिलेगी । संभवतः चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवार के प्रचार प्रसार का खर्च बार बार उम्मीदवार की भाषण, रैली , सभाएँ और चुनावी प्रचार प्रसार के अंतर्गत शान्ति व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने मैं किए जाने वाले खर्च से तो कम ही होगा ।
साथ ही साफ़ सुथरी और इमानदार छबि के साथ जन हितेषी भावना रखने वाले उम्मीदवार जो धनबल और बाहुबल के अभाव मैं पर्याप्त मात्रा मैं प्रचार प्रसार नही कर पाते है और उनका वर्षों का समाज सेवा का कार्य और साफ़ सुथरी और इमानदार छबि , तुंरत के चुनाव के समय चमक धमक वाले लुभावने और मंहगे प्रचार प्रसार के सामने धूमिल हो जाते हैं , से भी निजात पाया जा सकेगा । सभी को समान रूप से महत्त्व मिलेगा और जनता भी तुंरत की चमक धमक और मंहगे लुभावने प्रचार प्रसार के बहकावे मैं नही आ पायेंगे और बिना प्रभावित हुए बिना स्व विवेक से निष्पक्ष रूप से मतदान कर पायेंगे ।

इस प्रकार के कदम निश्चित रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान कराने मैं मील का पत्थर साबित होंगे और एक इमानदार और स्वच्छ छबि वाले एक योग्य और जन हितेषी उम्मीदवार जनता बिना किसी प्रलोभन और प्रभाव के स्व विवेक से चुन सकेगी ।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

वर्तमान राजनीतिक परिद्रश्य मैं राष्ट्रीय सरकार की दरकार !

वर्तमान लोकसभा चूनाव के मद्देनजर राजनेताओ और राजनीतिक पार्टी मैं मर्यादाओं , सिद्धांतो , नीतियों और विचार धारों को ताक मैं रखकर दल बदल और दलों के आपस मैं अवसरवादी गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने की जो कबायद चल रही है वह देश और देश के लोगों के सामने लोकतंत्र के साथ होते मजाक और सिद्धांत विहीन अवसरवादी राजनीति का काला चेहरा प्रस्तुत कर रही है और इसी प्रकार की सिद्धांत विहीन और अवसरवादी कबायद संभवतः चुनाव के बाद और खरीद फरोख्त से सरकार बनने के बाद भी आने वाले पॉँच वर्षों तक भी खींच तान चलती रहेगी देश और आम जनता यह सब किम कर्तव्य विमूढ़ होकर देखने के लिए मजबूर हो



साथ ही सरकार गठन की वर्तमान व्यवस्था मैं इस बात की भी गारंटी नही रहती है की देश के सभी प्रदेश को उनके जनसँख्या के अनुपात मैं आवश्यक भागीदारी सुनिश्चित हो सके



तो क्यों देश मैं राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा को अपनाया जाए जो पूरे पाँच साल तक चले और जिसमे किसी दल और व्यक्ति विशेष की विचारधारा और नीतियों के स्थान पर देश सेवा और जन सेवा का स्थान दिया जाए और जिसमे सभी प्रदेशों की निश्चित अनुपात मैं भागीदारी सुनिश्चित हो सके
पहले भी राष्ट्रीय सरकार की बात गाहे बगाहे उठती रही है किंतु राष्ट्रीय सरकार की स्पष्ट अवधारणा नही प्रस्तुत की गई किंतु मैंने एक राष्ट्रीय सरकार का खाका खीचने की कोशिश की है जो पूरे पाँच साल चले और कुछ इस प्रकार हो सकती है राष्ट्रीय सरकार का गठन कुछ इस प्रकार किया जाना चाहिए की जिसमे देश के सभी क्षेत्रो को उनकी जनसँख्या के अनुपात मैं बराबर भागीदारी सुनाश्चित हो और जो देश के सभी जन आकाक्षाओं पर खरी उतरे प्रत्येक प्रदेश से राष्ट्रीय सरकार मैं शामिल होने वाले सदस्यों की संख्या उस प्रदेश की जनसँख्या के अनुपात के आधार पर निर्धारित की जाने चाहिए , ठीक वैसे ही जैसे प्रत्येक प्रदेश की जनसँख्या के अनुपात मैं लोकसभा और राज्यसभा की सीटें निर्धारित है प्रत्येक प्रदेशों से राष्ट्रीय सरकार मैं उन विजेता उम्मीदवार को लिया जाना चाहिए जिन्होंने उनके निर्वाचन क्षेत्रों की जनसँख्या के अनुपात मैं सर्वाधिक मत प्रतिशत प्राप्त किया हो इस हेतु निर्वाचन क्षेत्र की जनसँख्या के अनुपात मैं पाये जाने वाले मत प्रतिशत के आधार पर हर प्रदेश की एक मेरिट लिस्ट तैयार किया जाना चाहिए इस लिस्ट से सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले उतने उम्मीदवार को सरकार मैं शामिल किया जाना चाहिए जितनी की राष्ट्रीय सरकार हेतु उस प्रदेश की जनसख्या के अनुपात मैं संख्या निर्धारित हो इस चयन पर इस बात का ध्यान नही दिया जाना चाहिए चुने गए सदस्यों की पार्टी क्या है। इससे एक लाभ यह होगा की राष्ट्रीय सरकार मैं हर प्रदेशों सभी विचारों और मतों का समर्थन करने वाले प्रतिनिधियों का एक निश्चित और आवश्यक अनुपात मैं होगा। प्रधानमन्त्री का चुनाव भी सीधे जनता द्वारा किया जाना चाहिए , जिससे प्रधानमन्त्री पद के लिए होने वाली खींच तान को भी विराम दिया जा सकेगा इस प्रकार यह एकता मैं अनेकता की अनूठी मिशल होगी और प्रत्येक प्रदेश की जनसँख्या के अनुपात मैं बाजिब भागीदारी भी सुनाश्चित हो सकेगी इस प्रकार चयनित प्रतिनिधियों मैं से उनकी वरिस्थाता , योग्यता और अनुभव के आधार पर मंत्री पदों और विभागों का आबंटन किया जाना चाहिए यह सभी कार्य राष्ट्रपति और न्यायपालिका की निगरानी मैं किया जाना चाहिए इनके द्वारा ही एक राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारण और समीक्षा समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसमे सभी वर्गों और साहित्य , विज्ञानं , कला , कृषि , शिक्षा , न्याय , चिकित्षा , सामाजिक , आर्थिक क्षेत्र मैं उल्लेखनीय कार्यों और सफलता प्राप्त करने वाले बुद्धिजीवी लोगों को शामिल किया जाना चाहिए , जो हर क्षेत्र का समान रूप से ध्यान रखते हुए देश के सामाजिक , आर्थिक , भौगोलिक परिस्थिति और लोगों की आधारभूत आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियां बनाकर राष्ट्रीय सरकार हेतु एक पञ्च वर्षीया लक्ष्य तैयार करेगी और उसे सभी चयनित जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाकर उसे अनुमोदित कराएगी यह समिति हर छः माह मैं सरकार और चुने हुए प्रतिनिधियों के निर्धारित लक्ष्य अनुरूप कार्यों और उपलब्धि की समीक्षा कर देश की जनता के सामने रखेगी और मार्गदर्शन भी प्रदान करेगी , और उस आधार पर मंत्री और प्रतिनिधियों की सरकार मैं भागीदारी सुनिश्चित करेगी यदि कोई मंत्री और प्रतिनिधि अपने दायित्वों और कार्यों के निर्बहन मैं संतोषप्रद उपलब्धि नही देता है तो उसे हटाकर उसके प्रदेश के मेरिट लिस्ट मैं उसके बाद वाले प्रतिनिधि को कार्य करने का अवसर दिया जायेगा राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारण और समीक्षा समिति इस तरह से संसद और सरकार के प्रतिनिधियों के कार्यों का पूरे पाँच वर्षों तक समीक्षा कर पूरे पाँच वर्ष तक चलाने का दायित्व निभाएगी पॉँच वर्ष पश्चात् ही देश की सरकार और संसद भंग होकर देश के लोगों के सामने आगामी सरकार और संसद के गठन हेतु चुनाव कराया जाना चाहिए
आशा है इस प्रकार राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा अपनाने से देश के लोगों को भारीभरकम खर्च वाले बार बार होने वाले चुनाव से मुक्ति मिलेगी और सरकार बनाने हेतु सिद्धांत विहीन मची खींचतान और खरीद फरोख्त से और दल बदल से निजात मिलेगी पाँच वर्षों तक बिना किसी राजनीतिक खींचतान के देश के विकास को निर्बाध रूप से नया आयाम मिलेगा