तेलंगाना राज्य को प्रथक राज्य बनाने की घोषणा के बाद , अब देश के हर कोने से प्रथक राज्य गठन की मांग उठने लगी है । कुछ लोग प्रभावशाली और कारगर प्रशासनिक व्यवस्था क्रियान्वयन और नियंत्रण के मद्देनजर प्रथक छोट छोटे राज्यों की मांग को जायज ठहराते हैं । तो वन्ही कुछ राजनैतिक लोग सत्ता अवं महत्वपूर्ण पदों की लालसा अवं राजनीतिक नफे नुकसान की द्रष्टि से प्रथक राज्य की मांग करते हैं । जबकि मुझे लगता है की क्षेत्र विशेष का असंतुलित विकास , असमान वित्तीय संसाधनों का आवंटन अवं उपेक्षित भाव से उपजे असंतोष और हताशा का परिणाम है प्रथक राज्य की मांग ।
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रविवार, 20 दिसंबर 2009
असंतोष और उपेक्षा से उपजी हताशा का परिणाम है - प्रथक राज्य की मांग !
तेलंगाना राज्य को प्रथक राज्य बनाने की घोषणा के बाद , अब देश के हर कोने से प्रथक राज्य गठन की मांग उठने लगी है । कुछ लोग प्रभावशाली और कारगर प्रशासनिक व्यवस्था क्रियान्वयन और नियंत्रण के मद्देनजर प्रथक छोट छोटे राज्यों की मांग को जायज ठहराते हैं । तो वन्ही कुछ राजनैतिक लोग सत्ता अवं महत्वपूर्ण पदों की लालसा अवं राजनीतिक नफे नुकसान की द्रष्टि से प्रथक राज्य की मांग करते हैं । जबकि मुझे लगता है की क्षेत्र विशेष का असंतुलित विकास , असमान वित्तीय संसाधनों का आवंटन अवं उपेक्षित भाव से उपजे असंतोष और हताशा का परिणाम है प्रथक राज्य की मांग ।
रविवार, 13 दिसंबर 2009
ग्लोबल वार्मिंग - एक सकारात्मक पहल आवश्यक !
सोमवार, 23 नवंबर 2009
ऐसी ख़बरें अब हैरान नही करती - विचलित और दुखित जरूर करती है !
शनिवार, 14 नवंबर 2009
कितना जिम्मेदार विपक्ष है हमारे पास !
हमेशा से सत्ता आरूढ़ पार्टी अथवा जन प्रतिनिधि को ही देश मैं चल रही विभिन्न गतिविधियों हेतु जिम्मेदार माना जाता है एवं उसे ही जनता के आक्रोश और आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता है । क्या सत्ता से बाहर बैठे विपक्षी जन प्रतिनिधि और पार्टियाँ की भी जिम्मेदारी तय करने भी जहमत उठायी जाती है । क्या हमारे देश की सरकार के गुणदोष बत्ताने और विफलताओं की और ध्यान दिलाने और जनहित के मुद्दों शसक्त और जिम्मेदार तरीके से उठाने वाला विपक्ष मोजूद है ।
बुधवार, 28 अक्टूबर 2009
विश्वसनीयता किसने खोई - इ वि ऍम मशीन ने , जनता ने या फिर राजनेताओं ने !
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
दिवाली पर मिलावट खोरी , कालाबाजारी और मंहगाई की धूम !
जी हाँ इस दिवाली पर आप कुछ खरीदने जा रहें है । आकर्षक पैकिंग मैं मिलावटी मिठाई और खाद्य सामग्रियां , विशेष छूट के साथ महेंगे कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक समान और कालाबाजारी के कारण महेंगे होते अनाज और डाले सभी की धूम मची हुई है । व्यापारी कपडों और भोग विलास की चीज़ों के दाम बढाकर और उसी पर छूट का लालच देकर उपभोक्ताओं को लूटने का प्रयास कर रहें है । मिलावट खोर मिठाई और खाद्य सामग्रियों मैं हानिकारक सामग्री और रसायन मिलकर आम जनता के स्वस्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं । कालाबाजारी और जमाखोरी कर कृत्रिम अभाव पैदा कर मंहगे दामों मैं अनाज और दैनिक उपयोग की सामग्रियों मनमाने दामों मैं बेच रहे हैं । न तो कीमत मैं नियंत्रण की कोई नीति और न ही मिलावट अवं कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने की कारगर पहल । और न ही खतरनाक मिलावट के काले कारनामे को रोकने हेतु पर्याप्त प्रशसनिक अमला और न ही पर्याप इंतज़ाम हैं ।
ऐसे मैं आम जनता कान्हा जाएँ और क्या करें ? जब भी बड़े त्यौहार और उत्सव का माहोल देश मैं होता है यह सब बड़े पैमाने पर धड़ल्ले से चलता है । और यह सब हर बार की तरह मातृ सनसनी खेज़ ख़बर बनकर रह जाती है । न तो सरका चेतती है और न ही जनता । इस दिवाली मैं भी ऐसे ही हो रहा है ।
अतः इस हेतु एक स्पश्ष्ट और कारगर नीति बनाकर उसके प्रभावी क्रियान्वयन करने की , इस हेतु कुछ सुझाव इस प्रकार हैं -
१। अभी तक ऐसी कोई नीति बनायी गई है की जिससे बाजार मैं सामग्रियों की कीमतें निर्धारित और नियंत्रित किया जा सके । उत्पादक कंपनी और व्यापारी अपनी सहूलियत से कीमतें तय करते रहते हैं । अतः जरूरी है की सरकार को उपभोक्ता सामग्रियां की गुणवत्ता और परिमाण के आधार पर एक मानक तय किया जाकर अधिकतम दाम तय किए जाना चाहिए ।
३। हो सके तो खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग को पुलिस विभाग अथवा सीधे जिला कलेक्टर के अधीन रखा जाना चाहिए । जिससे शीग्रहता पूर्वक सख्ती से कार्यवाही कर कानूनी कार्याही की जा सके ।
४। सभी जिला स्तर एवं ब्लाक स्तर पर खाद्य सामग्रियों की मिलावट की जांच हेतु परिक्षण लैब की स्थापना की जानी चाहिए । जिससे शीग्रह और समय पर जांच परिणाम मिल सके और दोषियों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाही की जा सके ।
५। मिलावटी सामग्रियों की जांच और परिक्षण को आम उपभोक्ता आसानी से कर सके , इस हेतु फर्स्ट एड बॉक्स की अवधारणा अपनाकर फर्स्ट टेस्ट कित का विकास किया जाना चाहिए । जो सभी उपभोक्ता को आसानी से उपलब्ध हो सके , और मिलावट की जांच की जा सके । साथ इस बाबत प्रचार प्रसार कर आम उपभोक्ता को जागरूक करने की आवश्यकता है ।
६। कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने हेतु सभी व्यापारी को लाईसेन्स लिया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए । यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए की व्यापारी अपनी दूकान के सामने सूचना पटल पर प्रतिदिन भण्डारण किए जाने वाले अनाज और सामग्रियों की जानकारी प्रर्दशित करें । उनके द्वारा प्रर्दशित सूचना सही है या ग़लत इसकी आकस्मिक जांच आम उपभोक्ता को शामिल कर की जानी चाहिए ।
७। मिलावट खोरी और कालाबाजारी एवं जमाखोरी पर दोषी पाये जाने पर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए एवं ऐसे मामलों के निराकरण हेतु स्पेशल कोर्ट की स्थापना की जाकर दोषियों को कड़ी सजा दिलवाई जानी चाहिए ।
ऐसी मंगल कामना है की दिवाली के पावन पर्व सभी के लिए मंगल may और सुखमय हो । प्रज्जवलित होने वाले दीपो के पवित्र और अलोकिक प्रकाश की रौशनी से जीवन खुशियों मैं अन्धकार फैलाने वाली मिलावात्खोरी , कालाबाजारी , जमाखोरी और मंहगाई जैसी विकृतियों का नाश होगा और देश मैं शान्ति और सुख माय वातावरण का निर्माण होगा । ऐसी मंगल कामना के साथ सभी को दीपावली पर्व की कोटि कोटि बधाईयाँ और सुभ कामनाएं ।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2009
विनम्र अपील धार्मिक उत्सव आयोजन कर्ताओं के नाम !
बुधवार, 23 सितंबर 2009
स्वास्थय सेवाओ मैं सुधार हेतु सुझाव !
देश मैं स्वास्थय सुबिधायें दिन प्रतिदिन महँगी और आम लोगों की पहुच से दूर होते जा रही है । न तो योग्य और प्रक्षिशित चिकित्षों की पर्याप्त उपलब्धता है , और न ही पर्याप्त मात्रा मैं दवाएं की उपलब्धता है । चिकित्षकों की कमी और उनका ग्रामीण क्षेत्रों मैं सेवाओ देने मैं आना कानी करना । महँगी और आम लोगों की पहुच से दूर होती चिकित्षा शिक्षा के परिणाम स्वरुप स्वस्थ्य सेवाओ मैं सेवा भावः का लोप होकर व्यवसायीकरण की और उन्मुख होना , चिकित्षा शिक्षा संस्थाओं का सीमित और बड़े शहरों तक सीमित होने से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं की पहुच से दूर होना , बाजारवाद के प्रभाव के चलते अन्य चिकित्षा पद्धति की उपेक्षा कर एक ही चिकित्षा पद्धति एलोपेथी को बढ़ावा दिया जाना इत्यादि इत्यादि कारण ने देश की स्वास्थय सेवाओ का स्वास्थय बिगाड़ रखा है । अतः देश की स्वास्थय सुबिधाओं का स्वास्थय सुधारने और आम लोगो तक इसकी आसान और सुलभ पहुच बनाने हेतु देश की स्वास्थ्य नीति मैं परिवर्तन आवश्यक है इस हेतु कुछ सुझाव निम्नानुसार है :
१.पर्याप्त मात्रा मैं चिकित्सकों की उपलब्धता : - सुनिश्चित करने हेतु सबसे पहले तो चिकित्षा शिक्षा के केन्द्र प्रत्येक जिला स्तर पर खोले जावें , कम आय वाले युवाओं को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जावे , चिकित्षा शिक्षा के पाठ्यक्रमो मैं बदलाव कर सस्ते और शोर्ट टर्म कोर्स शुरू किए जावे , दो वर्षीय डिग्री कोर्स एवं एक वर्षीया डिप्लोमा कोर्स शुरू किया जावे जिससे ग्रामीण और छोटे शहरों के कम आय वाले भी शिक्षा ग्रहण कर स्वास्थय सेवाओ के क्षेत्र मैं पदार्पण कर सके ।
२.समानान्तर रूप से सभी चिकित्षा पद्धति को बढ़ावा : - एलोपेथी के साथ आयुर्वेदी ,होमो पेथी एवं अन्य चिकित्षा पद्धति को समान रूप से बढ़ावा जावे जिससे परंपरागत और सस्ती चिकित्षा को बढावा मिलेगा और महँगी एलोपेथी दवायों पर निर्भरता कम होगी ।
३.आई ऐ एस , आई पी एस जैसी समकक्ष चिकित्षा सेवा संस्था आई एम् एस ( इंडियन मेडिकल सर्विसेस ) और एस एम् एस ( स्टेट मेडिकल सर्विसेस ) की अवधारणा को अपनाना और उसके माध्यम से चिकित्षा क्षेत्र की प्रसाशनिक व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करना । इससे चिकित्षा विशेषज्ञों की अधिकतम उर्जा और ज्ञान का उपयोग प्रसाशनिक व्यवस्था मैं सर खपाने की जगह अधिकतम समय इलाज़ और उपचार मैं कर सकेंगे ।
४. स्वास्थय सेवाओ मैं स्थानीय लोगों स्थान देना : - प्रायः यह देखने मैं आता है की चिकित्षक पहुच विहीन ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों मैं स्वास्थय सेवाओ देने मैं कतराते हैं । स्वास्थय कर्मी भी परिवार से दूर रहकर एवं नए क्षेत्रों मैं पूरी तन्मयता से सेवायें देने मैं कठिनाई महसूस करता है और अपने सेवा क्षेत्र मैं सतत रूप से सेवा देने मैं असमर्थ रहता है । अतः स्वास्थय सेवाओ मैं स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । जन्हा तक हो सके स्वास्थय कर्मी का सेवा क्षेत्र उसके गृह ग्राम अथवा गृह जिले के पास ही होना चाहिए ।
५. स्कूली पाठ्यक्रमों मैं योग और चिकित्षा पाठ्यक्रम : - स्कूली पाठ्यक्रमो मैं योग विषय अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए , चिकित्षा शिक्षा को भी प्रत्येक स्तर की शिक्षा मैं शामिल किया जावे , संतुलित भोजन और प्रत्येक मौसम के हिसाब से खान पान मैं बदलाव के साथ किस समय और कौन सा खाद्य किस खाद्य पदार्थ के साथ खाना और न खाना इत्यादि की शिक्षा , सर्दी खांसी और बुखार जैसी छोटी बीमारयों के घरेलु और प्राथमिक उपचार की शिक्षा भी दी जावे । इससे बच्चों मैं स्वास्थय जीवन जीने के प्रति सोच और समझ विकसित होगी साथ ही स्वास्थय सेवा के क्षेत्र मैं सेवा देने हेतु भी प्रेरित होंगे ।
7 भौतिक अधो सरच्नाओं और उन्नत भौतिक उपकरण के साथ प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता : - स्वास्थय सेवाओ को पूर्ण दक्षता के साथ उपलब्ध कराया जा सके इसके लिए जरूरी है की आवश्यक भौतिक सरच्नाओ जैसे भवन , फर्नीचर एवं उन्नत उपकरणों के साथ साथ प्रसिक्षित स्वास्थय कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए ।
८. निगरानी / समीक्षा समित्ति - प्रत्येक स्वास्थय संस्थाओं के स्तर पर निगरानी / समीक्षा समित्ति बनायी जानी चाहिए . जो प्रत्येक माह स्वास्थय संस्थाओं / कर्मचारियों द्वारा किये जाने कार्यों की निगरानी / समीक्षा करेगी . समिति मैं निर्वाचित जनप्रतिनिधि , समाजसेवी के साथ अनु जाती , अनु जनजाति एवं बी पि एल परिवार के ऐसे सदस्यों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जावे , जो इन संस्थाओं से चिकित्शिया लाभ ले रहा है या लिया हो . समित्ति के एक तिहाई सदस्यों को प्रति तीन माह मैं बदला जाना चाहिए .
९.कर्मचारी क्लब अवं सहकारी समिति का गठन - प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर एक कर्मचारी क्लब का गठन किया जाना चाहिए । जन्हा सुखद परिवेश एवं अपने जैसे पढ़े लिखे लोगों का सानिध्य मिल सके , जन्हा सभी कर्मचारी मिलकर सांस्कृतिक अवं सामाजिक उत्सव की गतिविधियों मैं शामिल हो सके और मनोरंजन के साथ अपने विचारों और सुख दुःख को बाँट सके । साथ ही एक सहकारी समिति का भी गठन किया जाना चाहिए जिसके अर्न्तगत दैनिक उपयोग की आने वाली सभी जरूरी साजो सामान की उपलब्धता से पारी पूर्ण दुकाने हो। जिससे कर्मचारियों को जरूरत के सामान हेतु बार बार शहर की और ना भागना पड़े । इसी प्रकार अच्छे स्कूल , अस्पताल और शासकीय सुबिधाओं की भी उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए . आवागमन हेतु पक्की सड़क , स्वच्छ पानी की उपलब्धता और पर्याप्त बिजली की उलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए . इस प्रकार यदि सभी आवश्यक मूलभूत सुबिधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जायेगी तो कोई भी शासकीय कर्मचारी गाँव मैं सेवा देने से नहीं कतरायेगा और देश की कोने कोने तक सरकार की जनकल्याण कारी योजनाओं का लाभ पहुच पायेगा .
१०. सरकारी नुमाइंदे / निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को शासकीय स्वास्थय संस्थाओं से चिकित्शिया सेवा लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए । निजी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से सेवा लेना पूर्णतः प्रतिबंधित हो . कुछ विशेष परिस्थितियों मैं ही इसकी अनुमति हो . इससे वरिष्ठ शासकीय नुमाइंदे और जनप्रतिनिधियों का आना जाना बना रहेगा , जिससे इन संस्थाओं की स्वमेव निगरानी बनी रहेगी और चिकित्शिया सेवा और संस्थाओं की गुणवत्ता बनी रहेगी .
११. निजी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से , मोजूद शासकीय स्वास्थय संस्थाओं के माध्यम से ही चिकित्शिया सेवा प्रदाय किये जाने हेतु सहयोग लिया जाना चाहिए । इनसे कुछ शर्तों और नियमो के तहत ही यह सहयोग लिया जाना चाहिए .
१२.स्वास्थय कर्मचारियों / अधिकारियों का प्रशिक्षण क्षेत्र विशेष मैं - प्रायः यह देखने मैं आता है की प्रशिक्षण कार्यक्रम बंद कमरे मैं आयोजित किए जाते हैं जन्हा सिर्फ़ थेओरी ज्ञान दिया जाता है । इसके बजाय प्रशिक्षण कार्यक्रम किसी बिमारी से प्रभावित क्षेत्र अथवा पहुच / सुबिधा विहीन क्षेत्र मैं अस्थायी शिविर लगाकर आयोजित किए जाना चाहिए । इस तरह मैदानी प्रशिक्षण कार्यक्रम से प्रशिक्षु को पीडितों से सीधे संपर्क कर प्रायोगिक रूप मैं सीखने वन्ही प्रभावित क्षेत्र के लोगों को चिकित्षा सुबिधा का लाभ भी मिल पायेगा ।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
जनता - जानवर या जनार्दन ?
जनता - जानवर या जनार्दन ?
तो जनता के प्रति इस तरह की सोच रखने वाले नेताओं और जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों से जन हित और जन कल्याण की अपेक्षा की जा सकती है । क्या इस तरह से पाँच सितारा होटलों मैं रहने वाले और वातानुकूलित खर्चीली यात्रा करने वाले , ऐशो आराम वाली जिन्दगी जीने वाले मंत्रियों से आम जनता के हितों के अनुरूप नीतियों के निर्धारण और क्रियान्वयन की उम्मीद की जा सकती है । जो आम लोगों के बीच न रहकर और जाकर उनके जीवन और जीवन शैली मैं झाँकने का प्रयास न करे और उन्हें और उनकी जिन्दगी की तुलना जानवर से करके देखे , क्या ऐसा व्यक्ति आम लोगों की समस्या और आवश्यकता से अच्छी तरह से रूबरू और वाकिफ हो सकता है । क्या ऐसे नेता आम जनता के सच्चे प्रतिनिधि हो सकते हैं ।
जरूरत है ऐसे जनप्रतिनिधि को पहचानकर इन्हे संसद , विधानसभा अथवा सरकार मैं जाने से रोका जाए और ऐसे जनप्रतिनिधि को चुना जाए जो जनता को जानवर नही अपितु जनार्दन समझे , जो जनता के हमदर्द हो और जनता के दुःख दर्द और मुसीबत मैं काम आए , लोगों की भावना और आवश्यकता के अनुरूप काम करें ।
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
भ्रष्ट्राचार को देश की कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनने से रोकना होगा !
बुधवार, 9 सितंबर 2009
लोकतंत्र - जनता के ऊपर शासन और जनता के पैसों पर सुखासन करने का नाम है !
रविवार, 30 अगस्त 2009
क्या महिलाओं की नेत्रत्व क्षमता - स्थानीय निकायों के चुनाव तक सीमित है !
गुरुवार, 27 अगस्त 2009
प्रतिभाओं को अवसर - इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सराहनीय प्रयास !
रविवार, 26 जुलाई 2009
ऐसा सच सामने लाया जाए जो देश और समाज हित मैं हो !
बुधवार, 15 जुलाई 2009
देश और जनता के हितों से जुड़े अपराधिक मामलों की प्रगति की जानकारी देना - अनिवार्य हो !
गुरुवार, 18 जून 2009
लोकतंत्र का यह कैसा एकतरफा समझोता !
मंगलवार, 16 जून 2009
शासकीय लोगों द्वारा ही - शासकीय संस्थाओं की उपेक्षा / बेजा उपयोग !
बुधवार, 10 जून 2009
यह भेद का भाव कब मिटेगा !
प्रायः यह देखा जाता है की भेदभाव पूर्ण वयवहार के प्रतिरोध मैं विरोध के स्वर उठने पर तात्कालिक व्यवस्था के अर्न्तगत फोरी तौर पर आवश्यक कदम उठाये जाते हैं किंतु इस घटना के पीछे मूल कारण को जानकर उसे दूर करने की कोशिश मैं दृढ इक्छा शक्ति की कमी नजर आती है । व्यवस्था मैं वाँछित सुधार करने और लोगों की मूलभूत आवश्यकता अनुरूप पहल होने के प्रयास कम ही नजर आते हैं ।
जरूरी है की आज के बदलते परिवेश और लोगों की आवश्यकता और व्यवहार के अनुरूप व्यवस्था मैं सुधार करने की जरूरत है । सबसे जरूरी है की सभी को समान रूप से स्थानीय स्तर पर भेदभाव रहित शिक्षा , स्वास्थय , रोजगार और खाद्य सुरक्षा के साथ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं मैं सहायक बिजली , पानी और आवास जैसी सुबिधा उपलब्ध कराई जाए । जिससे लोगों को अपने क्षेत्र से पलायन करने हेतु मजबूर होना ना पड़े । इस बात का भी भरोसा स्थानीय लोगों को दिलाना चाहिए की , उन्हें ऐसा प्रतीत न हो की बहार से आए लोग उनके रोजगार के अवसर को कम नही करेंगे , उनके हिस्से और हक़ के संसाधनों का उपभोग कर उनकी सुख सुबिधाओं मैं खलल पैदा नही करेंगे । इन सब बातों का ध्यान रखकर और सभी लोगों की शासन , प्रशासन और विश्व , देश और समाज की सभी गतिविधियों मैं बिना किसी भेदभाव के समान भागीदारी सुनिश्चित कर एक सद भाव पूर्ण एवं भेदभाव रहित समाज , देश और विश्व की मंगल कामना कर वसुधेव कुटुम्बकम की अवधारणा को मूर्तरूप दिया जा सकता है ।
सोमवार, 27 अप्रैल 2009
चुनाव आचार संहिता के साथ ही भाषण, रैली , सभाएँ और चुनावी प्रचार प्रसार बंद हो .
इससे इन रैलियों , सभायों और प्रचार प्रसार से जनता को होने वाली असुविधाओं और परेशानियों से निजात मिलेगी , क्षेत्र मैं अनावश्यक होने वाले तनाव और असुरक्षा के माहोल से बचा जा सकेगा । व्यवस्था मैं लगाएं जाने वाले भारी भरकम सरकारी महकमा और सरकारी खर्च से मुक्ति मिलेगी । संभवतः चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवार के प्रचार प्रसार का खर्च बार बार उम्मीदवार की भाषण, रैली , सभाएँ और चुनावी प्रचार प्रसार के अंतर्गत शान्ति व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने मैं किए जाने वाले खर्च से तो कम ही होगा ।
साथ ही साफ़ सुथरी और इमानदार छबि के साथ जन हितेषी भावना रखने वाले उम्मीदवार जो धनबल और बाहुबल के अभाव मैं पर्याप्त मात्रा मैं प्रचार प्रसार नही कर पाते है और उनका वर्षों का समाज सेवा का कार्य और साफ़ सुथरी और इमानदार छबि , तुंरत के चुनाव के समय चमक धमक वाले लुभावने और मंहगे प्रचार प्रसार के सामने धूमिल हो जाते हैं , से भी निजात पाया जा सकेगा । सभी को समान रूप से महत्त्व मिलेगा और जनता भी तुंरत की चमक धमक और मंहगे लुभावने प्रचार प्रसार के बहकावे मैं नही आ पायेंगे और बिना प्रभावित हुए बिना स्व विवेक से निष्पक्ष रूप से मतदान कर पायेंगे ।
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
वर्तमान राजनीतिक परिद्रश्य मैं राष्ट्रीय सरकार की दरकार !
वर्तमान लोकसभा चूनाव के मद्देनजर राजनेताओ और राजनीतिक पार्टी मैं मर्यादाओं , सिद्धांतो , नीतियों और विचार धारों को ताक मैं रखकर दल बदल और दलों के आपस मैं अवसरवादी गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने की जो कबायद चल रही है वह देश और देश के लोगों के सामने लोकतंत्र के साथ होते मजाक और सिद्धांत विहीन अवसरवादी राजनीति का काला चेहरा प्रस्तुत कर रही है । और इसी प्रकार की सिद्धांत विहीन और अवसरवादी कबायद संभवतः चुनाव के बाद और खरीद फरोख्त से सरकार बनने के बाद भी आने वाले पॉँच वर्षों तक भी खींच तान चलती रहेगी । देश और आम जनता यह सब किम कर्तव्य विमूढ़ होकर देखने के लिए मजबूर हो ।
साथ ही सरकार गठन की वर्तमान व्यवस्था मैं इस बात की भी गारंटी नही रहती है की देश के सभी प्रदेश को उनके जनसँख्या के अनुपात मैं आवश्यक भागीदारी सुनिश्चित हो सके ।
तो क्यों न देश मैं राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा को अपनाया जाए जो पूरे पाँच साल तक चले और जिसमे किसी दल और व्यक्ति विशेष की विचारधारा और नीतियों के स्थान पर देश सेवा और जन सेवा का स्थान दिया जाए और जिसमे सभी प्रदेशों की निश्चित अनुपात मैं भागीदारी सुनिश्चित हो सके ।
आशा है इस प्रकार राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा अपनाने से देश के लोगों को भारीभरकम खर्च वाले बार बार होने वाले चुनाव से मुक्ति मिलेगी और सरकार बनाने हेतु सिद्धांत विहीन मची खींचतान और खरीद फरोख्त से और दल बदल से निजात मिलेगी । पाँच वर्षों तक बिना किसी राजनीतिक खींचतान के देश के विकास को निर्बाध रूप से नया आयाम मिलेगा ।
बड़ा ही #विशेष था #शुभ #मुहूर्त (#muhurt) ।
बड़ा ही विशेष था शुभ मुहूर्त कि जुड़ा था ये मन उनसे अटूट । धरा में थी हल्की भोर की धूप और बयार थे शीतलता से अभिभूत । करती निना...

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रोज सुबह आते दैनिक या साप्ताहिक अखबार हो , टीवी मैं चलने वाले नियमित कार्यक्रम हो या फिर रेडियो मैं चलने वाले प्रोग्राम हो या मोबाइल मैं आ...
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Image Google saabhar. एक दूजे के लिये #चांद से यह दुआ है ता उम्र , हो पल पल सुकून का और हर पल शुभ #शगुन । हो न कोई गलतफहमी न कोई उलझन, शांत ...
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#खता किस किस की मैं कब तक याद रखूं पता #खुशियों का मैं कब तक #नजरअंदाज रखूं । दिल में रश्क की मैं कब तक #आग रखूं खुशियों को अपने से मैं कब...