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मंगलवार, 11 मई 2021

ऐ इंसानी #गिद्ध ! खुद के दलदल से क्या तुम भी बच पाओगे .

 

ऐ इंसानी गिद्ध ! खुद के दलदल से क्या तुम भी बच पाओगे ,

उसी दलदल में कल खुद को या किसी अपने को भी पाओगे।

 

साँसों का सौदा , व्यापार जहर का , मनमानी लूटमार

जिंदा को तो नौच खा रहे  ,    बकशा अंतिम संस्कार ।

ऐसे नौचे हुये रुपयों  के चीथड़ों को क्या घर ले जाओगे ,

बच्चों और परिवार को खून से सने निबाले खिलाओगे ।

 

इस महामारी के दौर में सबकी सांसें अटकी है ,

छोटा बड़ा , अमीर गरीब सब पर तलवार लटकी है ।

फिर तुम किस खेत की मूली है जो तुम या तुम्हारे बच जाएंगे ,

देखना उसी दलदल में कल खुद को या किसी अपने को पाओगे ।

 

वही तुम्हारे जैसे गिद्धों को अपनों पर मँडराते पाओगे ।

जिंदा नोचेंगे वो तुम्हारे अपनों को , पर तुम कुछ न कर पाओगे ।

क्योंकि कल तुम भी इन गिद्धों के कृत्यों में शामिल थे ,

किस मुंह से तुम खून से सने हाथों से अपनों को बचाओगे ।

 

ऐ इंसानी गिद्ध ! खुद के दलदल से क्या तुम भी बच पाओगे ,

उसी दलदल में कल खुद को या किसी अपने को भी पाओगे।

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