शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

त्राश्दियों मैं हताहतों की मदद का विकृत रूप ?

विश्व या देश के किसी भी कोने मैं प्राक्रत्रिक आपदाओं जैसे बाढ़ , भूकंप , तूफ़ान अथवा सूखा अथवा मानव चूक से पैदा होने वाली कृत्रिम आपदाएं हो , इस प्रकार की घटित होने वाली भयंकर आपदाओं मैं देश विदेश से मदद के लिए कई हाथ आगे आते हैं । व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से लोग मदद के लिए सामने आते हैं । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज मैं सामूहिक रूप मैं साथ रहकर , एक दूसरे के सुख दुःख मैं काम आकर अपने जीवन का निर्वहन करता है । इसी स्वाभाविक वृत्ति के कारण मनुष्य अपने आसपास के लोगों की अपने सामर्थ्य के अनुसार दुखित और किसी घटना मैं पीड़ित लोगों की मदद करता है । सामान्तया दवाएं , भोजन , कपड़े एवं जीवन हेतु आवश्यक वस्तुओं अथवा आर्थिक सहायता के रूप मैं हताहतों की मदद की जाती है ।
कई बार ऐसी मदद तो निःस्वार्थ भाव से अंतरात्मा की आवाज पर स्वतः स्फूर्त होकर की जाती है । किंतु कई बार ये मदद दिखावा अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा के मद्देनजर मजबूरी बस की जाती है , जिसमे इसका खूब प्रचार प्रसार किया जाता है । इसी प्रकार कई बार यह देखने मैं आता है की मदद स्वरुप पहुचाई जाने वाली आवश्यक सामग्री अथवा आर्थिक राशि पीडितों तक पहुच ही नही पाती है । सरकार अथवा प्रशासन द्वारा प्रदान की जाने वाली लाखों करोरों रूपये की मदद प्रशासन मैं बैठे बीच के लोगों द्वारा ही पचा ली जाती है जिससे हताहतों और पीडितों को इन मददों के आभाव मैं भारी दुःख एवं कठिनाई झेलनी पड़ती है । यह देखने मैं भी आता है कई लोग मदद के नाम पर हताहतों और पीडितों के बीच कीमती सामानों के लालच मैं जाते हैं । लोग शहर और बस्तियों मैं निकलकर हताहतों के नाम पर चंदा एवं आर्थिक सहायता मांगते हैं , जिसका कोई हिसाब नही रहता है की वे कितना पैसा पीडितों तक पंहुचा रही हैं , अथवा पंहुचा भी रहे हैं या नही । एक चीज और गौर करने वाली है की मदद के नाम पर कई परिवार , घर के मैले कुचेले और फटे कपड़े एवं घर के अनावश्यक समान रुपी कूड़ा करकट को देते हैं , जो की मजबूरी बस दी गई मदद को दर्शाता है और मजबूर और हालात के मारे हुए लोगों के माखोल उडाने के सामान है।
इन सबके बीच ऐसे लोग अथवा संस्था है जो खामोशी के साथ निःस्वार्थ भावना से मदद हेतु आगे आते हैं । ऐसे लोगों की कमी नही है जो जान जोखिम मैं डालकर लोगों की मदद करते हैं । अतः मददों के इन अच्छे पहलु के इतर मददों के विकृत स्वरुप मैं सुधार होना जरूरी है । मदद ऐसी की जाए जो आडम्बर रहित हो , जिसमे कोई मजबूरी न हो । सामर्थ्य के अनुसार ऐसी मदद की जाए की सम्मान के साथ एवं आवश्यकता के अनुरूप , मदद पाने वाले लोगों तक यह मदद पहुचे । उनको भी लगे की इस दुःख और परेशानी की घड़ी मैं हमारे अपने साथ हैं ।

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

विचारणीय आलेख!!

सौरभ कुदेशिया ने कहा…

Aise log sabhi jagah hai..keval system ke dar se apne kaam chupchap karte rahete hai..warna yeh corrupt system kab ka khatam ho chuka hota.

Accha lekh hai!