रविवार, 5 अक्तूबर 2008

लोग उग्र और हिंसक क्यों होते जा रहें हैं !

अब आए दिन समाचार पत्रों , इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अथवा अन्य माध्यमों से जगह जगह चक्काजाम , आगजनी और हिंसक घटनाओं की ख़बर मिलती है । लोग जब देखो तब कभी छोटी छोटी बात को लेकर हिंसक और उग्र हो जाते हैं । कभी सरकार ख़िलाफ़ , कभी प्रशासन के ख़िलाफ़ , कभी एक समुदाय दूसरे समुदाय के ख़िलाफ़ तो कभी एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के ख़िलाफ़ उग्र और हिंसक होने लगते हैं । यंहा तक की छोटी छोटी बातों को लेकर भाई भाई के ख़िलाफ़ अथवा घर एक सदस्य दूसरे सदस्यों के ख़िलाफ़ हिंसक और उग्र हो जाता है । देश मैं जन्हा देखो वंहा हर रोज हिंसक और उग्र घटना को अंजाम दिया जा रहा है । चाहे वह दिल्ली , सूरत , बंगलोर और बम्बई मैं बम धमाके घटना हो , चाहे वह उडीसा के कंधमाल मैं हिंसक घटना हो , चाहे वह असम की हिंसक घटना हो , अथवा कश्मीर मैं हो रही हिंसक घटना हो अथवा नक्सल वादी द्वारा अंजाम दी जा रही घटना हो ।
ना जाने लोगों को क्या हो गया है की शान्ति पैगाम देने वाली राम , रहीम , इशु , बुद्ध और महावीर की इस धरती मैं लोग दिनों दिन उग्र और हिंसक होते जा रहे हैं । इतने सारे धर्मों की मिली जुली संस्कृति जिसमे कभी भी दूसरे को दुःख ना पहुचाने और मिलजुलकर शान्ति और सोहाद्र पूर्वक रहने की सीख मिलती हो , वंहा के लोग आज छोटी छोटी सी बातों को लेकर उग्र और हिंसक होकर एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू है । वर्तमान मैं भी हर धर्मं के धर्मगुरु अपने प्रवचन और धर्म उपदेशों के माध्यम से शान्ति और सहयोग की सीख देते रहते हैं ।
क्या अब लोगों ने अपने धर्मं की सीख को अपनाना और पालन करना छोड़ दिया है ? क्या लोगों ने अपने धर्मं के नाम पर भगवान् , परमात्मा एवं महापुरुषों के आदर्शों के पालन करने की बजाय , सिर्फ़ उत्सव मनाने की परम्परा का पालन करना शुरू दिया है ? या फिर आज का इंसान इस भागती दौड़ती भौतिकवादी जिन्दगी मैं एक पैसे कमाने वाली मशीन की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है जिसमे भावना , दया , करुणा और परस्पर सहयोग का कोई स्थान नही होता है ? क्या इंसान इंसानियत भूलता जा रहा है ? क्या देश अमन , शान्ति और भाईचारे के स्वरुप बरकार रख पायेगा ?
फिर भी कुछ लोगों के निजी और सत्ता स्वार्थों के चलते देश के लोगों के बीच वैमनस्यता फैलाई जा रही है । और अब लोग यह सब समझने भी लगे है । और आशा है की अब यह ज्यादा दिन तक नही चलेगा । लोग आपस मैं न लड़कर अपने उग्रता और हिंसक गतिविधियों को त्यागकर शान्ति और सोहार्द का मार्ग अपनाएंगे ।

2 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सुनदर विचार.
धन्यवाद

Anil Pusadkar ने कहा…

ये एक दिन या किसीएक कारण से उपजी नही है।भौतिक सुखों का पिछा करने की अंतहीन दौड से थके-हारे लोग समाज मे घट रही दुसरी घटनाओं से तनावग्रस्त होकर अपना गुस्सा कहीं न कहीं उतारना चाहते हैं,जो हर प्रकार से हिंसा के रुप मे सामने आता है।बहुत अच्छा लिखा आपने।बहुत-बहुत बधाई हो आपको।

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