मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

ब्लॉग मैं धर्मं के प्रति उठे सवाल और संसय को सकारात्मक रूप मैं प्रस्तुत किया जाना चाहिए !

देश मैं चारों और धर्मं और भक्तिमय वातावरण बना हुआ है । नवरात्र और ईद के पवित्र अवसर पर सारा वातावरण आस्था और श्रद्धा के भक्तिमय वातावरण से सराबोर हैं । ऐसे अवसरों पर हिन्दी ब्लॉग जगत मैं भी इसका असर दिख रहा है । इन खुशी और आस्था के अवसर पर शुभकामनाएं और मंगल कामनाये दी जा रही है और इश्वर , परमात्मा , खुदा के इबादत और पूजा अर्चना की बात की जा रही है ।

किंतु वही इसके इतर ब्लॉग जगत मैं धर्मं और इश्वर , परमात्मा मैं खामियां और कमियां ढूंढकर उनपर उँगलियाँ उठायी जा रही है । हो सकता है की धर्मं और परमात्मा , इश्वर एवं धर्मं के पथ प्रदर्शक द्वारा बतायी गई बातें और मानव हित एवं कल्याण मैं उनके द्वारा किए कार्य की कुछ बातें आज के इस बदलते दौर मैं प्रासंगिक नही रही हो । हो सकता है धर्मं ग्रंथों मैं लिखी गई कुछ बातों मैं मत भिन्नता हो ,या फिर कुछ बातों को लेकर संसय और सवाल हो , किंतु कुछ बातों के संसय को लेकर पूरी बात की हकीकत को जाने बगैर , पूरे धर्मं और धर्मं के पथ प्रदर्शकों और उनके द्वारा दी गई सीखों पर उँगलियाँ उठाई नही जाना चाहिए । सदियों से ये धर्मं और उनके आदर्शों को इतनी श्रद्धा और आस्था और विश्वाश के साथ अपनाया जाना , निराधार और बेबुनियाद नही हो सकता है । धर्मं और इश्वर , परमात्मा एवं पथ प्रदर्शक के आदर्श और सीखें ही है जो इंसान को इंसानियत और मानवता की सीख देता है भाई का भाई के प्रति एवं भाई का बहन के प्रति , पुत्र / पुत्रियों का माता पिता के प्रति एवं माता पिता का अपने बच्चों के प्रति कर्तव्यों और जिम्मेदारियों , संबंधों की मर्यादा एवं समाज मैं नैतिक आचरण का निर्धारण कर पारिवारिक मूल्यों को कायम रख जीने की सीख देता है । आज देश को यही चीज जोड़े हुई है । ये बात अलग है की कुछ लोगों द्वारा इसकी आड़ मैं ग़लत आचरण और ग़लत रास्ते अपनाए जा रहे हैं । किंतु इससे पूरे धर्मं और उनके आदर्शों को दोष देना उचित नही है ।

यह देखने मैं आता है की ऐसे धर्मों मैं खामियां निकालकर उस आधार पर धर्मं को ग़लत कहने को कोशिश की जाती है जिनके अनुयायी कठोर रुख नही अख्तियार नही करते हैं । जो हमेशा ऐसी बातों से विचलित हुए बिना विवादों को नजरअंदाज कर अपनी आस्था और विश्वाश मैं अडिग रहते हैं ।

ऐसे अवसरों पर धर्मं और उनके पथ प्रदर्शकों के चरित्र और परमात्मा एवं इश्वर द्वारा बताये गए रास्तों और आदर्शों मैं खामियां निकालकर उसे विवादस्पद बनाकर एवं नकारात्मक रूप मैं अपने ब्लॉग मैं प्रस्तुत करना क्या अपने ब्लॉग को प्रसद्धि दिलाने का प्रयास नही लगता है । यदि धर्मं की किसी बात को लेकर कोई संसय और सवाल है तो उसे सकारात्मक रूप देते हुए उसका समाधान और हल ढूँढने का प्रयास नही किया जाना चाहिए । एक से अधिक धर्मं पुरुषों द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन कर संसय को दूर करने या फिर धर्मं के ज्ञाता और विद्धवान से इस बात का समाधान प्राप्त करने का प्रयास नही किया जा सकता है । बजाय अधूरे ज्ञान और अधूरे अध्ययन के और बिना किसी समुचित प्रमाण के उँगलियाँ उठाने के ।

अतः जरूरी है की ब्लॉग के माध्यम से यदि धर्मं की किसी बातों के बारे मैं संसय है तो उसे सकारात्मक रूप और शालीन तरीके से उठाया जाना चाहिए , बजाय उसे विवादस्पद और नकारात्मक रूप मैं प्रस्तुत करने के । इससे एक तो धर्मं के लोगों की आस्था और विश्वाश को ठेस नही पहुचेगी और हिन्दी ब्लॉग जगत की सादगी भी बनी रहेगी ।

9 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

सही कहा आप ने , लेकिन यह बाते वही उठाते है, जिन्हे खुद को आजादी चाहिये सब कुछ करने कि, जिसे यह समाज अनेतिकता कहता है. ओर उन नियमो से हमारा समाज कुछ साफ़ है, ओर ऎसे लोगो को यह बंधन नही चाहिये , ओर इन बंधनो को तोडने के लिये वो कभी राम तो कभी सीता पर उगलियां उठाते है,

jitendra ने कहा…

वाद विवाद तो पत्रकारिता का मूल आधर रहा हैा लेकिन धर्म के आधार पर ठीक नही है

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सकारात्मक सोच और सकरात्मक लिखना ही सार्थक है ..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बड़े भाई! आप की बात सर माथे। मैं ने कुछ टिप्पणियाँ की हैं कि धर्म अप्रासंगिक हो गए हैं। यदि उन में से किसी से आप आहत हों तो मुझे माफ करें। लेकिन यह टिप्पणी किसी भी धर्म को चोट नहीं पहुँचाती। सभी धर्मों का समाज के तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक ढाँचे के अनुरुप विकास हुआ है। यदि यह विकास जारी नहीं रहेगा तो धर्मों को अप्रासंगिक होना ही है। हम हमारा इतिहास देखें तो सिंधु सभ्यता का धर्म, फिर वैदिक युग, उसमें भी ऋग्वेदिकादि चारों वेदों के काल के अनुसार विकास हुआ, फिर आरण्यक, ब्राह्मण, उपनिषद, फिर महाकाव्य काल फिर पुराणकाल। लगातार विकास हुआ है। इन कालों के मध्य में अंधेरा है। उसी अंधेरे को समाप्त करता हुआ धर्म का नया स्वरुप सामने आया है। आज फिर अंधेरा है। इसलिए धर्मों पर तो उंगलियाँ उठेंगी। तभी कोई नया रूप सामने आएगा। वैसे सभी धर्मों का अपने युग में ऐतिहासिक महत्व रहा है। उन की महत्ता एक सीढ़ी के रूप में बनी रहेगी जिस पर हो कर हम आज की स्थितियों में पहुँचे हैं। आज केवल उसी सीढ़ी पर समाज नहीं खड़ा रह सकता है। उसे आगे जाना है तो धर्म का भी विकास करना होगा।

''ANYONAASTI '' ने कहा…

समस्या का मूल कारण परिभाषाओं घालमेल है ,वास्तव में धर्म एवं सम्प्रादाय को एक ही तराजू में तौला जा रहा है ,दोनों को एक दूसरे का पर्यायवाची माना जारहा है : और इसी के साथ ही समस्याओं विभ्रमों - विवादों का का पिटारा खुल जाता है | धर्म और सम्प्रदाय दोनों अलग अलग भावों व अर्थों के शब्द है |
1.-- " धर्म सदैव प्राकृतिक ,सनातन एवं शाश्वत होता है : इसका न तो कोई प्रतिपादक एवं न कोई संस्थापक होता है | "
2.- "परन्तु सम्प्रदाय किसी न किसी द्वारा प्रतिपादित एवं संस्थापित होता ; अतः इसी आधार पर उसे उस सम्प्रदाय का पीर -औलिया ,मसीहा रब्बी अथवा पैगम्बर स्वीकार लिया जाता है "

3.-- सम्प्रदाय सदैव देश -क्षेत्र तथा समय युग के सापेक्ष होता है |यह स्थानिक कारणों से जन्म लेता है |उसके अधिकाँश प्राविधान युग बीतते बीतते अप्रासंगिक हो जाते और उनसे चिपके रहना ही रूदावादिता को और रूदावादिता ही साम्प्रदायिकता को जन्म देती है |
http://anyonaasti .blogspot.com
//anyonasti .------------------

''ANYONAASTI '' ने कहा…

श्री दिनेश राय जी से मै इस विषय पर असहमत हूँ ,उनकी टीप पढ़ कर ही मैं यह कहने को बाध्य हूँ ---

धर्म कभी भी अप्रासंगिक नही होता ;अप्रासंगिक अगर कुछ होता है तो वह "संप्रदाय " है ; क्यों की उसका जन्म समय व युग के सापेक्ष होता है और हर युग के अपनी प्राथमिकताएं होती है | जो सम्प्रदाय स्वयंमें निरंतर एवं गति शील होता है वह सना तन होता |
धर्म के प्रति प्रतिबद्धता ही व्यक्ति को समाज के प्रति भीप्रतिबद्ध बनाता है ; जब की अपमे सम्प्रदाय की प्रतिबद्धता व्यक्ति को सांप्रदायिक बनाती है |

" अतः मेरी मान्यता है की व्यक्ति का धार्मिक होना ,;साम्प्रदायिक होने की अपेक्षा श्रेष्ठ है "
वैसे मैं द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ का उनका सम्मान करता हूँ ;इस लिए अगर कोई अनुचित कह बैठा हूँ तो क्षमा प्राथी हूँ \

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

Deepak Bhanre ने कहा…

आदरणीय इस विषय वस्तु पर सकारात्मक टिप्पणी देकर देने के लिए आभार . आदरणीय कृपया माफ़ी मांगकर शर्मिंदा न करे . आप जैसे सभी वरिष्ट ब्लॉगर को अपना प्रेरक और पथप्रदर्शक के रूप मैं देखता हूँ . यदि मैं कुछ ज्यादा ही लिख गया हूँ तो क्षमा चाहता हूँ .

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

थोडा सा असहमत हूँ मैं आपसे.
मेरा मानना है कि जब तक हम वाद-विवाद नहीं करेंगे तब तक सही जानकारी नहीं मिल सकती. इसका एक मतलब होगा आँखें बंद करके कुछ भी मान लेना. हाँ ये ज़रूरी है के वाद-विवाद सार्थक और सभ्य तरीके से होना चाहिए.