मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

क्या संसकारों और मर्यादाओं को लांघना ही आधुनिकता का परिचायक है .

आज के समय आधुनिकता की बहुत बात हो रही है । देश मैं विद्दमान सदियों से चले आ रहे संस्कार अब बेमानी साबित किए जा रहे हैं । मर्यादाओं को अब दकियानूसी , रूढिवाद और संकीर्णता वादी सोच की संज्ञा देकर उससे बंधन मुक्त होने की छट पटा हट है । लोग अपने आप को अति आधुनिकता की चासनी मैं लपटे हुए दिखना चाहते है और ऐसे कार्यों और बातों का अनुसरण करने और अपनाने का ढोंग कर रहे हैं जो भले ही हमारे संस्कारों और आदर्शों से मेल नही खाते हो ।
भौतिकवादी आसान और बंधन रहित जीवन जीने की लालसा मैं अति आधुनिकता के आड़ मैं पाश्चात्य और विदेशी संस्कृति का समर्थन कर रहे हैं । आज की पीढी बंधन मुक्त स्वछन्द और उन्मुक्त जीवन जीना चाह रही है। अपने जीवन की खुशियों मैं वे किसी बात की दखलंदाजी और बंधन नही चाहते हैं । भले ही उनके इस तरह इस जीने से उनके पारिवारिक सदस्यों , वरिष्ठ और बुजर्गों को असुबिधा हो । अपनी स्वछन्द और उन्मुक्त जीवन की चाह मैं अब लोग अपने माता पिता और बड़े बुजुर्गों के साए मैं रहने से कतराने लगे है । परिणाम स्वरुप आज जीवन के संध्या काल मैं बुजुर्ग माता पिता वृद्ध आश्रम मैं रहने को मजबूर है । बिना शादी किए हुए युवा पुरुष और महिला एक साथ रहने के लिए लाइव इन रिलेशन शिप समर्थन करने लगे हैं । इसके पीछे यह तर्क की बिना जान पहचान और बिना विचारों के मेल मिलाप के शादी जैसे बंधन बंधकर लंबे समय तक एक साथ रहना नीरस जिन्दगी जीने के समान है । किंतु इसके पीछे तो सामाजिक मर्यादों और बन्धनों से मुक्त होने की छट पटा हट नजर आती है । जन्हा इस दौड़ती भागती जिन्दगी मैं जन्हा पैसा कमाने और अपनी महत्व्कान्छा पूरी करने मैं जीवन का अधिकतम समय निकाल दिया जाता है । क्या एक दूसरों को समझने का पर्याप्त अवसर मिल पाता होगा ।
क्या यही आधुनिकता वादी सोच है जिसमे वस्त्रों का उपयोग तन छुपाने मैं कम और दिखाने मैं ज्यादा तबज्जों दी जाती है । जिसमे लिव इन रिलेशन के नाम पर दो चार साल तक अपनी सहूलियत के हिसाब से साथ रहना और मन ऊब जाने पर अलग हो जाते हैं । बुजुर्गों को उनके जीवन के संध्याकाळ मैं अपनेपन से वंचित कर एकांत और नीरस जिन्दगी जीने हेतु छोड़ दिया जाए । एक बच्चे को ममता की छाव और मातृत्व प्यार से वंचित कर दिया जाता हो । बड़े बुजुर्गों के सारे जीवन के अनुभवों से उपजे सलाह और आदर्शों को नजरअंदाज किया जाए । इस प्रतिस्पर्धी युग मैं सिर्फ़ अपने को पद प्रतिष्ठित करने हेतु अच्छा या बुरा कोई भी रास्ता अख्तियार किया जाए । परिवार जैसे संस्था पर ही प्रश्नचिंह खड़ा किया जाए ।
एक बात जरूर है आज के परिप्रेक्ष्य मैं कुछ बातें साम्य नही बैठा पाती हो किंतु इससे उन बातों को ग़लत तो नही कहा जा सकता है । जरूरत है उनमे आज की परिस्थितियों के मुताबिक सुधार कर अपनाने की । ये संस्कार और बंधन ही है जिसने इस समाज को बाँध रखा है , पारिवारिक मूल्यों और नैतिक मूल्यों को जीवित रखा है । वरना विदेशी और पाश्चात्य संस्कृति की आंधी मैं यह समाज कब का बिखर गया होता । दूर ढोल सुहाने लगते है और अपनी कमीज के अपेक्षा दूसरों की कमीज ज्यादा सफ़ेद लगती है । किंतु ठीक तरह से देखा जाए अपने ही ढोल की आवाज ज्यादा सुरीली सुनाई देगी और और अपनी ही कमीज ज्यादा उजली नजर आएगी । अतः आधुनिकता इसी मैं है की संस्कारों और मर्यादाओं के दायरे मैं रहकर अपनी जड़ो को मजबूत करें , ना की विदेशी और मर्यादा विहीन जीवन शैली अपनाकर और अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से पलायन कर उन्हें खोखला करें ।

7 टिप्‍पणियां:

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

So feesadi sahi kaha aapne, door ke dhol suhavane lagte hain. Rokne se koi nahin rukta magar chinta na karen lot ke buddhu ghar ko aaye wali sthiti hogi tab apneaap apni sanskriti ke gun gayenge. videshi sanskriti men bhi bahut kuchh seekhne ke liye hai, vah koi nahin apnata.

Udan Tashtari ने कहा…

दूर ढोल सुहाने लगते है और अपनी कमीज के अपेक्षा दूसरों की कमीज ज्यादा सफ़ेद लगती है ।

-बिल्कुल सही चिन्तन..एक सार्थक आलेख.

COMMON MAN ने कहा…

bandhu, jo log live-in relation ki pairvi kar rahe hain, ve kya khud aise maa-baap ki aulad hona pasand karenge ya apni putrion ke liye yeh swekar karenge

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

आपकी चिंता जायज है। इस पर सम्पूर्ण समाज को चिंतन मनन करने की आवश्यकता है।

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

आपने सही बात कही है. भारतीय समाज आज अपनी और पराई संस्कृति के दौराहे पर खड़ा है. सोच गड़बड़ा गया है. अपने को पराया और पराये को अपना समझ कर अंधी गली में दौड़ रहे हैं. कहाँ जायेंगे, कुछ पता नही, बस दौड़ रहे हैं. मानवीय रिश्तों को बंधन मान कर अमानवीय संबंधों को अपना रहे हैं. इस दौड़ में कुछ नहीं मिलने वाला सिवाए अशांति के.

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

सही चिन्तन..एक सार्थक आलेख.

राज भाटिय़ा ने कहा…

भाई आप ने बिलकुल सही लिखा है, आज जहां भारतीया युवा पीढी जा रही है, हम ने इस का अन्त पहले ही देख लिया है, युरोप बाले ऎसी बातो से दुखी है, ओर हम उन की तरफ़ भाग रहै है, उस तरफ़ जहां सिर्फ़ अंधेरा ओर दलदल है, अगर हमे बीमारी है कि हम ने नकल करनी है इन गोरो की तो इन गोरो मे बहुत सी अच्छी बाते भी है, तो उन की नकल करो... लेकिन नही???
धन्यवाद एक साफ़ सुथरी ओर प्रेणादयक लेख के लिये.