बुधवार, 18 जून 2008

रेणुका जी का सुझाव बहुत अच्छा है !

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका जी ने नाबालिग़ बच्चों के हाथ मैं गाड़ियों की चाबी सौपने वाले अभिभावक को सजा दायरे मैं लाने और उनका लायसेंस रद्द करने का सुझाव दिया है । यदि इस तरह का कानून बनाया जाता है तो आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटना एवं नाबालिग़ उम्र मैं भयानक हादसे के शिकार होने जैसी घटनाओं मैं कमी लाने मैं यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । यह एक सच्चाई है की देश मैं धनाड्य वर्ग के अभिभावक अपने कमसिन और नाबालिग़ उम्र के बच्चे को उनकी बौद्धिक और शारीरिक क्षमता की सीमा को नजरअंदाज कर उन्हें कई ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए जाते है जिनका उपयोग वे ठीक ढंग से नही कर पाते है , परिणामस्वरूप बच्चों को कम उम्र मैं ही भयानक दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है , दूसरी और उनकी कम उम्र की नादानियाँ का खामियाजा कई मासूम लोगों को अपनी जान से हाथ धोकर भरना पड़ता है । इन भयानक दुर्घटनाओं मैं कई बार बच्चे को शारीरिक नुक्सान भी उठाना पड़ता है उनकी छोटी सी गलती उन्हें जिन्दगी भर के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज बना देती है । जिसका खामियाजा बच्चे तो भुगतते ही है साथ ही साथ अभिभावक को भी भुगतना पड़ता है । इससे इतर जो इन दुर्घटनाओं का शिकार होता है वह बेक़सूर तो वेवजह ही मारा जाता है उसे भी कई बार शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज होकर जिन्दगी भर के लिए यह सजा भुगतनी पड़ती है । यदि वह कोई गरीब व्यक्ति है तो उसके लिए जीवन जीना और भी दूभर हो जाता है वैसे ही तो उसको दो जून का भोजन जुटाना मुश्किल होता है तो भला अपाहिज होकर और मनाह्गी दवा वाला इलाज़ कराना तो उसके लिए गंभीर संकट पैदा कर देता है ।

अतः आवश्यक है की सरकार को इस तरह के क़ानून बनाने चाहिए जिससे कम उम्र के नाबालिग़ और नासमझ बच्चों की अवांछित और असयांमित गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके , एक तो इससे बच्चे जो की देश का भविष्य है को भविष्य के लिए सहेजा जा सकता है । साथ ही सड़क मैं होने वाली दुर्घटनाओं मैं कमी लाइ जा सकती है और उसमे शिकार होने वाले बेक़सूर लोगों को भी बचाया जा सकता है।

3 टिप्‍पणियां:

निशाचर ने कहा…

मैं रेणुका जी की बात को ही थोडा और आगे ले जाना चाहता हूँ. मेरा मानना है कि किसी भी नाबालिग़ बच्चे के किसी भी गैरकानूनी कार्य का जिम्मेदार उसके माँ- बाप को ही ठहराया जाना चाहिए क्योंकि बच्चा एक कच्ची मिटटी के धेले के सामान होता है. माँ-बाप, शिक्षक, कुटुम्बीजन, समाज उसे जैसे संस्कार देते हैं वह वैसा ही बनता है. इन सब में सबसे ज्यादा जिम्मेदारी माँ-बाप की ही बनती है क्योंकि वह उनके ही कारण जन्मा है. अपने जन्म के विषय में बच्चे कि कोई भूमिका, इच्छा या विकल्प नहीं होता. यदि माँ-बाप उसे अच्छी परवरिश नहीं दे सकते, एक अच्छा नागरिक नहीं बना सकते तो उन्हें कोई अधिकार नहीं कि वे एक बच्चे को केवल अपने भौतिक सुख के लिए जन्म दे. यह उस बच्चे और समाज के प्रति अपराध है. मनुष्य कोई विलुप्तप्राय जीव नहीं है कि प्रजनन जीवन का एक आवश्यक अंग माना जाये न ही ये अपरिहार्य है (सरकारी गर्भनिरोधक मुफ्त बांटे जाते है). कुत्ते - बिल्लिओं कि तरह बच्चे पैदा कर देना बहुत ही आसान है परन्तु उन्हें इंसान बनाना बहुत कि कष्टसाध्य कर्त्तव्य है. यदि आप इस कर्त्तव्य को पूरा कर पाने कि सामर्थ्य नहीं रखते तो आपको कोई अधिकार नहीं कि आप समाज को एक ऐसा इंसान दे जो उसके लिए बोझ बन जाये और आप के किये कि सजा वह बच्चा और समाज दोनों भुगतें. हाल में घटी घटनाओ (नॉएडा में पितौल से सहपाठी कि हत्या, तेज रफ़्तार कार से फुटपाथ पर सोये लोगों को कुचल देना, गलत आदतों के कारण पैसों के लिए अपने सहपाठी का अपहरण) ये सभी अपराध केवल गरीब घरों के बच्चों ने नहीं बल्कि समाज के सम्पन्न वर्ग के बच्चो ने कि है. जरा गौर कीजिये, इन अपराधो के लिए क्या सिर्फ ये बच्चे ही दोषी हैं ??????????????

DR.ANURAG ने कहा…

रेणुका जी की इस बात से पुरी तरह सहमत हूँ....सवाल यही है की हमारे यहाँ कानून ढेरो है....पर उन्हें पालन करने वाले ओर करवाने वाले दोनों महान है....

Udan Tashtari ने कहा…

विचार तो अच्छा है मगर पालन हो जब न!

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