गुरुवार, 30 सितंबर 2021

#आसमां सर पर क्यों उठाते हो !

 

इमेज गूगल साभार 

#आसमां सर पर क्यों उठाते हो  ,

पैर #जमी पर नहीं रख पाते हो  ,

जमी पैरों के नीचे कि एक दिन ,

यूं ही जायेगी खिसक ,

आग पानी में क्यों लगाते हो ।

 

माना कि जमाने में मुश्किलों है बहुत ,

कुछ सुलझती है कुछ जाती है उलझ ,

हर समस्या से मिलती नहीं  निजात है  ,

समझौता कर रहना पड़ता साथ है ,

औखली में सर अपना क्यों पड़वाते  हो ।........

 

जीवन थोड़ा है और काम  है बहुत ,

दुनिया बड़ी है और ज्ञान है बहुत ,

एक जीवन भी पड़ जायेगा कम ,

समेटने को दुनिया लगेंगे कई जनम ,

जीवन को जी का जंजाल क्यों बनाते हो ।.....  

 

नाराजगियाँ  अपनों की जाती है छलक ,

दरियाँ दिलों का बहने लगता है अलग ,

रखकर शीतल मिजाज अपना  ,

रोक लें दिलों का सुलगना ,

अपनों की कश्ती क्यों भवर में उलझाते हो ।......  

 

आसमां सर पर क्यों उठाते हो  ,

पैर जमी पर नहीं रख पाते हो  ,

जमी पैरों के नीचे कि एक दिन ,

यूं ही जायेगी खिसक ,

आग पानी में क्यों लगाते हो ।

8 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०२-१०-२०२१) को
'रेत के रिश्ते' (चर्चा अंक-४२०५)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सुंदर रचना।

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

आदरणीय अनीता मेम नमस्ते ,
मेरी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०२-१०-२०२१) को
'रेत के रिश्ते' (चर्चा अंक-४२०५) पर शामिल करने के लिए सादर धन्यवाद ।

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

आदरणीय ज्योति मेम आपकी सुन्दर सकारात्मक टिप्पणी के लिए सादर धन्यवाद ।

Manisha Goswami ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

आदरणीय मनीषा मेम, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया हेतु सादर धन्यवाद ।

मन की वीणा ने कहा…

सार्थक सुंदर सृजन।
प्रेरक भाव , हृदय स्पर्शी रचना।

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

आदरणीय कोठारी मेम, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया हेतु सादर धन्यवाद ।