सोमवार, 23 जून 2008

भारतीय ज्ञान की उपेक्षा क्यों !

देश की विडंबना है की देश पुरातन ज्ञान एवं विज्ञानं की उपेक्षा कर विदेशी ज्ञान और विज्ञानं की और भाग रहा है । उस पुरातन ज्ञान को जिसके आधार पर पहले देश विश्व गुरू का दर्जा हासिल किए हुए थे । विशिष्ट और आमजन इस ज्ञान पर विश्वाश तो करते है और उसे जीवन मैं अपनाते भी है जैसे शुभ मुहूर्त निकलवाना , रत्नों को धारण करना , वास्तुदोष के हिसाब से भवनों का निर्माण कराना , जन्मकुंडली बनवाना , हवन पूजन करवाना इत्यादि इत्यादि कार्य देश के अधिकाँश विशिष्ट और सफल व्यक्ति अपनी सफलता और सुखी जीवन जीने हेतु करवाते है । किंतु अपने को अति आधुनिक साबित करने और रूढिवाद का ठप्पा लगने से बचने की जुगत मैं सार्वजनिक रूप मैं उसकी आवश्यकता और महत्ता को स्वीकारने से बचते है ।
देश का वह पुरातन ज्ञान जिसमे सम्रद्ध प्रकृति प्रदत्त चिकित्सा ज्ञान था , जिसके द्वारा घर और आसपास के ही प्राकृतिक वातावरण मैं विद्यमान चीजो से ही व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिमारियों का इलाज़ कर लेता था । भविष्य जानने की वह हस्तरेखा विज्ञानं की कला और जीवन पर पड़ने वाले ग्रहों के खेल का ज्ञान जिसमे समय से पहले आने वाली विपत्ति का भाँपकर उससे बचाव के उपाय किए जा सकते थे । रत्नों और पन्नो को धारण करने का ज्ञान जिसमे स्वभाव और परेशानियों के आधार पर धारण कर हर परेशानी का हल ढूँढा जा सकता है । वास्तुशास्त्र का वह विज्ञानं जिसमे दिशाओं और हवाओं की दशा के आधार पर दोष रहित ग्रहों और भवनों का निर्माण किया जाता था । पुरातन कला जिसमे वातानुकूलित भवनों का समुचित निर्माण , जल का उचित सरक्षण हेतु बाबडियों और तालाबों का निर्माण किया जाना । धर्मं ग्रंथों और पुरातन साहित्य और योग शिक्षा के रूप मैं ज्ञान का अपार भण्डार जिसमे स्वस्थ्य और सुखी मानव जीवन जीने की कला और समाज कल्याण का अथाह ज्ञान है ।
किंतु देश मैं इस ज्ञान को नजरंदाज किया जा रहा और विदेशी ज्ञान का अन्धानुकरण किया जा रहा है । इस विदेशी ज्ञान को प्रकृति मैं दखल के रूप मैं अपनाने के दुष्परिणाम को तो हम देख रहे हैं । देशी ज्ञान को न तो शिक्षा मैं सम्मिलित किया गया है , और न ही इसके उत्थान का प्रयास किया जा रहा है । यह सम्रध ज्ञान इसके जानकार लोगों के साथ ही दफ़न होते जा रहा है । इनका दस्तावेजीकरण भी नही किया जा रहा है ।
अतः आवश्यकता है इस ज्ञान को सरंक्षण और संवर्धन करने की । इस अमूल्य एवं प्रकृति से जुड़े हुए ज्ञान को धरोहर के रूप मैं आगामी पीढी हेतु दस्तावेजीकरण कर रखने की । साथ जन कल्याण हेतु इस ज्ञान को अपनाने की ।

2 टिप्‍पणियां:

DR.ANURAG ने कहा…

vaqt aayega jab log yog ki tarah iske peeche daudenge..bas fark itna hai ki angrej daudne chahiye..

अनिल रघुराज ने कहा…

देश के पुरातन ज्ञान और विज्ञान को पेश करिए। फिर देखिए कौन उसे ठुकरा पाता है। दिक्कत यही है कि हम छाया के पीछे भाग रहे हैं। असली काया तो दिखाइए जनाब।